व्यक्तिगत निर्देशन - personal guidance

व्यक्तिगत निर्देशन - personal guidance


प्रत्येक व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से निर्देशन की आवश्यकता होती है। इसके माध्यम से वह अपने विचारों, अपेक्षाओं और समस्याओं से निपटने में समर्थ होता है व्यक्तिगत निर्देशन व्यक्ति को अपने परिस्थितियों का यथार्थपरक मूल्यांकन करते हुए अपनी सकारात्मक भूमिका सुनिश्चित करने में सहयोग करता है सी.एच मिलर के अनुसार "व्यक्तिगत निर्देशन को व्यक्ति को परिस्थिति में भली प्रकार बैठने के लिए सहयोग के रूप में देखा जा सकता है।" बर्की एवं मुखोपाध्याय के अनुसार "व्यक्तिगत निर्देशन व्यक्ति को अपनी सांवेगिक समस्याओं के समाधान तथा संवेगों को नियन्त्रित करने के लिए दिया गया सहयोग है।"


शिक्षा के क्षेत्र में यह बात स्वीकार की जा रही है कि शिक्षक शिक्षण कार्य के साथ ही विद्यार्थियों के वैयक्तिक परामर्श और निर्देशन का एक मुख्य अभिकर्ता है। शिक्षक को अनेक प्रकार की व्यक्तिगत समस्याओं के साथ उचित निपटारे (व्यवहार) के लिए पेशेवर ज्ञान और सामर्थ्य की आवश्यकता होती है।


व्यक्तिगत निर्देशन के माध्यम से व्यक्ति को समायोजनात्मक प्रक्रिया के घटकों को प्रभावित करने की दिशा में सहयोग प्रदान किया जाता है। यह कार्य विभिन्न रूपों में किया जा सकता है:-


• व्यक्तिगत निर्देशन में व्यक्ति को आवश्यकताओं के उपयुक्त रूप के निर्धारण की दिशा में सहयोग प्रदान किया जाता है। यदि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के स्तर को अपनी परिस्थितियों तथा अपनी सामर्थ्य एवं विशेषताओं के अनुरूप निर्धारित कर पाता है तो समायोजन की स्थापना हो पाती है।


• व्यक्तिगत निर्देशन व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को समझने,

अपनी कमियों को स्वीकार करने, तथा अपनी क्षमताओं और विशेषताओं को पहचानने के लिए सहायता देता है। यदि व्यक्ति आवश्यक नई अनुक्रिया प्रणालियों का अधिगम कर पाता है नयी अभिवृत्तियों को अपना सकता है, हीनता की अनुभूति से मुक्ति प्राप्त कर सकता है आत्म विश्वास अर्जित कर सकता है तो अनेक समायोजनात्मक बाधाएं दूर हो सकती हैं। व्यक्तिगत निर्देशन इस दिशा में व्यापक रूप से प्रयत्न कर सकता है।


• नैतिक मार्गदर्शन के अभाव, उपयुक्त जीवनदर्शन की अनुपस्थिति और नैतिकता संबंधी द्वन्द्वों के कारण अनेक व्यवहारगत समस्याएं मुख्यतः असमंजस और अनिश्चितता, उत्पन्न होती है।

अतः उपयुक्त नैतिक संदर्भों के विकास और नैतिक द्वन्द्व के समाधान की दिशा में सहयोग प्रदान करना चाहिए।


• यौनिकता संबंधी आवश्यकताएं प्राथमिक आवश्यकताएं होती हैं। अनेक नैतिक प्रश्न यौनिक जीवन से जुड़े हैं, यौनिक जीवन समस्याओं का भण्डार प्रस्तुत करता है। बच्चों की अनेक उत्सुकताएं होती है जिनका समाधान किया जाना चाहिए। अतः यौनिक व्यवहार के क्षेत्र में निर्देशन के द्वारा स्वास्थ्य और समायोजन स्थापित करने के लिए सहायता देना चाहिए।


• परिवार में अनेक प्रकार की जिम्मेदारियों के निर्वाह योग्य बनने के लिए विभिन्न प्रकार की अच्छी व्यवहार प्रणालियों का अधिगम आवश्यक होता है इसे शिक्षा और विकासात्मक निर्देशन कार्यक्रम के माध्यम से विकसित किया जाता है । किन्तु जब उसमें अभाव रह जाता है तब व्यक्तिगत निर्देशन हस्तक्षेप करता है और पारिवारिक समायोजन की वृद्धि में सहयोग देना है


• व्यक्ति के जीवन में कुण्ठा-सहनशीलता महत्वपूर्ण होती है। कुण्ठा-सहनशीलता के अभाव में शीघ्र तनाव की उत्पत्ति हो जाती है अतः ऐसी श्रेणी के व्यक्तियों को कुण्ठा-सहनशीलता बढ़ाने हेतु निर्देशनात्मक सहयोग प्रदान करना


• विद्यार्थियों की असफलता और असमायोजन में एकाग्रता की कमी, उपयुक्त अध्ययन आदतों का अभाव, मद्यपान और औषधि व्यसन, आक्रामकता, आत्मविश्वास की कमी, हीनता की अनुभूति, आत्म-ग्लानि, दोषपूर्ण आत्म-प्रत्यक्षण, उचित दृष्टिकोण के अभाव को महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। अतः ऐसे कारकों के प्रभाव के नियंत्रण और निरोध तथा यथासंभव शीघ्र समाधान हेतु व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता होती है।