निर्देशन के उद्देश्य - Objectives of Guidance

निर्देशन के उद्देश्य - Objectives of Guidance


निर्देशन की प्रक्रिया एक पूर्ण उद्देश्य पूर्ण प्रक्रिया है। बिना उद्देश्य निर्धारित किए इस प्रक्रिया का पूर्ण होना सम्भव ही नहीं है । निर्देशन के कार्य क्षेत्रों में विभिन्नता होने के कारण ही निर्देशन के विभिन्न उद्देश्य होते हैं। यदि हम बिना किसी उद्देश्य के निर्देशन प्रक्रिया आरम्भ करते हैं तो निर्देशन में संलिप्त विभिन्न उप-क्रियाओं को दिशा नहीं मिल सकती और वे क्रियायें निरर्थक होकर रह जाती हैं।


शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर निर्देशन के उद्देश्य बदलते रहते हैं, अर्थात शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर निर्देशन के विभिन्न उद्देश्य होते हैं। इसका वर्णन निम्न प्रकार है


1 प्राथमिक स्तर पर निर्देशन के उद्देश्य :- शिक्षा में प्राथमिक स्तर का तात्पर्य कक्षा 1-8 तक का स्तर होता है। पहली कक्षा में बालक पहली बार घर से बाहर निकलता है। घर से बाहर निकलकर बालक जब विद्यालय के वातावरण में प्रवेश करता है तो उसे कई प्रकार के तालमेल करने होते हैं।

स्कूल का वातावरण बच्चे के लिए बहुत विस्तृत होता है। बच्चा स्कूल में आकर कई प्रकार के व्यक्तियों, बालकों तथा अध्यापकों के सम्पर्क में आता है। साथ ही, स्कूल में आकर माता-पिता जैसी सुरक्षा बालक को प्राप्त नहीं होती। बच्चा भयभीत तथा संकोची होने के कारण स्कूल में दबा दबा सा रहता है। वे बच्चे तो और भी कठिनाई में पड़ जाते हैं जो पूर्ण रूप से अपने माता-पिता पर ही आश्रित रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में निर्देशन के उद्देश्यों में यह भी शामिल हो जाता है कि निर्देशन प्रदान करने वाला व्यक्ति ऐसे बच्चों का पता लगाये और उनकी समायोजन सम्बन्धी समस्याओं को नियंत्रित करे।


t-variant-east-asian: normal; font-variant-numeric: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">प्राथमिक स्तर पर बच्चे के विकास में शिक्षक, माता-पिता निर्देशनकर्ता, स्कूल, समाज के लोग सभी का योगदान होता है। इन सभी के कार्यों में तालमेल भी आवश्यक है। ये सभी लोग बालक को समाज तथा विद्यालयी क्रियाओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने में मदद करते हैं।

इन सब को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक स्तर पर निर्देशन के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं.


1. सभी प्रकार के कार्यकर्ताओं के कार्यों में तालमेल बिठाना जैसे- शिक्षक, स्कूल, समाज-सेवक के कार्य तथा निर्देशन प्रदान करने वाले व्यक्ति का कार्य इत्यादि


2. बच्चों को स्कूल के रीति-रिवाजों तथा स्कूल की कानून व्यवस्था के अनुसार ढालने में सहायता का उद्देश्य ।


3. स्कूल-क्रियाओं के प्रति उचित दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता का उद्देश्य ।


4. बच्चों के शारीरिक तथा संवेगात्मक स्थिरता के विकास में सहायता का उद्देश्य ।


5. स्कूल में समायोजन सम्बन्धी समस्याओं का पता करना तथा उन्हें नियंत्रित करने का उद्देश्य ।


6. बच्चों को स्वावलम्बी बनाने का उद्देश्य


7. बच्चों में सहयोग की भावना पैदा करने का उद्देश्य


8. प्राथमिक स्तर से स्कूल के अगले उच्च स्तर के लिए बच्चों को तैयार करने का उद्देश्य ।


2 माध्यमिक स्तर पर निर्देशन के उद्देश्य :- बच्चा प्राथमिक स्तर से निकलकर माध्यमिक स्तर में प्रवेश करता है। इस स्तर पर निर्देशन का कार्य क्षेत्र प्राथमिक स्तर पर निर्देशन के कार्य-क्षेत्र की अपेक्षा अधिक व्यापक होता है। माध्यमिक स्तर पर बालक किशोरावस्था में प्रवेश कर जाता है, उसके संवेग, चिन्तन, निर्णय प्रक्रिया में बदलाव आता है इसके अतिरिक्त इस स्तर पर विद्यार्थी स्वयं को व्यक्तिगत, सामाजिक, सांवेगिक, आर्थिक आदि समस्याओं से घिरा पाता है तथा इन समस्याओं का समाधान अति आवश्यक हो जाता है।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए निर्देशन की व्यापक एवं संगठित सेवाओं की आवश्यकता बनी रहती है।


अतः माध्यमिक स्तर पर निर्देशन के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं-


1. प्राथमिक स्तर से निकलकर जब बालक माध्यमिक स्तर में आता है तब उसे नये वातावरण का सामना में करना पड़ता है इसके अतिरिक्त उसे नये साथियों, अध्यापकों के बीच तालमेल बिठाने में कठिनाई उत्पन्न होती है अतः माध्यमिक स्तर पर निर्देशन का यह उद्देश्य होना चाहिए कि वह विद्यार्थियों की इन समस्याओं के समाधान में उसकी सहायता करें।


2. माध्यमिक स्तर पर आकर विद्यार्थियों के समक्ष विषय चयन में कठिनाई की समस्या उत्पन्न हो जाती है अतः माध्यमिक स्तर पर बालकों में विषय चयन की समझ पैदा करना निर्देशन का उद्देश्य होना चाहिए।


3. माध्यमिक स्कूलों में विद्यमान निर्देशन सेवा का उद्देश्य बालकों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को दूर करना होना चाहिए ।


4. विद्यार्थियों को शिक्षा के नये उद्देश्यों से परिचित करवाने में सहायता करना


5. अच्छे नियोजन की आवश्यकता से विद्यार्थियों को परिचित करवाने में सहायता करना


6. बालक की संवेगात्मक तथा व्यक्तिगत समस्याओं को दूर करने में सहायता करना


7. पाठ्य सहगामी क्रियाओं के बारे में छात्रों को उचित निर्देशन प्रदान करना।


8. विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए उचित अभिप्रेरणा पैदा करना ।


3 महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय स्तर पर निर्देशन के उद्देश्य :- जब बालक माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में प्रवेश करता है तब वह पूर्ण युवक के रूप में विकसित हो चुका होता है और उसके व्यक्तित्व का अपना एक स्वरूप बन जाता है। उनमें से बहुतों के समक्ष स्पष्ट उद्देश्य होते हैं । लेकिन बहुत से विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं जो कॉलेज में आकर भी विभिन्न समस्याओं से स्वयं को घिरा पाते हैं।


इस प्रकार की परिस्थितियों में उच्च शिक्षा के निर्देशन कार्यक्रम का उद्देश्य यही रहता है कि ऐसे दोनों प्रकार के विद्यार्थियों की तात्कालिक आवश्यकताओं की ओर ध्यान दें।

जो विभिन्न कारणों से अपने कॉलेज के कार्यों में उन्नति करने के योग्य नहीं रह पाते तथा वे जो अपनी प्रतिभा का सदुपयोग उत्तम शैक्षिक सुविधाओं के कारण अपने कार्य के विभिन्न क्षेत्रों में भली-भाँति कर सकते हैं। अतः उच्च शिक्षा के स्तर पर निर्देशन के उद्देश्यों को निम्नलिखित ढंग से भी प्रस्तुत किया जा सकता है


1. कॉलेज तथा विश्वविद्यालय में प्रवेश आदि से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएँ उपलब्ध करवाना। 


2. कॉलेज तथा विश्वविद्यालय में सहगामी क्रियाओं के सम्बन्ध में जानकारी देना ।


3. विद्यार्थियों को उनकी आर्थिक कठिनाईयों को दूर करने में सहायता प्रदान करना


4. विद्यार्थियों को विषयों के चयन में सहायता प्रदान करना जिससे वे अपने भावी कार्यक्रम एवं लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।


5. विद्यार्थियों की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में सहायता करना।


6. विद्यार्थियों को अध्ययन के साथ-साथ रोजगार प्राप्त करने में सहायता देना ।


7. विद्यार्थियों को आगामी अध्ययन के अवसरों (स्थनीय, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय या विदेशों में) की जानकारी प्रदान करना।


इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्देशन कार्यक्रमों के उद्देश्य भी विस्तृत होते हैं तथा इनमें सुधार लाने के लिए और इनके परिणामों का विश्लेषण करने के लिए इस कार्यक्रम का प्रगतिशील होना अति आवश्यक है। इसके लिए हमें शोध कार्य पर अधिक बल देना चाहिए ताकि इस कार्यक्रम को और अधिक प्रभावशाली ढंग से लागू किया जा सके। शांति मैत्री