पितृसत्ता - patriarchy
पितृसत्ता - patriarchy
प्राचीन काल से भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है। समाज में प्रचलित रीति रिवाजो के कारण पितृसत्ता आज भी विद्यमान है। समाज में मानव जाति को दो वर्ग में बाटा गया है - 1. पुरुष वर्ग 2. महिला वर्ग । चाहे वह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, व्यावहारिक आदि कोई भी क्षेत्र हो हर जगह यह लिंग भेद नज़र आता है। प्राचीन काल से 3000 वर्षों से हम देखे तो वेदों, ग्रन्थों, पुराणों में सभी जगह पुरुष की प्रधानता के प्रमाण मिलते है। महिला की स्थिति प्राचीन काल से लेकर आज तक विचारणीय है।
पुरुष को समाज में, परिवार में सभी जगह पर प्रधान माना जाता था जैसे किसी नगर का शासक पुरुष होता था । नारी को शुरू से ही दासी के रूप में प्रदर्शित किया गया है। जिसका प्रमुख कार्य अपने परिवार एवं समाज के नियमों, आदर्शों का आस्था के साथ पालन करना तथा परिवार के अन्दर रहकर बच्चों की देख भाल करना था । नारी का शोषण प्राचीन समय से ही होता आ रहा है। सभी धर्मो में नारी का स्थान अत्यंत दयनीय था। उनको हमेशा हेय या निम्न दृष्टि से देखा जाता था जैसे हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के पंडित, मुस्लिम में मौलाना (मुल्ला), सिक्ख में गुरु, ईसाई में पोप (फादर) यह सभी उदाहरण समाज में पुरुष की प्रधानता को प्रदर्शित करते है। समाज की दृष्टि से महिला का जन्म केवल घर के काम-काजों के लिए हुआ है। समाज में व्याप्त कई रीति-रिवाज जैसे पिंड दान करना, अंतिम संस्कार, उपनयन संस्कार आदि पुरुषों को करने का अधिकार है महिलाओं को नहीं।
जब परिवार में कोई लड़की जन्म लेती है तो उसका लालन-पालन लड़कों से अलग होता है। उसे लड़कों से कमज़ोर समझा जाता है। उसे अगर बाज़ार भी जाना होता है तो उसके साथ उसके भाई या पिता जाते है अतः परिवार ही लड़कियों को यह अहसास कराता है कि वे कमज़ोर है जिससे उन्हें दूसरो पर निर्भर होने की आदत पड़ जाती है। इस प्रकार परिवार ही जेंडर भेद को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
"पितृसत्ता शब्द अंग्रेजी के पैट्रीआर्की का हिंदी रूपांतरण है। जो पैट्रीओक से बना है। पैट्री आर्क का अर्थ प्राधिधर्माध्यक्ष होता है।
सीमन द बुअर के अनुसार " औरत जन्म नहीं लेती बल्कि बना दी जाती है।"
पितृसत्ता से आशय " परिवार में पिता की सर्वोच्चिता तथा उसके प्रशासन की प्रमुखता को दर्शाते है" फायरस्टोन
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