वैयक्तिक स्वायत्तता - Personal autonomy

वैयक्तिक स्वायत्तता - Personal autonomy


स्वतंत्रता के नागरिक, धार्मिक, राजनैतिक मायनो के विकास के बाद उन्नीसवीं सदी के मध्य यह अनूभूति हुई कि स्वतंत्रता का एक और आयाम है-वैयक्तिक स्वतंत्रता या वैयक्तिक स्वायत्तता ।


वैयक्तिक स्वतंत्रता अथवा वैयक्तिक स्वायत्तता से आशय है उस स्वायत्तता के अधिकार का जो एक व्यक्ति को स्वयं की क्षमताओं के विकास करने व उन क्षमताओं को भरपूर उँचाईया प्रदान करने हेतु प्रयोग की जाती है। हम इस नज़रिये से भी देख सकते है कि जब किसी व्याक्ति पर दमनकारी कानून लागू होता है, व्यक्ति को अपनी स्वायत्तता का उल्लंघन महसूस होता है, जब शासन द्वारा बनाए नीति नियम किसी पर हानिकारक सिद्ध होते है तो व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत निज स्वायत्तता का प्रयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा करता है। इसी निज स्वायत्तता का ऋणात्मक पहलू व्यक्ति पर किसी भी प्रकार के अंकुश की अनुपस्थिति भी है। जब निज स्वायत्तता का धनात्मक पक्ष देखा जाए तो वह उस परिस्थिति को इंगित करती है जहाँ व्यक्ति अपनी क्षमताओं का विकास कर अपने मूल स्व की प्राप्त कर सकता है।

क्योंकि वैयक्तिक स्वायत्तता की संकल्पना जन्मजात संभावित होती है अतः इसे व्यक्ति की सबसे बहुमूल्यो निधि मानी जाती है। हर व्यक्ति को इसकी आवश्यकता है व्यक्ति में इसे दूसरे व्यक्तियों को अनुदान करने की भावना होनी चाहिए। वैयक्तिक स्वायत्तता का आदर्श गतिशील है और जैसे ही सभ्यता का विकास होता है और उसकी सीमाएं बढ़ती है स्वतंत्रता और स्वायत्तता का स्वरूप व अर्थ भी बदलता है।


ध्यान देने योग्य बात यह है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह जन्मजात स्वतंत्र है परन्तु पैदा समाज मे ही होता है। अतः स्वतंत्रता व स्वायत्तता वह है जो समाज उत्पन्न करता है क्योंकि व्यक्ति के हर अधिकार का स्रोत समाज होता है। व्यक्ति समाज से अलग या समाज के विरूद्ध कोई अधिकार निष्पादित करे तब वह उक्त समाज के सदस्यों का अधिकार हनन का भागी भी हो सकता है। अतः वैयक्तिक स्वतंत्रता का अर्थ ज्यादा प्रभावकारी तब होता है जब उसका अनुभव उस विस्तार से किया जाए जिसमें व्यक्ति द्वारा निष्पादित स्वतःस्फूर्त क्रियाओं का वातावरण रहे ना कि प्रतिबंधों का अभाव युक्त वातावरण।