शिक्षण , शिक्षण की प्रकृति - nature of teaching
शिक्षण , शिक्षण की प्रकृति - nature of teaching
शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षण शब्द का सामान्य अर्थ विद्यालयी सीमाओं में दी जानेवाली शिक्षा से जुड़ा है। शिक्षा तभी अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकती है जब शिक्षक एक प्रक्रिया द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम को पढ़ाता है वह प्रक्रिया शिक्षण कहलाती है। शिक्षण का अर्थ सिखाना है। सिखाने में विधियों तथा पाठ्य सामग्री वांछित लक्ष्यों की पूर्ति के लिये प्रयुक्त होती हैं। अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि शिक्षण में केवल सीखना ही नहीं सिखाना भी निहित है शिक्षण की प्रक्रिया शिक्षण अधिगम (Teaching Learning) द्वारा पूरी होती है। शिक्षण के सिद्धांत में एन.एल. गेज के अनुसार तीनप्रश्न निहित है-शिक्षक का व्यवहार, छात्रों का व्यवहार तथा शिक्षण का प्रभाव।
सीखने के सिद्धान्तों (Learning Theories) पर तो मनोवैज्ञानिकों ने बहुतशोध किया है परन्तु शिक्षण के क्षेत्र में इतना शोध नहीं हो पाया है। केवल सीखने की सीमा तक ही शिक्षण का लाभ हो रहा है।
शिक्षण की प्रकृति (Nature of Teaching)
शिक्षण की प्रक्रिया में निम्नलिखित प्रभाव / अवयव या घटक होते हैं -
1. शिक्षण का अर्थ सिखाना है (Teching is Causing to learn)
शिक्षण का मूल सूत्र है बालक को सीखने के लिये तैयार करना। उसमें यह उत्प्रेरणा उत्पन्न कर देना जो सीखने के लिए उसे उत्साहित कर दे. उसमें ललक भर दे। अध्यापक बालक की इसी क्रिया में सहायता करता है तथा विषम और जटिल अवसरों पर अपने पथ प्रदर्शन द्वारा उसको उचित मार्ग पर ले जाता है। शिक्षण के इस सिद्धान्त को लगभग सभी शिक्षाविदों का समर्थन प्राप्त है।
2. शिक्षण का अर्थ बालक के संवेगों को प्रशिक्षित करना है (Teaching means training of emotions of the child)
यदि अध्यापक चाहता है कि बालक ठीक-ठीक कार्य करें तो उनके सबैगों को सकारात्मक रखना होगा। कार्य व्यक्ति की भावनाओं पर निर्भर करता है। अतः ठीक-ठीक कार्य करने की इच्छा के लिये हमें बालकों में प्रेरणादायी भावनायें उत्पन्न करनी चाहिए। प्रेरणादायी भावनाएँ अच्छे कार्यों में रुचि रखने से उत्पन्न होती है और अच्छे कार्यों में रूचि शिक्षण द्वारा उत्पन्न होती है।
यदि हम बालकों के स्थिर संवेगात्मक जीवन के विकास को दृष्टिगत नहीं रखेंगे तो हमारा शिक्षण एकांगी तथा बिकृत हो जायेगा। शिक्षण द्वारा हमारे संवेगों का उचित प्रशिक्षण होता है स्थिर सवेगात्मक जीवन का विकास होता है। यह विकास शिक्षक की सहानुभूति, प्रेम, उचित कार्य, वैयक्तिक सम्पर्क तथा उचित पथ-पदर्शन द्वारा सुगमता से संभव होता है। यद्यपि बच्चों को स्नेह पाने का मुख्य स्रोत उनका घर होता है फिर भी पाठशाला को इस और ध्यान देना चाहिए। मैत्रीपूर्ण वातावरण से बालक में सुरक्षा की भावना का विकास होता है। तब वह सभी कार्यों में उल्लास के साथ भाग लेता है।
3. शिक्षण का अर्थ अभिप्रेरणा प्राप्त करना है (The meaning of teaching is to secure motivation)
कोई कार्य तभी सफल होता है जब कर्ता के भीतर उस कार्य के लिए उत्साह हो। इसी प्रकार शिक्षण के क्षेत्र में भी शिक्षक को अभिप्रेरणा (Motivation) प्राप्त करना नितान्त आवश्यक होता है। सीखने के प्रति बालक में रुचि उत्पन्न करना ही अभिप्रेरणा है। शिक्षक को बालक की प्रमुख रुचियों तथा रुझानों का पता लगा लेना चाहिए और उसके अनुसार बालक को उचित दिशा-निर्देश देना चाहिए।
4. शिक्षण का अर्थ बालक को क्रियाशील रहने का अवसर देना है (The meaning of Teaching is to provide opportunities for activities)
बालक के अन्दर क्रियाशील रहने की जन्मजात प्रवृत्ति होती है जो विभिन्न मूलप्रवृत्तियों के रूप में प्रकट होती है। शिक्षक को चाहिए कि बालकों की इस प्रवृत्ति को ऐसी दिशा प्रदान करे जिससे उसके व्यक्तित्व का बहु मुखी विकास हो सके। बालकों के अध्ययन और सौखने की विधि तथा चिन्तन करने के उचित ढंग और सामग्री के मूल्याकन करने की उचित पद्धतियों में अध्यापक को अपने बालको को सतर्क होकर पथ-प्रदर्शन करना चाहिए अन्यथा लाभ की अपेक्षा हानिकारक प्रभावों की संभावना बढ़ जाती है।
5. शिक्षण का अर्थ बालक को अपने वातावरण के अनुकूल बनने में सहायता देना है (Teaching is helping the child to adjust himself to his environment)
यह सभी जानते है कि अपने प्राकृतिक व सामाजिक वातावरण के प्रति किसी न किसी प्रकार की प्रतिक्रिया करना बालक का स्वभाव है। प्रतिक्रियाय अच्छी व बुरी दोनों प्रकार की होती है। इन प्रतिक्रियाओं में सुधार शिक्षक अपने शिक्षण द्वारा करता है। जिससे बालक प्रगतिशील तथा उपयुक्त प्रतिक्रियाएँ करने की योग्यता प्राप्त करता है। यह योग्यता उसे अपने आपको वातावरण के अनुकूल बनाने में सहायता पहुंचाती है। दूसशब्दों में हम कह सकते हैं कि शिक्षण द्वारा बालकों को इस संसार में जीने की कला का ज्ञान प्राप्त होता है।
6. शिक्षण का अर्थ सम्बन्ध स्थापित करना है (Teaching means establishing relationship)
शिक्षा में तीन केन्द्र बिन्दु होते हैं शिक्षक, बालक और विषय इन तीनों के मध्य सम्बन्ध की स्थापना ही 'अध्ययन' है। शिक्षक को यह समझ होनी चाहिए कि वह अपनी भावनाओं और बालकों के प्रति अपने व्यवहार तथा मनोवृत्ति को पूर्ण रुप से जान सके।
उसे अपने विषय में सच्चे अर्थों में विशेषज्ञता प्राप्त होनी चाहिए साथ ही विषय और विदयार्थी के बीच सम्बन्ध स्थापित करने की कला होनी चाहिए।
7. शिक्षण का अर्थ ज्ञान देना है (Teaching means to give knowledge)
शिक्षण द्वारा बालकों को ज्ञान प्रदान किया जाता है। उन्हें अज्ञात वस्तुओं व विचारों से अवगत कराया जाता है। जो शिक्षक कहानी कहने की कला में अधिक प्रवीण होते हैं, विषय की प्रस्तुति की विधि जानते तथा बालकों की मनोवृ ल्लियों को समझते हैं उन्हें इस कार्य में सहजता होती है। बच्चे उस ज्ञान को शीघ्र ग्रहण कर लेते हैं जो सरल व रोचक ढंग से उनके सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है।
8. शिक्षण तैयारी का साधन है (Teaching is a means of preparation)
शिक्षण द्वारा बच्चों का शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक तथा संवेगात्मक विकास किया जाता है। इस विकास से उनमें ऐसी क्षमता आ जाती है जिससे वे अपने भावी जीवन को सुखी बना सकते हैं।
शिक्षण द्वारा बालक में सृजनशीलता तथा व्यक्तित्व का निर्माण किया जाता है जिससे उसमें राष्ट्र और समाज के दायित्वों को पूरा करने की तत्परता आती है। शिक्षण एक ऐसा यज्ञ है जिसके उल्तम ढंग से पूरा होने में समाज और राष्ट्र का हित होता है। शिक्षण एक कला है। अतः हर कोई एक अच्छा और सफल शिक्षक नहीं हो सकता। शिक्षण कला के भी कुछ सिद्धान्त है। अतः
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