बजटरी नियन्त्रण का संगठन अथवा बजटरी नियन्त्रण पद्धति की रूपरेखा - Organization of Budgetary Control or Outline of Budgetary Control Method
बजटरी नियन्त्रण का संगठन अथवा बजटरी नियन्त्रण पद्धति की रूपरेखा - Organization of Budgetary Control or Outline of Budgetary Control Method
बजटरी नियन्त्रण पद्धति का तात्पर्य सावधानीपूर्वक तैयार की गई उस योजना से है जिसके अन्तर्गत किसी निश्चित अवधि की आय परिव्यय व अन्य व्ययों का पूर्वानुमान करके विक्रय, उत्पादन व प्रशासनिक क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित किया जाता है तथा बजट के अंकों व वास्तविक अंकों की निरन्तर तुलना करके अन्तर के कारणों का पता लगाया जाता है और अवांछनीय कारणों को दूर करके वांछनीय कारणों को प्रोत्साहित करने का प्रयत्न किया जाता है।
बजटरी निन्त्रण प्रबन्ध - नियन्त्रण की एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसकी प्रभावशीलता इसके संगठन की कुशलता पर निर्भर करती है। किसी व्यावसायिक संस्था में बजटरी नियन्त्रण पद्धति का रूप व्यवसाय के आकार व प्रकृति पर निर्भर करता है। एक बड़ी संस्था में इस पद्धति के स्थापन के लिए निम्नलिखित कदम उठाना आवश्यक है -
(1) बजट केन्द्रों की स्थापना सर्वप्रथम संस्था में बजट केन्द्र स्थापित किये जायें। प्रत्येक केन्द्र के अध्यक्ष के सहयोग से ही उस केन्द्र का बजट तैयार किया जाता है
(2) पर्याप्त लेखा अभिलेखों का समावेश : व्यवसाय में प्रयुक्त लेखांकन पद्धति में बजटरी नियन्त्रण पद्धति की आवश्यकात के अनुकूल समुचित समायोजन किये जायें। अतः लेखांकन पद्धति में सूचनाओं को इस प्रकार अभिलिखित व विश्लेषित किया जाये जिससे प्रत्येक बजट केन्द्र से सम्बन्धित सभी आवश्यक सूचनायें सरलता से प्राप्त हो जायें।
(3) बजट तकनीक के बारे में सामान्य निर्देश: संस्था में जो भी व्यक्ति इस पद्धति के क्रियान्वयन से सम्बन्ध रखते हैं (अर्थात् विभिन्न विभागाध्यक्ष ) उन्हें बजट तकनीक के विषय में पर्यापत शिक्षा दी जाये।
प्रत्येक व्यक्ति को उसके विभाग के लिए निर्धारित लक्ष्यों तथा इन लक्ष्यों की प्राप्ति में उससे अपेक्षित भूमिका से अवगत कराया जाये।
(4) संगठन चार्ट का निर्माण : इसमें प्रबन्ध के प्रत्येक सदस्य के कार्यात्मक उत्तरदायित्वों को परिभाषित किया जाता है जिससे प्रत्येक सदस्य के कार्यात्मक उत्तरदायित्वों को परिभाषित किया जाता है जिससे प्रत्येक सदस्या को संस्था में उसी स्थिति तथा दूसरे सदस्यों से उसके सम्बन्ध की जानकारी हो जाये। संगठन चार्ट स्पष्टतया संस्था के आकार व प्रकृति पर निर्भर करता है। एक बड़ी संस्था के लिए संगठन चार्ट का उचित प्रारूप नीचे दिया गया है।
(5) बजट समिति की स्थापना: छोटी संस्थाओं में लेखापाल ही सर्वोच्च प्रबन्ध व विभिन्न विभागाध्यक्षों के परामर्श से बजट तैयार करता है किन्तु बड़ी संस्थाओं में एक बजट समिति स्थापित कर दी जाती है जो कि बजट निर्माण व बजट पद्धति के सम्पूर्ण नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी होती है । संस्था के सभी महत्वपूर्ण विभागों के अध्यक्ष इस समिति के सदस्य होते हैं। बजट समिति का सचिव प्रबन्ध-लेखापाल होता है, जिसे बजट अधिकारी कहते हैं तथा अध्यक्ष प्रबन्ध संचालक होता है। संस्था के बजट निर्माण व संचालन में इस समिति की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। यह समिति विभिन्न विभागों से प्राप्त बजट पूर्वानुमानों पर विचार करती है, उनमें समन्वय स्थापित करती है तथा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल पूर्वानुमान तैयार करने के लिए आवश्यक निर्देश देती है। इस प्रकार इस समिति के विभिन्न कार्य निम्नलिखित है:
(1) पूर्वानुमान में सहायता के लिए प्रबन्ध को आवश्यक भूतकालीन सूचनायें प्रदान करना ।
(2) बजट अपेक्षाओं, बजट अनुमानों के प्राप्त होने की अन्तिम तिथि आदि बातों के सम्बन्ध में निर्देश जारी करना।
(3) बजट के सम्बन्ध में प्रबन्ध की सामान्य नीतियों को स्पष्ट करना ।
(4) विभिन्न विभागाध्यक्षों को बजट निर्माण के लिये आवश्यक भूतकालीन समंक प्रदान करना।
(5) बजटों के निर्माण में सलाह देना
(6) बजटों पर पुनर्विचार करना
(7) विभिन्न विभागीय बजटों में समन्वय स्थापित करना ।
(8) बजटों में परिवर्तन और सुधार के लिए सुझाव देना।
( 9 ) बजटों पर स्वीकृति प्रदान करना।
( 10 ) नियत अवधि के अन्तर्गत बजट तैयार करना व प्रबन्ध के समक्ष पेश करना ।
( 11 ) जहां आवश्यक हो, बजट सारांश तैयार करना
। (12) विभिन्न विभागीय बजटों पर प्रबन्ध का अनुमोदन लेना तथा उनसे मास्टर बजट तैयार करना ।
(13) बजटीय और वास्तविक परिणामों की तुलना तथा विश्लेषण करना ।
( 14 ) पूछे जाने पर प्रबन्ध को सुधारात्मक कार्यवाही के लिए सलाह देना ।
( 15 ) समस्त बजट कार्यक्रम में समन्वय स्थापित करना ।
(6) बजट पुस्तिका का निर्माण : सी.आई.एम.ए. लंदन के अनुसार, "सामान्यता यह खुले पन्नों के रूप में होती है जिससे आवश्यकता पड़ने पर उसमें सरलता से परिवर्तन किये जा सकें तथा समय- समय पर अधिकारियों की मांग पर उसके उचित भाग उन्हें नियमित किये जा सकें।
इस पुस्तिका के आरम्भ में एक विषय सूची भी दी जाती है। इस पुस्तिका में सामान्यतया निम्नलिखित सूचनायें दी होती है :
( अ ) पद्धति का वर्णन और इसके उद्देश्य
(ब) पद्धति के संचालन में अपनायी जाने वाली विधि ।
(स) विभिन्न अधिकारियों के उत्तरदायित्वों व कर्तव्यों की व्याख्या ।
(द) प्रत्येक बजट अवधि के लिए आवश्यक प्रतिवेदन व विवरण
(7) बजट अवधि का निर्धारण : सी.आई.एम.ए. लंदन के अनुसार, सभी बजटों के लिए कोई एक प्रमापित अवधि नहीं निर्धारित की जा सकती है। बजट अवधि ऐसी होनी चाहिये जिसमें सरलता से व्यावसायिक भविष्यवाणी की जा सके। यह अवधि व्यवसाय की प्रकृति, उत्पादन विधि,
भविष्य में बाजार दशाओं की स्थिरता, नियन्त्रण की सीमा आदि बातों पर निर्भर करती है। सामान्यतया बजट अवधि एक वर्ष रखी जाती है परन्तु कुछ व्यवसायों में छमाही या तिमाही बजट तैयार करना आवश्यक हो सकता है। इसी तरह कुछ व्यवसायों के परिणामें दीर्घकाल में स्पष्ट होते हैं। अतः उनके लिए लम्बी अवधि के बजट बनाये जाते हैं। सामयिक या मौसमी परिवर्तन वाले व्यवसायों (जैसे चीनी मिल ) में बजट अवधि ऐसी रखी जाती है जिसमें क्रियाओं का चक्र सम्मिलित हो जाये। यह आवश्यक नहीं है कि एक व्यवसाय में सभी बजट एक ही अवधि के हों। क्रय बजट वार्षिक बनाया जाता है जबकि विक्रय बजट 3 या 5 वर्ष के लिए बनाया जा सकता है।
नियन्त्रण के उद्देश्य से बजट अवधि को कई लघु अवधियों में बांट दिया जाता है जिन्हें नियन्त्रण अवधि कहते हैं। नियन्त्रण अवधि व्यवसाय की प्रकृति तथा प्रत्येक उत्तरदायित्व केन्द्र की विशिष्टता के आधार पर निश्चित की जाती है।
(8) मुख्य कारक का निर्धारण व्यावसायिक बजटन में मुख्य कारक' का विशेष महत्व रहता हैं यह कार्यात्मक बजटों के तैयार करने में प्राथमिकतायें निर्धारित करता है। सी. आई.एम.ए. लंदन के अनुसार, " यह वह कारक है जिसके प्रभाव की सीमा, कार्यात्मक बजटों के समुचित रूप में पूर्णतया योग्य होने को आश्वस्त करने के लिए पहले आँक लेना चाहिये।" इसे रोक लगाने वाला कारक', 'शासी कारक' अथवा 'मुख्य बजट कारक' भी कहते हैं। यह व्यवसाय की उत्पादन और / अथवा विक्रय क्षमता को सीमित करता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि प्रत्येक बजट अवधि में उसी मुख्य कारक का होना आवश्यक नहीं। परिस्थितियों में परिवर्तन आने पर मुख्य कारक भी बदल जाता है। प्रत्येक उद्योग में कोई न कोई मुख्य कारक अवश्य रहता है जो कि व्यवसाय की लाभार्जन क्षमता को सीमित करता है। एक उद्योग में एक ही समय पर दो या अधिक प्रमुख कारक पाये जा सकते हैं। उद्योगों में सामान्यतया निम्न मुख्य कारक पाये जाते हैं:
(1) सामग्री - (अ) पूर्ति की उपलब्धता
(ब) लाइसेंस, कोटा आदि के कारण प्रतिबन्ध |
(2) श्रम- (अ) श्रमिकों की सामान्य कमी
(ब) कुछ प्रमुख विधियों में श्रमिकों की कमी।
(3) संयंत्र - (अ) पूर्ति की कमी के कारण अपर्याप्त क्षमता
(ब) पूंजी की कमी के कारण अपर्याप्त क्षमता ।
(स) स्थान की कमी के कारण अपर्याप्त क्षमता । (द) बाजारों की कमी के कारण अपर्याप्त क्षमता ।
(इ) कुछ प्रमुख विधियों में अड़चने ।
(4) विक्रय - (अ) कम उपभोक्ता मांग या उपभोक्ताओं का विरोध ।
(ब) धन की कमी के कारण अपर्याप्त या अकुशल विज्ञापन
(स) अच्छे व अनुभवी विक्रेताओं की कमी।
(5) प्रबन्ध - (अ) पूंजी की कमी।
(ब) तकनीकी ज्ञान की कमी।
(स) कुशल प्रशासनिक अधिकारियों की कमी।
(द) उत्पादन की डिजाइन और पद्धतियों में अपर्याप्त शोध ।
(इ) नीति निर्णय, जैसे विक्रय मूल्य को पूर्व स्तर पर बनाये रखने के लिए उत्पादन सीमित करना।
किसी उद्योग में उपर्युक्त में से कोई भी तत्व प्रमुख कारक हो सकता है। बजटन में इसका बहुत महत्व है क्योंकि यह विभागीय बजटों में प्राथमिकतायें निर्धारित करता हैं व्यवसाय में जो प्रमुख बजट कारक होता है,
उसी क्रिया का बजट पहले तैयार किया जाता है। इस कारक के ही कारण विभागीय बजटों के समन्वय में जटिलतायें उत्पन्न होती है। यह कारक प्रबन्ध की उत्पादन और विक्रय नीतियों को भी प्रभावित करता है। अधिकतर उद्योगों में विक्रय ही मुख्य कारक रहता है। अतः सबसे पहले विक्रय बजट तैयार किया जाता है जिसके आधार पर अन्य बजटों में आवश्यक समायोजन किये जाते हैं।
बजट तैयार करते समय प्रबन्धक को बजट कारक का पता कर लेना चाहिये और यदि हो सके तो उसे दूर करने के लिए आवश्यक प्रयास करने चाहिये। किसी कारक का एक स्थायी रूप से प्रमुख कारक होना आवश्यक नहीं। वास्तव में अधिकतर दशाओं में यह केवल अल्पकालिक होता है। दीर्घकाल में प्रबन्ध लगभग प्रत्येक कारक पर विजय प्राप्त कर सकता है। अपने प्रयत्नों द्वारा प्रबन्ध अल्पकाल में भी कुछ सीमा तक इस पर विजय प्राप्त कर सकता है।
( 9 ) क्रियाशीलता का स्तर निश्चित करना संस्था में क्रियाशीलता का सामान्य स्तर निश्चित करना बहुत आवश्यक है। यह पूर्वानुमान में बहुत महत्वपूर्ण है। इसी के आधार पर सामग्री व श्रम आवश्यकता की भविष्यवाणी की जाती है। इसी से ही उत्पादन उपरिव्यय बजट तैयार किया जाता है।
(10) बजट प्रतिवेदनें : केवल बजट बनाने का कोई लाभ नहीं जब तक कि वास्तविक परिणामों की उनके लिए निर्धारित बजटीय अंकों से तुलना न की जाये। इस तुलना के परिणाम शीघ्र ही प्रबन्ध को सूचित किये जाने चाहिए। अतः वास्तविक और बजटीय व्ययों के बीच अन्तर तथा उनके कारण और उनके लिये उत्तरदायी विभाग या अधिकारी का स्पष्ट उल्लेख करते हुए बजट प्रतिवेदनें आवधिक प्रस्तुत की जानी चाहिए जिससे प्रबन्ध समय पर समुचित सुधारात्मक कार्यवाही कर सके।
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