शुद्ध वर्तमान मूल्य विधि , विशेषताएँ - Net Present Value Method, Features

शुद्ध वर्तमान मूल्य विधि , विशेषताएँ - Net Present Value Method, Features


समय समायोजित प्रत्याय दर पर आधारित पूँजी व्ययों के विश्लेषण के लिए प्रयोग की जानेवाली विधियों में शुद्ध वर्तमान मूल्य विधि अधिक महत्वपूर्ण है। इस विधि का प्रयोग उस समय सरलतापूर्वक किया जाता है जब प्रबंध द्वारा विनियोगों पर न्यूनतम स्वीकार्य प्रत्याय दर निर्धारित अपेक्षित प्रत्याय दर से बट्टा करके वर्तमान मूल्य ज्ञात किया जाता है। इस वर्तमान मूल्य की परियोजना लागत या विनियोग राशि से तुलना की जाती है। यदि परियोजना में विनियोग लागत से प्राप्त रोकड़ अंतरप्रवाहों का वर्तमान मूल्य अधिक होता है। प्राप्त रोकड़ अंतरप्रवाहों का वर्तमान मूल्य परियोजना लागत या विनियोग राशि से जितना अधिक होता है वह विनियोग उतना ही अच्छा माना जाता है। प्रबंध के सामने एक से अधिक परियोजनाओं में से किसी एक का चयन करने की स्थिति में उस परियोजना का चुनाव किया जाएगा,

जिससे प्राप्त रोकड़ अंतरप्रवाहों का वर्तमान मूल्य परियोजना लागत की तुलना में सबसे अधिक है अर्थात जिसका शुद्ध वर्तमान मूल्य सबसे अधिक है उन दस परियोजनाओं का चुनाव किया जाएगा।


शुद्ध वर्तमान मूल्य विधि की विशेषताएँ 


इस विधि की निम्नलिखित विशेषताएँ है -


1. इस पद्धति में समय रूपी कारक को उचित महत्व दिया जाता है, इस कारण यह पद्धति दीर्घकालीन विनियोगों की लाभप्रदता के निश्चय के लिए सर्वश्रेष्ठ पद्धति मानी जाती है।


2. यह अन्य पद्धतियों की अपेक्षा अधिक वस्तुनिष्ठ है, क्योंकि इससे प्राप्त निष्कर्षो पर ह्यस पद्धतियों तथा पूँजीगत एवं आगम व्ययों में विभाजन से संबंधित प्रबंधकों के निर्णयों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।


3. इसमें विनियोग के संपूर्ण जीवनकाल में प्राप्त होने वाली आय का ध्यान रखा जाता है।


4. इस पद्धति में जोखिम तथा अनिश्चितताओं पर ध्यान दिया जाता है। जोखिम तथा अनिश्चितताओं के विभिन्न कारकों को ध्यान में रखकर ही इस पद्धति में अर्जन की दर का निश्चय किया जाता है।


5. विनियोग की जीवन अवधि में असमान दर प्राप्त अर्जन की स्थिति में यह पद्धति अधिक उपर्युक्त होती है। असमायोजित औसत विनियोग पर प्रतिदान दर की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त होती है। असमायोजित औसत विनियोग पर प्रतिदान दर की अपेक्षा यह पद्धति अधिक शुद्ध निष्कर्ष प्रदान करती है।


6. इस पद्धति में अलग-अलग अवधि वाली तथा अलग-अलग वर्षो में अलग-अलग आय प्रदान करने वाले विनियोगों की लाभदायकता की तुलना करना संभव है।