पाउलो फ्रेरे - PAULO FREIRE
पाउलो फ्रेरे - PAULO FREIRE
परिचय
पाउलो फेरे एक महान चि तक दार्शनिक तथा शिक्षक और धार्मिक विचारक के रूप में मानव व्यवहार समाज की व्यवस्था, आवश्यकता और इसाई धर्म पर अपने विचार व्यक्त किए। वे शिक्षा को व्यक्तित्व विकास का साधन मानते थे। उन्होंने औद्योगिक शिक्षा और विकास पर विशेष बल दिया। उन्होंने सामाजिक विकास के लिए योग्य व्यक्तियों की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार व्यक्ति साक्षर और शिक्षित होकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अच्छी तरह कर सकता है। फेरे का जीवन दर्शन ईसा मसीह के जीवन दर्शन से प्रभावित था। वे ईसा मसीह के अनुयायी थे तथा मानवतावादी शिक्षा के पक्षधर थे। पाठ्यक्रम में इतिहास भूगोल, गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा धार्मिक विषयों को उचित स्थान देने के पक्षधर थे। वे आधुनिक विश्व में साक्षरता कार्यक्रमों के प्रणेता कहे जाते हैं।
फ्रेरे का शिक्षा दर्शन (Freire's Educational Philosophy)
आधुनिक विश्व में अनेकानेक विषम परिस्थितियों के कारण व्यक्ति अपने स्वार्थ में इतना ग्रसित है कि वह दूसरो को भी क्षति पहुंचाने में थोड़ा भी संकोच नहीं करता। अनेकानेक मानसिक यातनाओं और कुपरिस्थितियों से वह यसित है। सामाजिक प्रगति के बाद भी मानव को आत्मीय शांति नहीं है। वह स्वनिर्मित वस्तुओं का दास हो गया है। सामाजिक न्याय का विचार सम्प्रत्यय) विकसित नहीं हो पाया है, जिसके कारण मानवीय दृष्टिकोण संकुचित और एकागी हो गया है। यही कारण है कि वह अपने तुच्छ स्वार्थ के खातिर दूसरों की आवश्यकताओं को नहीं समझ पाता और अन्यायी हो जाता है। आज हम समाजबाद की बात करते हैं। समाजवाद और पूंजीबाद दोनों की कल्पना आर्थिक मनुष्य की कल्पना है जो अर्थ और काम को एकमात्र पुरुषार्थ मानती है, लेकिन आर्थिक मनुष्य एक अमूर्त प्रत्यय है। मानवतावाद अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थी को महत्व देकर सम्पूर्ण मानव को इकाई मानकर चलता है। विद्यालयों में छात्रों और अध्यापको की अनेक समस्याएँ हैं।
आये दिन धरना, घेराव, तोड़-फोड़, मार-पीट इत्यादि अभद्रतायें हो रही है। इसका कारण मानवतावादी शिक्षा का अभाव है। मानवतावादी शिक्षा द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सौहर्द, प्रेम, करुणा, प्रसन्नता का संचार होगा और सर्वत्र शांति और भातृ त्व होगा।
फेरे ने ठीक ही कहा है कि निरंकुश राज्य और संपन्न लोग नहीं चाहते कि किसान पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में उठ खड़े हो शिक्षा दद्वारा उत्पीडितों, दलितों, किसानों, मजदूरों को साक्षर और शिक्षित करना आवश्यक है। मानवतावाद का यही संदेश है। फेरे ने जिस मानवताबाद को अपनाया, वह आज के मजदूर व दलित वर्ग के प्रति प्रेम से परिपूर्ण है। औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप मनुष्य मशीन के पुर्ज के समान हो गया जिससे विद्रोह की भावना का संचार हुआ नगरीकरण और औद्योगीकरण के फलस्वरूप मनुष्य का आवाज उठाना व विद्रोह करना ही मानवतावाद कहा जाएगा। मानवतावाद कल्पनाओं में नहीं अपितु बाह्य जगत में अस्तित्ववान है। यह विचारों, शुभाकांक्षाओं एवं सद्भावनाओं से ओत-प्रोत है। शिक्षा का यही उद्देश्य होना चाहिए।
पाठ्यक्रम (Curriculum):
फरे ने पाठ्यक्रम में मौलिक परिवर्तन की बात की है। वे मार्क्स के विचारों की तरफ आकर्षित हुए किंतु मार्क्स के सिद्धांतो को वै आँख मूंदकर नहीं स्वीकार कर पाए। मार्क्स की अनेक बातों से फेरे असहमत थे और उन्होंने उनकी आलोचना भी की। मार्क्स से वे प्रेरित हुए और उन्होंने सभी छात्रों को उनके अनुसार सामाजिक अंतर्विरोधों को समझने का परामर्श दिया। फेरे सात्र, एरिक फ्रॉम माओ, मार्टिनलूथर किंग के विचारों को पाठ्यक्रम का अंग बनाना चाहते थे। फ्रांज फैनन की पुस्तक संसार के अभागे लोग से वे बहुत प्रभावित थे। गणित इतिहास, भूगोल को पढ़ाना है किंतु प्रायः शिक्षार्थी इनमें फैल हो जाते हैं। इसलिए उनके अनुसार हम इनको सरल करके पढ़ाना है। करे पाठ्यक्रम को पुर्नगठित करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कहा कि दार्शनिकों कला शिक्षकों, भौतिक वैज्ञानिकों, गणितजा तथा समाज शास्त्रियों की सहायता की जरूरत है। पाठ्यक्रम को विस्तृत और उपयोगी बनाने के लिए उनकी सहायता कारगर सिद्ध होगी। शिक्षा, कला, नीतिशास्त्र, काम बासना, मानब अधिकार, खेल, सामाजिक बर्ग, भाषा, दार्शनिक विचार-धारा जैसी ज्ञान की शाखाओं पर चर्चा होनी चाहिए जिससे पाठ्यक्रम की पुर्नरचना ठीक से हो सके।
पाठ्यचर्या में अल्पसंख्यकों के मूल्यों को भीसामिल करना चाहिए। सामान्य वर्ग के लिए जो पाठ्यक्रम आवश्यक होता है, संभव है प्रभुत्व संपन्न लोगों के लिए वह हितकारी न हो । पाठ्यक्रम में समाजवाद व साम्यवाद के विचारों को आदरणीय स्थान देना चाहिए। फेरे लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप को पाठ्यक्रम में सामिल करना चाहते हैं, न कि उसके वर्तमान बिकृत रूप को।
शिक्षण विधि (Methods of Teaching):
फेरे के अनुसार साक्षरता का कोई अर्थ तभी है जब निरक्षर व्यक्ति दुनिया में अपनी स्थिति अपने काम और इस दुनिया में बदलाव लाने की अपनी क्षमता को लेकर सोचने लगे।
यही चैतना है। उन्हें पता चले कि दुनिया उनकी है, प्रभुत्व संपन्न वर्ग की नहीं। फरे के अनुसार शिक्षण विधि ऐसी होनी चाहिए जिससे सीखने वाला अपनी जिंदगी के अनुभव से दूर न हो। उसे ऐसा न लगे कि शिक्षा उसकी भाषा संस्कृति और परंपरा का निषेध करती है।
फेरे का सर्वप्रथम शैक्षिक कार्य उनके द्वारा संचालित साक्षरता का कार्यक्रम है। सन् 1968 के आसपास उनकी प्रसिद्ध पुस्तक संसार के समक्ष आई। पुस्तक का नाम है उत्पीडितका शिक्षाशास्त्र (पेझगाजी ऑफ द आप्रेस्ड)। इस पुस्तक में करे ने शिक्षा और साक्षरता कार्यक्रमों के बारे में अपने सिद्धांतों को लिखित रूप दिया है।
इस पुस्तक में यह दर्शाया गया है कि हम मानवीय कैसे बन सकते हैं। तीसरी दुनिया को अब गंदी बस्तियों में नहीं रहा है। उन्हें मानव के रूप में रहना है। उन्हें साक्षर व शिक्षित भी होना है लोग दलितों का उत्पीडन करते हैं। लोगों ने दलितों से सोचने और प्रश्न करने का अधिकार छीन लिया है। जिज्ञासु होने का अधिकार सभी को है न कि केवल संपन्न लोगों को। ब्राजील में वोट देने का अधिकार सोलह वर्ष के किशोर-किशोरी को भी है। मताधिकार की आयु सोलह वर्ष होने से ब्राजील वासियों के लिए साक्षरता का विशेष महत्व हो गया है। निरक्षरता किसी भी देश में जनतंत्र के लिए अभिशाप है। इस प्रकार पाउलो फेरे शिक्षा और साक्षरता आंदोलन के लिए विश्वभर के प्रणेता के रूप में जाने जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इन्होंने क्रांति की लौ को प्रज्वलित किया। वह विश्वभर में साक्षरता मिशन के रूप में सतत और अनवरत चलायमान है।
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