विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य - Objectives of education according to Vivekananda
विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य - Objectives of education according to Vivekananda
1) आन्तरिक शक्तियों का विकास स्वामीजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मानव के अन्दर सभी प्रकार की शक्तियाँ जन्मजात होती हैं। वे उनके अन्दर छिपी रहती हैं-अंकुर रूप में शिक्षा का परम उद्देश्य है शक्तियों का विकास कर देना, परिष्कार कर देना। उनकी दृष्टि में सभी बालक ईश्वरीय शक्ति से पूर्ण हैं। उनमें अपार क्षमता का भंडार है। शिक्षा उस क्षमता के भंडार का द्वार खोल देती है। अतः शिक्षा की सार्थकता मानव के आंतरिक गुणों के विकास प्रस्फुटन एवं परिष्कार में है।
2) मानव निर्माणः शिक्षा का महान उद्देश्य है, मानव का सम्यक स्वाभाविक निर्माण। वह शिक्षा ही क्या जिसको पाने के उपरांत इंसान हैवान बन जाए। वस्तुतः सबल, सक्षम, सुबिकसित तथा प्रबुद्ध मानव का निर्माण ही तो शिक्षा का मूल उद्देश्य हो सकता है।
दुर्बल अक्षम तथा बुद्धिहीन मानव तो समाज एवं देश के लिए भार स्वरूप ही होते हैं। उनसे समाज का भला किसी भी रूप में नहीं होता है। वर्तमान शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वह व्यक्ति को विषयों का ज्ञान तथा सूचनाएँ तो देती है, किन्तु उसमें मानवोचित क्षमता तथा गुणों का सम्यक विकास करने में असफल है। अतः सच्चे मानव का निर्माण करने वाली शिक्षा की ही देश को अपेक्षा है।
3) चरित्र निर्माण चरित्रहीन मानव में आत्मा नहीं होती, वह निष्प्राण होता है। कहा भी है यदि धन गया तो कुछ नहीं गया, यदि स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और यदि चरित्र गया तो समझो सब कुछ चला गया। चरित्र व्यक्ति की आंतरिक शक्ति का परिचायक है। चरित्र से निर्भीकता, दृढ़ निश्चय तथा मानसिक शक्ति का विकास होता है। चरित्र ही मनुष्य को वैयक्तिक विशिष्टता प्रदान करता है। अतः चरित्र निर्माण शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य है।स्वामीजी ने कहा भी हैकि मानव की समस्त प्रवृत्तियों का समष्टि रूप ही चरित्र है। शिक्षा प्रवृत्तियों का परिष्कार करती है।
4 ) इच्छा शक्ति का विकास यह सर्वविदित है कि मानव एक मास पिण्ड मात्र नहीं है। केवल शारीरिक शक्ति का मनुष्य के जीवन में कोई विशेष मूल्य नहीं है। जहाँ तक शारीरिक विशालता एवं शक्ति का सम्बन्ध है, पशु मानव से कहीं अधिक बढ़ चढ़कर है। हाथी, बाघ, सिंह घोड़े आदि की शक्ति के प्रसंग में भी मनुष्य की शक्ति नहीं आती। अतः यह स्पष्ट है कि मानव की वास्तविक शक्ति है, उसकी इच्छा शक्ति इसी शक्ति के बल पर तो मानव ने आज प्रकृति, पशुबल गति, दूरी आदि को अपनी मुट्ठी में कर रखा है। अब तो अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के बल पर वह चाँद की छाती पर भी घूम आया है। अतः स्वामीजी ने कहा कि शिक्षा का परम उद्देश्य है इच्छा शक्ति का विकास।
5) हृदय पक्ष का विकास यह स्पष्ट है कि मात्र शारीरिक अथवा इच्छा शक्ति के विकास से ही शिक्षा के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पाती। शिक्षा की सार्थकता तो हृदय पक्ष के विकास में है। हम सभी जानते हैं कि रावण तथा हिरण्यकश्यप की शारीरिक, मानसिक तथा इच्छा शक्तियों का पूर्ण विकास हुआ था किन्तु उनके हृदय पक्ष का विकास न के बराबर हुआ था।
फलस्वरूप समस्त मानवता को त्रस्त होना पड़ा। वहीं राम में हृदय पक्ष की प्रबलता थी। इसी से तो शबरी, निशाद आदि की ममता को मूल्य देने में वे समर्थ हो सके। हृदय पक्ष के विकास से ही दुःखियों के दुखों, गरीबों की दिक्कतों, दलितों की वेदनाओं तथा बीमारों की पीड़ाओं की अनुभूति सम्भव ही मानव समाज के दीन दुःखी, पीडित तथा दलित व्यक्तियों की सेवा में हम अपनी समस्त शक्ति लगाने को तत्पर हो सकते हैं। जिसके पास हृदय है, वहीं ईश्वर के विशाल अस्तित्व की अनुभूति करता है। इस प्रकार हृदय की शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है।
6) विशिष्ट जान यह सही है कि ज्ञान के विकास से हम अपनी दृष्टि को विशाल कर पाते हैं। इससे आत्मशक्ति भी प्राप्त होती है। किन्तु मात्र उस ज्ञान का उतना बड़ा मूल्य नहीं होता जो केवल रोटी पैदा करने में सहायक हो। हमें तो उस जन की भी उतनी ही ज्यादा आवश्यकता है, जिसके सहारे हम सत्य का अनुभव करते हैं, विश्व की एकता की अनुभूति करते हैं
विश्वबंधुत्व की भावना का विकास करते हैं तथा शाश्वत सत्य का दर्शन करते हैं। शिक्षा का लक्ष्य इस ज्ञान की प्राप्ति भी है।
7) विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान का विकास आधुनिक विश्व में विज्ञान ने मानव जीवन में प्रवेश कर लिया है। वैयक्तिक से लेकर सामाजिक जीवन तक के समस्त पक्ष इससे प्रभावित है। उसे हम दरकिनार अथवा नजर अंदाज नहीं कर सकते। विज्ञान की उपलब्धियों एवं उसकी प्रगति के साथ अपने को सम्बद्ध करना आधुनिक जीवन के लिए अत्यावश्यक हो गया है। इसी प्रकार तकनीकी जान जैसे इंजीनियरिंग आदि भी आज मानवीय प्रगति एवं विश्व संरचना के लिए अत्यावश्यक हो गया है। विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान जहाँ हमें दक्षता, क्षमता तथा दृढ़ता प्रदान करते हैं, वही आधुनिक समाज उनकी सहायता से प्रगति करता है, समृद्धि प्राप्त करता है अथवा सम्मान का पात्र बनता है। आधुनिक सुख तथा निर्माण के साधन की प्राप्ति भी तो विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान से ही सम्भव है। अतः आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान का विकास भी है।
8) मानवीय गुणों का विकास :- मानव में यदि मानवीय गुणों का विकास न हुआ तो वह पशुवत है। मानवीय गुणों में विशिष्ट है आत्मविश्वास का गुण। इसके बिना मानव किसी काम को करने में असमर्थ होता है। इसके बिना नेतृत्वशक्ति का अंकुरण ही नहीं हो सकता। जिसमें आत्मशक्ति ही नहीं, वह नेतृत्व क्या कर सकेगा। उदारता, ममता, निर्भीकता, निष्पक्षता, निर्णय शक्ति आदि ऐसे गुण हैं जिनको पाकर ही मानवता सार्थक होती है। अन्याय के सम्मुख जो नहीं झुक्ा वही सही अर्थों में शिक्षित है। अतः इन गुणों के विकास में ही शिक्षा की सार्थकता है।
9 ) विचार शक्ति का विकास आज की शिक्षा में सामान्यतः रटना तथा विभिन्न प्रकार की सूचनाओं को बिना समझे याद कर लेना प्रधान हो गया है। सच तो यह है कि कुछ विषयखण्डों को रटकर परीक्षाओं में उत्तर लिखना तथा कागजी डिग्रियाँ प्राप्त कर लेना मात्र ही आज शिक्षा का उद्देश्य रह गया है। वस्तुतः शिक्षा का उद्देश्य तो मानव में महान विचारशक्ति का विकास करना है विचारशक्ति का वरदान ही मानव को पशु से उच्चतर स्थान प्रदान करता है।
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