अतिपूंजीकरण एवं अल्पपूंजीकरण - Overcapitalization and Undercapitalization
अतिपूंजीकरण एवं अल्पपूंजीकरण - Overcapitalization and Undercapitalization
अतिपूंजीकरण
जब कंपनी / व्यवसाय में उसके आवश्यकता के जादा पूंजी राशी जमा की जाती है तब उसे अतिपूजीकरण कहते है।
किसी कंपनी का आय उस कंपनी के निवेष किए गए कुल पुजी राशी से मेल / सुसंगत / नहीं करता तब उस स्थिती को अति पूजीकरण की स्थिती कहा जाता है।
अनेक विद्वानों ने अति पूजीकरण की परिभाषा निम्ननांकित के अनुसार की है।
1) गरस्टेन बर्ग (Mr. Gerstenberg) के अनुसार- "कंपनी द्वारा निर्गमित किए गए अंश (Share) एवं ऋणपत्रो पर उचित लाभ देने लायक अगर कंपनी की आय पर्याप्त नहीं रहने की स्थिति में अथवा देयता प्रतिभूतीयों का पूस्त की मूल्य यह संपत्ती के वर्तमान मूल्यों से जादा है, ऐसे स्थिति में कंपनी में अतिपूजीकरण हुआ है ऐसा माना जाता है।"
2 ) होगलंड ( Mr. Hoagland) के अनुसार:- जब किसी भी कंपनी के अश (Share) एवं ऋणपत्र (Debenture) के सममूल्यों का योग यह उस कंपनी के स्थिर सपत्ती के वास्तविक मुल्यो से जादा होता है तब उस कंपनी में अति पूजीकरण हुआ है ऐसा समजा जाता है।
3) बोनविले, डिवे एवं केली के अनुसार:- जब कोई व्यवसाय अपने अदत्त प्रतिभूती पर उचित दर (Interest) प्राप्त करने के असफल होता है तब उस स्थिति में अतिपूजीकरण हुआ है ऐसा कहा जाता है।
अतिपूजीकरण की अवस्था स्थिर संपत्ती के संदर्भ में उसके वास्तविक मुल्य पर निर्भर रहती है। अगर कंपनी के स्थिर संपत्ती का वास्तविक मुल्य किसी समय बिंदू पर स्थिर संपत्ती के मुल्य से कम रहता है उस अवस्था में कंपनी में अतिपूजीकरण हुआ है ऐसा माना जाता है।
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