दिशा विहीन शिक्षण प्रतिमान - Non-Directive Teaching Model
दिशा विहीन शिक्षण प्रतिमान - Non-Directive Teaching Model
> प्रवर्तक- कार्ल रोजर्स
→ इस शिक्षण प्रतिमान में स्वतः अनुदेशन की सहायता से व्यक्तिगत क्षमताओं का विकास किया जाता है।
1. उद्देश्य (Focus) - इसके द्वारा स्वाध्याय, आत्मबोध तथा स्वयं अन्वेषण की क्षमताओं का विकास किया जाता है।
2. संरचना (Syntax) - इस प्रतिमान में छात्र- केन्द्रित अनुदेशन को प्रयुक्त किया जाता है । इसमें मुख्यतः दो सोपान होते हैं प्रथम सोपान - इसमें शिक्षक (अनुदेशक) अपेक्षित वातावरण उत्पन्न करता है
द्वितीय सोपान - इसमें छात्र व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से अंतः क्रिया करके अपना विकास करते हैं। वातावरण में पुनर्बलन की परिस्थितियाँ भी निहित रहती हैं।
शिक्षक ज्ञानात्मक तथा भावात्मक पक्षों के विकास की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने का प्रयास करता है तथा सीखने के अनुभवों को उद्देश्यों की दिशा में नियोजित करता है।
इस प्रतिमान की संरचना दो सिद्धांतोंपर आधारित होती है
1. शिक्षक छात्रों के साथ सक्रिय होकर कार्य करते हैं, परंतु छात्र अधिक तत्पर होते हैं।
2. शिक्षक का निर्देशन छात्रों की अभिवृत्तियों के लिए अधिक प्रभावशाली होता है ।
3. सामाजिक प्रणाली (Social System) - छात्र शिक्षक द्वारा उत्पन्न वातावरण से अन्तः क्रिया करते हैं और सीखने के अनुभवों की क्रियाएँ प्रारंभ करते हैं।
वातावरण के तत्व छात्रों को पुनर्बलन भी देते हैं। इस प्रकार छात्र अपने अनुभवों के द्वारा सीखता है और यह ज्ञान उनके लिए अधिक सार्थक होता है।
4. सहायक प्रणाली ( Support System) - इसमें शिक्षक ऐसा वातावरण उत्पन्न करते हैं जिसमें छात्र स्वयं अधिक से अधिक मानसिक स्रोतों का प्रयोग करते हैं। छात्रों को अपने सीखने का उद्देश्य भी स्पष्ट होता है। इसका मूल्यांकन निबंधात्मक परीक्षा तथा जीवन की समस्याओं के समाधान की क्षमता से किया जा सकता है।
5. उपयोग (Application) - इस प्रतिमान के उपयोग से छात्रों की सामान्य योग्यता का विकास किया जाता है, जो जीवन के लिए अधिक आवश्यक है। छात्र अपने मानसिक, सामाजिक, मौलिक क्षमताओं के विकास का एकीकरण कर सकता है। इसका प्रयोग शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
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