स्त्रीवादी सिद्धांत की अन्य धाराएं - Other Currents of Feminist Theory

स्त्रीवादी सिद्धांत की अन्य धाराएं - Other Currents of Feminist Theory


उदारवादी स्त्रीवाद (लिबरल फेमिनिज्म)


उदारवादी स्त्रीवाद का प्रारंभ 1961 में जॉन एफ कैनेडी के प्रयासों से कमीशन ऑन द स्टेट्स ऑफ वीमेन का गठन हुआ। इस कमीशन से असंतुष्ट होने पर बेट्टी फ्राइटन आदि स्त्रियों ने सिविल राइट्स संगठन और नेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर वीमेन की 1966 में स्थापना की, जिसमें अधिकतर सफेदपोश मध्यवर्गीय स्त्रियाँ सदस्या थीं और इनकी राजनीति उदारवादी स्त्रीवाद' पर जान स्टुअर्ट मिल की पुस्तक द सब्जेक्शन ऑफ दि वीमेन' पर आधारित थी, जिसमें मिल ने बताया था कि भार ढोना, आदि कुछ गतिविधियाँ ऐसी हैं, जिनमें स्त्रियाँ पुरूषों से उन्नीस पड़ती हैं। उनका कहना है कि स्त्री और पुरुषों के बीच जीवशास्त्रीय विषमताएँ अवश्य हैं, पर उनकी बौद्धिक और नैतिक क्षमताएँ बराबर हैं। उनके अनुसार स्त्री और पुरूषों की मानसिक और स्वभावगत विशिष्टताओं को साझा कर लेना चाहिए।


जेम्स स्टुर्बा ने भी इसी संदर्भ में कहा कि सभी कार्यालयों ( दफ़्तर मिल, आदि) के काम के घंटे इतने लचीले होने चाहिए कि माँ और बाप, दोनों बारी-बारी से बेबी सिटिंग कर सकें। उदारवादी स्त्रीवाद के क्षेत्र में स्त्रियाँ की राजनीतिक समानता तथा संपत्ति के अधिकार के लिए जिन महिलाओं ने लंबा संघर्ष किया उनमें स्टैनली, ग्लोरिया, सूसन एथेनी, लूसी स्टोन, एलिजाबेथ हूकर आदि का नाम महत्वपूर्ण है।


उग्रवादी स्त्रीवाद (रैडिकल फेमिनिज्म)


1968 में टाइ-ग्रेस ऐटकिन्सन के नेतृत्व में उदारवादी ग्रुप से रैडिकल ग्रुप अलग हो गया। उनका यह मानना था कि थोड़ा-बहुत सुधार से कुछ होने वाला नहीं है। संघर्ष पुरुष से नहीं पितृसत्तात्मक समाज से होना चाहिए।

योजनाबद्ध ढंग से इसकी एक-एक संस्था में, विशेषकर परिवार, चर्च (कोई भी धार्मिक निकाय) और एकेडेमी (विश्वविद्यालय आदि) में, वैधानिक, राजनीतिक और आर्थिक ढंग के संरचनात्मक परिवर्तन घटित कराए जाने चाहिए। साहित्यिक समालोचना में इमेजेज ऑफ विमेन' आंदोलन इन्हीं उग्रवाद स्त्रीवादियों का है।


शुलमिथ फायरस्टोन की द डायलेक्टिक ऑफ सेक्स इस चिंतन के समर्थन में एक रोचक पुस्तक है। इस पुस्तक में वे गर्भधारण को 'बार्बेरिक' कहती हैं। आगे चलकर उग्रवादी स्त्रीवाद ने स्त्रियों के गर्भधारण को उनके विकास में बाधक बताते हुए कहा है कि प्रजनन और शिशु संरक्षण पर पुरुषों का सीधा नियंत्रण तोड़ने के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ :


1. गर्भनिरोध और गर्भधारण संबंधी सारे निर्णय उनके हों,


2. यह उन पर निर्भर करे कि वे बच्चों को अकेली पालना चाहती है अथवा माँ या किसी अन्य रिश्तेदार के सहयोग से या फिर सरकारी / गैर-सरकारी डे केयर केंद्रों की सहायता से।


मनोविश्लेषणात्मक स्त्रीवाद


मनोविश्लेषणात्मक स्त्रीवाद फ्रॉयड की मान्यताओं का विरोध करता है। फ्रॉयड की यह मान्यता है कि शिश्न बोध होते ही पुरुषों में प्राक्सडीपीय अवस्था के आत्यंतिक मातृमोह से सायास मुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जो उन्हें सामाजिकता, अनुशासनप्रियता तथा निर्णयात्मकता से भर देती है। चूँकि स्त्रियों को इस प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ता है अतः वे पुरुषों की तुलना में कम अनुशासित कम सामाजिक, कोमल और कमजोर रह जाती हैं।


मनोविश्लेषणात्मक स्त्रीवाद स्त्रियों की मातृमूलक संवेदनाओं का सूक्ष्म अध्ययन करता है। नैन्सी चोदोरोव स्त्रियों के अपनी माँ से अधिक जुड़ाव को स्त्रियों की भावनात्मक स्थिरता का कारण मानती हैं। एलिजाबैथ स्पेलमैन अपने लेख "Gender in the context of race and class” में मानती है कि श्वेत और अश्वेत, संपन्न और विपन्न माताओं की अंतश्चेतना भी बच्चों को जो कथाएँ ज्यादातर सुनाती हैं, वे दु:खांत होती हैं और आने वाले दिनों में जो अपमान और पराधीनता उनके हिस्से में आना है, उसके लिए उन्हें तैयार करने वाली कहानियाँ होती हैं। इसके विपरीत समृद्ध देशों की खुशहाल, निश्चित माताएं अपने बच्चों का मनोबल बढ़ाने वाली सुखांत परी कथाएं सुनाती हैं। उत्तरआधुनिक स्त्रीवाद (पोस्टमॉडर्न फेमिनिज्म)


उत्तरआधुनिक स्त्रीविमर्श की मान्यताएं कई बिंदुओं पर केंद्रित हैं। वर्ग, नस्ल और संस्कृतियों के अनुसार स्त्री का अनुभूतिमंडल भी बदलता रहा है और किसी एक केंद्रीय सतत ठोस सत्य की उद्घोषणा स्त्री विमर्श के संदर्भ में भी असंभव है। पितृसत्तात्मक समाज की भाषा स्त्रियों के साथ न्याय नहीं करती, इसलिए स्त्रियों को चाहिए कि वह भाषात्मक प्रयोगों के द्वारा भाषा की सरहदों को भी तोड़े।