पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्व - Objectives, Need and importance of Environmental Education
पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्व - Objectives, Need and importance of Environmental Education
लोगों में पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागरूकता एवं सहभागिता का दृष्टिकोण विकसित करने के लिये पर्यावरण शिक्षा का विषय शिक्षा के विभिन्न स्तर पर अनिवार्य रूप से शामिल किया गया है। UNESCO ने भी विद्यालयी शिक्षा तथा उच्च शिक्षा स्तर पर पर्यावरण शिक्षा की अनिवार्यता पर बल दिया है। इस उप-इकाई में आप पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्व का आकलन करेंगे
पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. पर्यावरण संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता एवं संवेदनशीलता उत्पन्न करना
2. पर्यावरण संबंधी समस्या की आलोचनात्मक समझ विकसित करना
3. पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए लोगों को प्रेरित करना ।
4. पर्यावरण की चुनौतियों के समाधान हेतु विभिन्न गतिविधियों में सहभागिता लेने के लिए प्रेरित करना एवं नेतृत्व की क्षमता विकसित करना ।
5. पर्यावरण संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक ज्ञान, कौशल एवं मूल्यों का विकास करना।
6. पर्यावरण संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु सूचित एवं जिम्मेदारीपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना।
UNESCO (1971) के अनुसार पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. पर्यावरण संबंधी समस्याओं के प्रति लोगों को जागरूक करना।
2. पर्यावरण एवं इससे जुड़े समस्याओं से संबंधित आधारभूत ज्ञान प्रदान करना
3. पर्यावरण के प्रति सकारात्मक प्रवृत्ति का विकास करना ।
4. लोगों को पर्यावरण की सुरक्षा तथा विकास में भागीदारी हेतु अभिप्रेरित करना ।
5. पर्यावरण समस्याओं को पहचानने एवं समाधान हेतु आवश्यक कौशल विकसित करना ।
6. प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना । पर्यावरण शिक्षा एक ऐसा विषय है जिसमें हम पर्यावरण के मुख्य मुद्दों का गहराई से परीक्षण करते हैं जो हमारे जीवन को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करते हैं।
पर्यावरण संसाधनों के दोहन तथा अनियंत्रित उपयोग ने मानव जाति के समक्ष कई समस्याएँ उत्पन्नकर दी हैं- जैसे प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, मृदा-क्षरण, जीवों की विविधता में कमी इत्यादि । इन समस्याओं के समाधान हेतु लोगों में इन समस्याओं के कारण एवं प्रभाव की आलोचनात्मक समझ विकिसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए उन्हें पर्यावरण के जैविक एवं अजैविक तत्वों के अंतःक्रिया से अवगत होने की आवश्यकता है। यह जानना है कि मनुष्य की गतिविधियाँ किस प्रकार तथा किस दिशा में पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। साथ ही साथ इन समस्याओं से निपटने हेतु उन्हें क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित नीतियों, उपायों एवं कार्यक्रमों से परिचित कराना है । अतः पर्यावरण शिक्षा, जो उपर्युक्त तत्वों को सम्मलित करती है, उसे शिक्षा के विभिन्न स्तरों में समावेशित किये जाने की आवश्यकता है।
आज जहाँ एक ओर विज्ञान एवं तकनीकी तथा उद्योग अपने चरम विकास पर है,
वहीं दूसरी ओर इस विकास के फलस्वरूप हो रहे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पृथ्वी पर जीवन को तेजी से कम कर रहा है। कई ऐसी पर्यावरण समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं जो मानव जाति तथा अन्य जीवों के होने पर सवाल खड़ा कर रहा है। यदि इन समस्याओं पर नियंत्रण न किया गया तो यह मानव तथा अन्य जीवों के लिए प्राणघातक हो सकता है । अतः, यह समय की मांग है कि लोगों को पर्यावरण एवं मनुष्य के पारस्परिक निर्भरता के निहितार्थ की समझ हो, वे पारिस्थितिक विनाश और मानव की स्थिति के बीच बिगड़ते संबंधों का अध्ययन करें तथा पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनें। यह पर्यावरण तथा कॉर्पोरेट एवं तकनीकी जगत दोनों के विकास के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
कई पर्यावरणविद यह मानते हैं कि वर्तमान में मौजूद प्रदूषण, मृदा क्षरण, बाढ़, सूखा जैसी पर्यावरण समस्याएँ यदि इसी प्रकार बनी रहें तो हमारा पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह से तबाह हो सकता है
जिस पर हम सबका जीवन निर्भर है। अतः लोगों को अपनी आदतों तथा जीवन शैली में बदलाव लाने की आवश्यकता है ताकि पारिस्थितिकी विपदा से निदान मिल सके। पर्यावरण शिक्षा लोगों में ऐसे कौशल एवं मूल्यों का विकास करती है जो उन्हें इन समस्याओं को समझने तथा उन्हें दूर करने हेतु प्रयासरत रखता है।
आज लोगों को यह जानने की आवश्यकता है कि प्रकृति के संसाधन हमारे उपभोग के लिए तो बने हैं किन्तु हमारा जीवन भी इन संसाधनों की उपलब्धता पर ही निर्भर करता है। यदि संसाधनों के पुनर्निर्माण का दर हमारे उपभोग की दर से बहुत कम हो गया तो स्वयं हमारे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जायेगा।
पर्यावरण शिक्षा लोगों को उन सभी संभावनाओं से परिचित कराती है जिससे हम इन संसाधनों का उपयोग उचित दर पर तथा उचित तरीके से कर सकें ताकि संसाधनों की उपलब्धता हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए बनी रहे तथा प्रकृति एवं मनुष्य की गतिविधियों के बीच सामंजस्य बनाये रखा जा सके।
पर्यावरण सुरक्षा हेतु पर्यावरण प्रबंधन एक महत्वपूर्ण पर्याय के रूप में विकसित हो रहा है। यह बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों तथा पारिस्थितिकी तंत्र के उत्पादों का उपयोग किस प्रकार तथा किस हद तक किया जाए तथा क्या वैकल्पिक उपाय किया जाए कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहे तथा हमारा आर्थिक एवं तकनीकी विकास भी बाधित न हो। यह पर्यावरण संरक्षण हेतु सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों एवं अभिकरणों के अन्तः क्रिया तंत्र को मजबूती प्रदान करता है
तथा उनके कार्यों, आदतों और व्यवहारों के पर्यावरणीय परिणामों से भी अवगत कराता है। यह पर्यावरण समस्याओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे प्रस्तावित एवं भविष्य की परियोजनाओं, अभियानों एवं अन्य उपायों की रुपरेखा भी तैयार करता है। ऐसे परिदृश्य में, पर्यावरण प्रबंधन का विषय पर्यावरण शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जा रहा है। यह पर्यावरण संसाधनों के संरक्षण हेतु प्रबंधन के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है तथा उन्हें बढ़ावा देता है। यदि पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है तो यह आवश्यक है कि सभी लोगों को पर्यावरण शिक्षा प्रदान की जाए । आमूमन हम यह मानते हैं कि पर्यावरण सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल सरकार की है किन्तु पर्यावरण संरक्षण तब तक संभव नहीं जब तक हम सब विद्यार्थी, शिक्षक, पर्यावरणविद, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, व्यावसायी तथा अन्य लोग, इस जिम्मेदारी को पूरा करने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित न करें क्योंकि पर्यावरण हम सबका है। किसी भी एक समूह की अनभिज्ञता से यह प्रभावित हो सकता है।
पर्यावरण शिक्षा द्वारा सभी को पर्यावरण के प्रति जागरूक एवं संवेदनशील बनाया जा सकता है। उन्हें पर्यावरण की सुरक्षा हेतु विभिन्न अभिकरणों जैसे जनसंचार, BSI (Botanical Survey of india, 1890), ZSI (Zoological Survey of india, 1916), WII (Wild Life institute of india, 1982); विभिन्न सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों तथा अधिनियमों की भूमिका से भी अवगत कराया जाता है। साथ ही साथ उन्हें उन मानकों से भी परिचित किया जाता है जो मनुष्य तथा उसके पारिस्थतिकी तंत्र के अंतः क्रिया के लिए सुरक्षित, स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक हैं। इस प्रकार, पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्व पर निम्नांकित विमर्शों के अंतर्गत विचार किया जा सकता है-
1. प्राकृतिक संसाधनों को उचित रूप से उपयोग में लाना तथा इनके वैकल्पिक युक्तियों पर विचार करना ।
2. वन्य जीवन तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर बल देना ।
3. प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवों के व्यवहार का अध्ययन करना
4. अधिक धारणीय जीवन शैली को अपनाना
5. मानव की गतिविधियों एवं पर्यावरण के अंतःक्रिया का अध्ययन करना ।
6. लोगों को पर्यावरण विपदाओं के प्रति जागरूक करना तथा क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण सुरक्षा हेतु चल रहे कार्यक्रमों से परिचित कराना ।
7. आर्थिक एवं तकनीकी विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित करना ।
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