वैयक्तिक निर्माणवाद - Personal constructivism

वैयक्तिक निर्माणवाद - Personal constructivism


वैयक्तिक या मनोवैज्ञानिक निर्माणवादी जैसे जीन पियाजे इस बात पर जोर देते हैं कि बच्चा कैसे अपने विचार, अवधारणा तथा आत्म-संप्रत्यय के आधार पर अपने वातावरण या दुनिया का अनुभव करता है, जिसमें वह रहता है। वैयक्तिक निर्माणवाद ऐसे शिक्षाशास्त्रीय प्रविधियों तथा युक्तियों को समावेशित करता है जो बच्चे के अभिरुचि तथा आवश्यकताओं का समर्थन करते हैं तथा उसके संज्ञानात्मक विकास को बढ़ावा देते हैं। यह अधिगम का असान्दर्भिक उपागम (Deconextualised Approach) है, जहाँ बच्चे का विकास एक जैव वैज्ञानिक प्रक्रिया माना जाता है जो सभी बच्चों के लिए लगभग समान होता है, इसमें उनके जाती, वर्ग, वंश या सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं होती तथा बच्चा सामाजिक संसार में ज्ञान का निर्माण व्यक्तिगत रूप से करता है।

बच्चा अपने ज्ञान, विचार तथा अवधारणाओं के साथ कक्षा में प्रवेश करता है जिसमें वह शिक्षक की सहायता से आवश्यक बदलाव लाता है, जिससे नए ज्ञान का निर्माण होता है। शिक्षक उपयुक्त कार्यों तथा प्रश्नों द्वारा इस बदलाव को सुगम बनता है। पियाजे का विचार था कि अधिगम एक निर्माणवादी प्रक्रिया है जिसमें बच्चा अपनी ज्ञान तथा समझ का निर्माण करता है। बच्चा संज्ञानात्मक विकास के प्रत्येक स्तर पर अधिगम की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाता है। ज्ञान वास्तविकता की प्रति नहीं है। किसी वस्तु को जानना महज उसे देखना नहीं वरन उस पर कार्य करना है, उसका रूपांतरण करना है तथा इस रूपांतरण की प्रक्रिया को समझना है जिससे यह जाना जा सके वस्तु का निर्माण किस प्रकार किया जाता है।


अधिगम के दौरान बच्चा अपने पूर्व निर्मित ज्ञान, विचार तथा अवधारणाओं में आत्मसात्करण (Assimilation ) तथा समाविष्टिकरण (Accommodation) की प्रक्रिया द्वारा आवश्यक बदलाव लाता है।

आत्मसात्करण में नवीन अनुभवों को पूर्ववर्ती विद्यमान बौद्धिक संरचनाओं में यथावत व्यवस्थित किया जाता है जबकि समाविष्टिकरण से नवीन अनुभवों की दृष्टि से पूर्ववर्ती बौद्धिक संरचनाओं में सुधार, विस्तार या परिवर्तन किया जाता है। अधिगम के लिए ऐसे युक्तियों का सहारा • लिया जाता जिससे नए ज्ञान को पूर्ववर्ती ज्ञान से जोड़ा जा सके। इस प्रक्रिया में शिक्षक सहायक तथा मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। वे बच्चे की सोच को अधिक जटिल अवबोधन की ओर अग्रसर करते हैं। शिक्षक बच्चे के वर्तमान विचारों एवं अवधारणाओं को सुनते हैं तथा उसमें आवश्यक परिवर्तन लाने के लिए चुनौतीपूर्ण कार्यों तथा विमर्शों को उपयोग में लाते हैं। वे बाल-केन्द्रित, स्वाभाविक क्रिया आधारित तथा स्वतः अनुभव के आधार पर ज्ञान निर्माण के अवसर उपलब्ध करवाने वाली विधियाँ अपनाते हैं। अधिगम की प्रक्रिया में सहपाठियों की सहभागिता आवश्यक नहीं है, किन्तु सहपाठी प्रश्न पूछकर बच्चे की सोच को प्रोत्साहित कर सकते हैं। बच्चे के मष्तिष्क में सक्रिय रूप से ज्ञान का निर्माण होता है। बच्चा सक्रिय चिन्तक, व्याख्याता, इंटरप्रेटर एवं प्रश्नकर्ता के रूप में कार्य करता है।