पाठ्यचर्या की आवश्यकता एवं महत्व - Need and Importance of Curriculum
पाठ्यचर्या की आवश्यकता एवं महत्व - Need and Importance of Curriculum
फ्रांसिस जे. ब्राउन ने अपनी पुस्तक “शैक्षिक समाज विज्ञान" में लिखा है कि- “पाठ्यचर्या उन समग्र परिस्थितियों का समूह है, जिसकी सहायता से शिक्षक तथा विद्यालय शासक उन सभी बालकों तथा नवयुवकों के व्यवहार में परिवर्तन लाते हैं जो विद्यालय से होकर गुजरते हैं।" इससे यह स्पष्ट होता है कि पाठ्यचर्या विद्यालयी व्यवस्था का मूलाधार है। शिक्षा की संपूर्ण गतिविधि पाठ्यचर्या पर ही केंद्रित होती है। पाठ्यचर्या द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति होती है। शिक्षक और शिक्षार्थी पाठ्यचर्या को केंद्र में रखकर विचारों के आदान-प्रदान द्वारा किसी चीज को सीखते हैं तथा व्यवहार में परिवर्तन लाते हैं। पाठ्यचर्या से ही छात्र जीवन जीने की कला में परांगत होते हैं। शिक्षक को पाठ्यचर्या से अपने शिक्षण की प्रभावोत्पादकता, शिक्षण की योजना का निर्माण, छात्रों की उपलब्धि का मूल्यांकन करने का दिशा-निर्देश प्राप्तक होता है। अभिभावकों को पाठ्यचर्या से अपने बालकों की शैक्षिक उपलब्धि एवं ज्ञान का पता चलता है। अस्तु पाठ्यचर्या शिक्षा से जुड़ें प्रत्येक व्यक्ति के लिए हितकारी एवं आवश्यकता को प्रकट करता है। संक्षेप में पाठ्यचर्या की आवश्यकता एवं महत्व को अग्रवत व्यक्त किया जा सकता है -
(1) शिक्षक के लिए, आवश्यकता एवं महत्व - पाठ्चर्या से शिक्षक को अपने शिक्षण स्वरूप के निर्धारण, शिक्षण के संचालन तथा छात्रों की उपलब्धि को जानने एवं समझने का अवसर तथा छात्रों की उपलब्धि को जानने एवं समझने का अवसर मिलता है। पाठ्यचर्या से शिक्षक अपने शिक्षण विधि का चयन
करने में समर्थ होता है और छात्रों का उचित प्रकार से पथ-प्रदर्शन कर सीखने हेतु तत्पर बनता है।
(2) विद्यार्थी के लिए आवश्यकता एवं महत्व - पाठ्यचर्या की आवश्यकता एवं महत्व शिक्षार्थी के लिए अत्यधिक है। विद्यार्थी को इससे अपने शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा करने में मदद मिलता है। छात्रों को पाठ्यचर्या से पूर्व तैयारी का अवसर मिलता है तथा वे यह जानने में समर्थ होते हैं कि अमुक विषय में कितना तथ्य पढ़ना है? अर्थात पाठ्यचर्या के आधार पर शिक्षार्थी अपनी अध्ययन योजना बनाते हैं तथा उस पर चलकर सफलता की प्राप्ति करते हैं।
(3) समाज के लिए आवश्यकता एवं महत्व - पाठ्यचर्या से समाज को भी लाभ पहुँचता है। पाठ्यचर्या द्वारा नवीन मंतव्यों को जानता है तथा उसके अनुरूप अपने जीवन शैली एवं मान्यताओं को समय-सापेक्ष बनाता है। पाठ्यचर्या से ही समाज में पारंपरिक मान्यताओं के स्थान पर परिवर्तित मान्यताओं का दिग्दर्शन होता है। कारण यह है कि विद्यालयी जीवन में पाठ्यचर्या में निहित नवीन मान्यताओं तथा तथ्यों को सीखने के बाद जब बालक विद्यालयी जीवन से निकलकर सामाजिक जीवन मे पदार्पण करता है तो वह समाज को कुछ नवीनतायुक्त मंतव्य देता है। जब इसका व्यापक, तथ्य, विचार, मान्यता, मूल्य, आदर्श समाज का अभिन्न अंग बन जाता है। इस प्रकार पाठ्यचर्या समाज के लिए भी उपयोगी है।
(4) सांस्कृतिक उन्नयन हेतु आवश्यकता एवं महत्व समाज एवं संस्कृति के उन्नयक तत्वों को पाठ्यचर्या में स्थान दिया जाता है। यह तत्व शिक्षा एवं समाज दोनों के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। पाठ्यचर्या में सांस्कृतिक मूल्यों की सीख प्राप्त करके विद्यार्थी अपनी संस्कृति एवं सभ्यता की विशिष्टता, उसकी मौलिकता, करणीय एवं अकरणीय कर्त्तव्यों, जीवनादर्शों का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
कालातंर में ऐसे बालक ही विद्यालय से निकलकर अपनी सृजनात्मशक प्रतिभा द्वारा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा तथा उसके उन्नयन हेतु समर्पित होकर कार्य करते हैं।
(5) अंतर्दृष्टि तथा अवबोध के विकास हेतु आवश्यकता एवं महत्व विद्यालय में बालक विविध विषयों का जब अध्ययन करता है, विविध पाठ्य सहगामी क्रियाओं में हिस्साद लेता है तथा अध्ययन के द्वारा पाठ्यचर्या से तरह-तरह के अनुभव अर्जित करता है, तो इससे उसकी अंतर्दृष्टि प्रखर बनती है और उसमें अवबोध का प्रकटन होता है।
(6) शिक्षा की समान संरचना एवं समानता की स्थापन पाठ्यचर्या की सुनिश्चितता से संपूर्ण राष्ट्र में एक समान शैक्षिक संरचना बनाने तथा सभी के लिए समानता युक्त शैक्षिक व्यवस्था को अंजाम देने में मदद मिलती है।
(7) शिक्षा को नवीन मंतव्यों से अलंकृत करने में सहायता - पाठ्यचर्या से शिक्षा को नवीन दिशा प्रदान करने में भी मदद मिलती है। दिन-प्रतिदिन शिक्षा में नई-नई समस्याएँ तथा सामाजिक कुरीतियाँ उदित हो रही हैं। इन समस्याओं और कुरीतियों को समाप्त करने हेतु नवीन विधाएँ अविष्कृत हो रही हैं। इनको पाठ्यचर्या में स्थाअविष्कृबोध करके समाज के नौनिहालों को नया दिशा-बोध कराने में सहायता मिलती है।
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