पावलव का प्रयोग - Pavlov's experiment
पावलव का प्रयोग - Pavlov's experiment
पावलव ने अपने प्रयोग के लिए कुत्तों का उपयोग किया इन्होंने कुत्तों को प्रयोग कार्य लिए पहले से प्रशिक्षित कर लिया था, ताकि वे प्रयोगशाला में मेज पर खड़े रहने में सहज अनुभव करें। इसके बाद पावलव ने कुत्ते के निचले जबड़े में शल्य क्रिया करके एक छेद बनाया जिसके द्वारा लार ग्रन्थि की वाहिनी ( Duct) का सम्बन्ध एक नली से कर दिया। ताकि लार ग्रन्थि से निकलने वाले रस की एक-एक बूँद शीशे की नलिका में एकत्रित होती रहे। इस नलिका का सम्बन्ध एक स्वचालित यंत्र से था जो कि किसी समय विशेष पर निकली लार की मात्रा का मापन करती रहती थी अर्थात् लार की मात्रा का मापन स्वत: रिकार्ड होता रहता था। कुत्ते को दिए जाने वाले भोजन का प्रबंध भी स्वचालित था। निश्चित समयावधि के बाद कुत्ते को निर्धारित मात्रा में भोजन मिलता था।
इस सारी व्यवस्था में एक व्यवस्था यह भी की हुई थी कि भोजन मिलने से कुछ समय पहले एक विद्युत घण्टी बजती थी। इसके बाद भोजन-पात्र में भोजन आता था। घण्टी तथा भेजन का यह क्रम बार-बार दोहराया गया। इसके बाद केवल घण्टी की आवाज से कुत्ते के लार का स्रवन होने लगा।
घण्टी की ध्वनि और भोजन को उत्तरोत्तर प्रयासों से जुड़कर लार के स्त्राव की मात्रा बढ़ने लगी । तीसरे प्रयास में 60 बूंद हो गई, जबकि समय पहले की अपेक्षा कम लगा मात्र 2 सैकण्ड का समय ही लगता था। इसके बाद घण्टी बजने पर भोजन नहीं दिया गया लेकिन लार के स्त्रावित होने की क्रिया होती रही।
इस प्रयोग से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि अस्वाभाविक उद्दीपन के प्रति स्वाभाविक अनुक्रिया का होना अनुबन्धित अनुक्रिया कहलाती है। जे. पी. गिलफोर्ड ने इस प्रयोग की व्याख्या इस प्रकार की है
"जब दो उद्दीपक एक साथ दिए जाते हैं जिनमें एक वास्तविक उद्दीपक होता है तथा दूसरा कृत्रिम उद्दीपक, कृत्रिम उद्दीपक भी उतना ही प्रभावी होता है जितना कि वास्तविक उद्दीपक "
3. शास्त्रीय अनुबन्ध सिद्धान्त के शैक्षिक निहितार्थ
शास्त्रीय अनुबन्ध सिद्धान्त के शैक्षिक निहितार्थ इस प्रकार हो सकते हैं
• छात्रों को पाठ्यक्रम सहभागी तथा पाठ्यक्रम में निर्धारित सभी कार्यों के लिए दिए जाने वाले कार्यों के लिए पुरस्कार तुरन्त (तत्क्षण) दिए जाएं ताकि उसमें अच्छाइयाँ बढ़ें।
• गृहकार्य आदि के माध्यम से सुलेख, वर्तनी की शुद्धता का विकास किया जाए।
• बच्चे प्राय: अनुचित माँग करते रहते है वे अनुचित माँगों के लिए रोना, फर्श पर लेटना, हाथ पैर पीटना, अतिथियों के सामने अपनी मांग प्रस्तुत करना आदि हथकण्डे अपना कर अपनी मांग पूरी कराने का प्रयास करते हैं।
कई बार बच्चे स्कूल जाने से ठीक पहले अनुचित रुप से जेब खर्च आदि की मांग करते हैं। कुछ बच्चे शिक्षण सामग्री को खरीदने का बहाना बनाकर अनुचित रूप से धन की माँग करते है। यदि अभिभावक उनके रोने आदि क्रियाओं से आगन्तुकों आदि के सामने उनकी माँग की पूर्ति कर देते है तो उनकी माँग करने की विधि को बल मिलता है और यह आदत बलवती हो जाती है।
• ऐसी परिस्थितियों में बालक को स्पष्ट रूप से बता दिया जाएं कि तुम्हारी यह माँग अनुचित है इसे हम पूरा नहीं करेंगे या तुम्हारी इस मरह माँग करना अनुचित है जिससे बच्चा स्थिति को ठीक प्रकार समझ जाए। आगे व इस प्रकार का व्यवहार नहीं करेगा। पूर्व में पड़ चुकी आदतों को असम्बद्ध करने के लिए यथोचित तरीके अपनाए जाने चाहिए।
• कई बार बच्चे किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से भय ग्रस्त हो जाते है।
भयग्रस्तता को दूर करने का तरीका कई बार उचित नहीं होता। जिससे बच्चे के मन में अनुचित ग्रन्थियों का विकास हो जाता है। भयग्रस्तता को अपनी समझ न देखकर उसका हँसी-मजाक न उड़ाकर उसके भय को दूर करने के लिए सबसे पहली आवश्यकता यह है कि बच्चे के भय को उसी के दृष्टि से देखें तथा सोच-विचार कर उचित विचार कर उचित निर्णय लें। उदाहरण के लिए एक बच्चे के मन में अध्यापकों के अनुचित व्यवहार तथा परीक्षा में कम अंक आने से गणित विषय के प्रति अनुचित भय का उदय हो गया है। गणित के अध्यापक के प्रति उसके व्यवहार में परिवर्तन आवश्यक है। यह गणित के अध्यापक के मित्रतापूर्वक व्यवहार से अत्यन्त सरल कार्य है। लगातार यह कहते रहना भी लाभकारी होगा कि गणित एक सरल विषय है। उसी की सरलता का उदाहरण देते रहें तथा शिक्षण के लिए ऐसी विधियों का चयन करें जिससे उसे गणित की कठिन लगने वाली समस्या अत्यन्त सरल लगने लगे। प्रयासों के लगातार उपयोग से गणित के प्रति उसकी अभिरूचि का विकास होगा।
कई बार बच्चों में बुरी आदतों का निर्माण हो जाता है यह सम्बन्ध द्वारा दूर किए जा सकते हैं। इस सम्बन्ध में स्वविवेक का उपयोग करना तथा उनकी सलाह से परिवार के समस्त सदस्यों को केस के प्रति अपने व्यवहार में परिवर्तन करना होता है।
स्किनर का क्रिया प्रसूत अनुबन्धन का सिद्धान्त (Skinner's Theory of Operant Conditioning)
बी. एफ. स्किनर ने 1930 से अपने अनुसंधान प्रारम्भ किए। सन् 1938 में उनकी पुस्तक 'Behavior of Animals' प्रकाशित हुई। इसके बाद सन् 1953 में उनकी पुस्तक 'Science of Human Behavior प्रकाशित हुई। इनके सिद्धान्त वर्णनात्मक व्यवहारवाद पर आधारित हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्त को क्रिया प्रसूत अनुबन्धन का सिद्धान्त कहा गया, जिसे हिन्दी में क्रिया
2. निश्चित अन्तराल अनुसूची- इस अनुसूची में निश्चित समयान्तराल के बाद पुनर्बलन दिया जाता है। समयान्तराल परिस्थितियों के ऊपर निर्भर करता है। वह मिनट, घण्टा, दिन, महीना, कुछ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए चूहे को प्रत्येक 3 मिनट बाद भोजन देना।
3. आंशिक अनुसूची - इस अनुसूची में कुछ निश्चित नहीं होता कि कब पुनर्बलन दिया जाए। पुनर्बलन किसी भी समय, किसी भी समयान्तराल पर दिया जा सकता है। स्किनर के सिद्धान्त के शैक्षिक निहितार्थ
स्किनर के सिद्धान्त के निम्नलिखित शैक्षिक निहितार्थ हैं-
1. बी.एफ. स्किनर के सिद्धान्त का सबसे महत्त्वपूर्ण शैक्षिक निहितार्थ यह है कि इन्होंने अपने सिद्धान्त के आधार पर 1945 में रेखीय अभिक्रमित अधिगम सामग्री तथा शिक्षण मशीनों का निर्माण किया। ये दोनों ही अधिगम पद्धति शत-प्रतिशत अधिगम की गारण्टी देती है। अभिक्रमित अधिगम में प्रतिपुष्टि तुरन्त दी जाती है। यह अधिगमकर्ता को निरन्तर सक्रिय बनाये रखती है। छोटे पदों को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। छात्रों को स्वगति से अध्ययन करने का अवसर उपलब्ध कराती है। उद्देश्य स्पष्ट होते हैं। यह एक छात्र केन्द्रित विधि है।
2. परिणाम की जानकारी तुरन्त कर देने से अधिगम कार्य तीव्र गति से होता है। अत: विद्यालयों में परीक्षा के अंक तथा अन्य पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं के परिणाम तुरन्त बताए जाते हैं.
3. उद्देश्य आधारित शिक्षण पर बल दिया जाने लगा है। स्किनर से पहले केवल सामान्य उद्देश्यों को ध्यान में रखकर ही शिक्षण किया जाता है। अब विभिन्न शैक्षिक पक्षों, जैसे- ज्ञान, भाव
4. तथा क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर विशिष्ट उद्देश्यों के आधार पर शिक्षण करने की विधि का श्रीगणेश हुआ है।
5. छात्रों को शिक्षित करते समय उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए जिससे वे स्वगति से मनोयोगपूर्वक अध्ययन कर सकें।
6. स्किनर ने बताया कि प्राणी अपनी गति के अनुसार अध्ययन करते हैं। प्रत्येक छात्र की अपनी क्षमता होती है, जिससे व्यक्तिगत विभेदों के आधार पर शिक्षण किया जाना उचित और उपयोगी है।
7. गृहकार्य के मूल्यांकन तथा शोधन का कार्य यथा शीघ्र किया जाना चाहिए तथा त्रुटियों की जानकारी तुरन्त दिया जाना बहुत आवश्यक है। गृहकार्य पर दिए जाने वाली आख्या सुन्दर, बहुत सुन्दर, श्रेष्ठ आदि, बालकों की अध्ययन में विशेष रूचि विकसित करती है।
8. छात्रों के साथ, अध्यापकों का व्यवहार प्रेरणात्मक होना चाहिए।
9. शारीरिक, शाब्दिक दण्ड ही नहीं बल्कि अध्यापक के चेहरे की भाव-भंगिमा भी अधिगमकर्त्ता को प्रभावित करती है। शारीरिक शाब्दिक दण्ड तो देने की नहीं चाहिए। अध्यापक अपने चेहरे के नाराजगी पूर्ण प्रदर्शन पर भी नियंत्रण करे तथा छात्रों के समक्ष प्रसन्नचित्त दिखाई दे।
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