शैक्षिक तकनीकी में अनुसंधानों पर आधारित नवीन प्रवृत्तियाँ - New Trends Based on Research in Educational Technology
शैक्षिक तकनीकी में अनुसंधानों पर आधारित नवीन प्रवृत्तियाँ - New Trends Based on Research in Educational Technology
भारत सरकार ने NCERT की स्थापना नई दिल्ली में की थी। शैक्षिक तकनीकी की आवश्यकता को महसूस करते हुए इस परिषद ने "शैक्षिक तकनीकी केंद्र" (Centre of Educational Technology) नामक नया विभाग प्रारंभ किया। इनका ध्येय शैक्षिक तकनीकी के सिद्धांतों एवं सामग्री का विकास करना तथा औपचारिक प्रयत्न करना रखा गया। इस केन्द्र ने निम्न क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ किया है-
1. शैक्षिक तकनीकी के प्रयोग के लिए एक अच्छी प्रणाली का निर्माण एवं विकास करना ।
2. शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में विभिन्न प्रशिक्षणों द्वारा योग्यता एवं क्षमताओं का विकास करना ।
3. शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में सामग्री एवं विभिन्न योग्यताओं का मूल्यांकन करना।
4. शिक्षा तकनीकी में सूक्ष्म एवं स्थूल वस्तु माध्यम पर शोध एवं विकास करना ।
यह परिषद् अनेक माध्यमों से शिक्षा तकनीकी चेतना का विकास विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा प्रशिक्षण महाविद्यालयों में करने के लिए प्रयत्नशील है। शैक्षिक शिल्पशास्त्र के एक प्रभाग 'अभिक्रमित अध्ययन' के विकास हेतु " Indian Association for Programmed Learning" सन 1967 में स्थापना हो चुकी है। यह संस्थान विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों, सेमीनारों आदि के माध्यम से अपने क्षेत्र में कार्य रही है। शैक्षिक तकनीकी के विभिन्न भागों में शोध कार्य से यह धारणा दृढ़ होती चली जा रही है कि शिक्षक को शिक्षण तकनीकी का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। शैक्षिक तकनीकी का विषय प्रत्येक शिक्षक-पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए। जब तक शिक्षक शैक्षिक तकनीकी का आधार नहीं लेगा तब तक वह अपने चारों ओर के वैज्ञानिक एवं तकनीकी स्रोतों का पूर्ण उपयोग न स्वयं कर सकेगा और न ही अपने छात्रों को सिखा सकेगा। आज आवश्यकता है
अनुपयोगी एवं सैद्धांतिक ज्ञान को निकाल कर उपयोगी एवं व्यवहारात्मकः विषयवस्तु रखी जानी चाहिए। जैसे-जैसे शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में शोध एवं प्रयोग होते जा रहे हैं वैसे-वैसे शिक्षक की योग्यताओं व उत्तरदायित्वों में वृद्धि होती चली जा रही है। आज आवश्यकता है दक्ष, प्रशिक्षित, प्रगतिशील, तथा शैक्षिक तकनीकियों से भरपूर शिक्षकों की, जो आज के वैज्ञानिक युग के साथ-साथ अपने कदम मिलाकर चल सकें। शैक्षिक तकनीकी को अनिवार्य घोषित न किया गया तो शिक्षा अपने सर्वांगीण विकास का ध्येय कभी भी प्राप्त न कर सकेगी। अब शिक्षक सोचने लगे हैं कि वे क्या, क्यों और कैसे पढ़ा रहे हैं ? शिक्षण के प्रमुख सिद्धांत डिजाइन एवं मॉडल क्या है और उनसे अपने शिक्षण को कैसे उन्नत बना सकेगें? अपने शिक्षण को रोचक बनाने के लिए श्रव्य दृश्य सामग्री जिसमें चार्ट, मॉडल, स्पेसिमैन, पदार्थ, स्लाइड, फिल्मस्ट्रिप आदि का प्रयोग बढ़ने लगा है। NCERT नई दिल्ली आदि के श्रव्य-दृश्य विभागों ने इन वस्तुओं के पुस्तकालय प्रारंभ कर दिए हैं। अनेक विद्यालय अपने शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में "ओरियण्टेशन कोर्स" इत्यादि प्रारंभ कर रहे हैं। अब विभिन्न शोधकर्त्ताओं व शोध संस्थाओं ने व्यक्तिगत एवं संस्थागत स्तर पर शैक्षिक तकनीकी से संबंधित "शोध प्रायोजनाओं" में रुचि लेना शुरू कर दिया है।
शिक्षा की नवीन 10+2+3 शैक्षिक प्रणाली भी शैक्षिक शिल्पशास्त्र के प्रभाव से मुक्त नहीं है। अब पाठ्यक्रम में इनका समावेशन यह स्पष्ट करता है कि तकनीकी ज्ञान के बिना आज के युग में कहीं भी गुजारा नहीं है। शिक्षक अपनी शिक्षण प्रक्रिया के लिए अब रेडियों आदि स्रोतों से अपने विषय के ज्ञान को बढ़ाने में लगे हैं अब शिक्षा को पर्यावरण के साथ समन्वित होना ही पड़ेगा। इसीलिए अब मनोविज्ञान के विभिन्न सिद्धांतों के व्यावहारिक प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है। शिक्षण सिद्धांतों की आलोचना, प्रत्यालोचना प्रारंभ हो चुकी है। शिक्षण, पाठ्यक्रम, शिक्षा प्रशासन आदि से संबंधित विभिन्न 'साइको एजुकेशन डिजायन' प्रस्तुत की जाने की योजनाएँ बनने लगी है। शिक्षण प्रक्रिया कैसे रुचिकर हो सकती है, इस पर भी विचार विमर्श तथा वार्तालाप चल रहे हैं। पाठ्यक्रम, कक्षा-शिक्षण अध्यापक प्रशिक्षण आदि सभी क्षेत्रों में सुधार के लिए आंदोलन किए जा रहे हैं- ये सभी सुधार शिक्षा तकनीकी में सुधार की ओर इंगित कर रहे हैं। शिक्षक के निरीक्षण के लिए फ्लैण्डर्स आदि की विश्लेषण विधियाँ भी प्रयोग में लायी जाने लगी हैं। शैक्षिक तकनीकी धीरे-धीरे, शिक्षार्थी, शिक्षण-कक्षा एवं शिक्षण विद्यालयों को प्रभावित करती जा रही है।
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