वैयक्तिक कारण - personal reason
वैयक्तिक कारण - personal reason
इस प्रकार के कारणों में हम निम्न का उल्लेख कर सकते हैं:-
वंशानुगत कारण
बालक के कुसमायोजन से ग्रस्त होने के पीछे कुछ ऐसे कारण भी हो सकते हैं जिनके लिए वंशानुक्रम संबंधी कारक उत्तरदायी हों। वह वंशानुक्रम की विरासत के रूप में ऐसे दोषपूर्ण एवं विकारग्रस्त मानसिक तंत्र, शारीरिक ढांचे, शारीरिक संरचना संबंधी दोष अक्षमताओं, कुरूपता तथा अपंगता को लेकर पैदा हो सकता है जो आगे चलकर उसमें विभिन्न प्रकार की हीनता, निष्क्रियता नैराश्य भावनाओं को जन्म देकर उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में विविध प्रकार की बाधाओं को खड़ी करती रहें।
शारीरिक कारण
कुसमायोजन के बहुत से मामलों के पीछे शारीरिक कारण पाये जाते हैं। शारीरिक दुर्बलता, शारीरिक के अपंगता या अक्षमता, शारीरिक अस्वस्थता, असाध्य बीमारियों से ग्रस्त और परेशानी व्यक्ति कुसमायोजन का शिकार हो सकता है। कारण स्पष्ट है कि व्यक्ति को शारीरिक दृष्टि से चैन नहीं मिलता तो ऐसी परेशानी और विषम परिस्थितियों उसे अपने आप से तथा अपने वातावरण से ठीक तरह समायोजित होने में एक बड़ी बाधा बन जाती है। उसमें हीनता और निराशा के भाव घर करने लगते हैं फिर उसके पैर धीरे-धीरे कुसमायोजन की ओर पड़ने लगते हैं।
व्यक्ति की अपनी प्रकृति और स्वभाव से संबंधित कारण
कुछ व्यक्तियों की अपनी प्रकृति और स्वभाव ही ऐसा होता है
कि जिसकी वजह से वे अपने आप से तथा अपने वातावरण के साथ पटरी बिठाने में प्रायः असफल ही रहते हैं। इस प्रकार के कुछ कारण निम्न हो सकते हैं:
● जीवन के ऐसे लक्ष्य, उद्देश्य एवं आदर्श जो वास्तविकता से काफी परे हों ।
● सामाजिक परिपक्वता एवं समायोजन का अभाव, संवेगात्मक परिपक्वता का अभाव तथा संवेगों पर उचित नियंत्रण रखने संबंधी अक्षमता।
● आकांक्षा तथा महत्वाकांक्षा का उचित स्तर बनाये रखने संबंधी असफलता।
● विपरीत इच्छाओं का शिकार होना तथा विविध प्रकार के अन्तः द्वन्द्वों से ग्रस्त रहना।
● निराशाजन्य भावों और कुण्ठाओं के शिकार रहना
वातावरणजन्य कारण
बहुत सी कुसमायोजन संबंधी समस्याओं के पीछे प्रायः वातावरण संबंधी कारकों का ही अधिक सक्रिय योगदान पाया जाता है । शायद इसके पीछे यही बात काम करती हुई पाई जाती है कि क्योंकि कुसमायोजन की समस्या मूलरूप से व्यवहारजन्य समस्या है और व्यवहार को बनाने एवं बिगाड़ने में वातावरण की शाक्तियों को ही कुसमायोजन को जन्म देने तथा पल्लवित एवं पोषित करने का एक बड़ा कारण माना जाना चाहिए।
जब से बालक की जीवनलीला अपनी माता के गर्भ में शुरू होती है तब से लेकर मृत्युपर्यन्त वह वातावरण की शक्तियों का ही शिकार रहता है।
ऐसे में अगर उसके हिस्से दोषपूर्ण एवं प्रतिकूल वातावरणजन्य परिस्थितियां जो कुसमायोजन के लिए अधिक उत्तरदायी मानी जा सकती है उदाहारण रूप में निम्न हो सकती है:
● माता-पिता, अभिभावकों, परिजनों, समाज के अन्य सम्मानित सदस्यों तथा से बड़े बालकों का बालक के प्रति अनुचित व्यवहार।
● असंतोषजनक तथा दोषपूर्ण पारिवारिक वातावरण जिसके पीछे माँ बाप के आपसी झगड़े, परिवार के व्यक्तियों का असामाजिक एवं अपराधी चरित्र, मां-बाप के बीच संबंध विच्छेद, सौतेली मां या बाप से मिलने वाला अनुचित व्यवहार आदि विविध कारकों का योगदान हो सकता है।
● पास-पडोस, मोहल्ले, समुदाय तथा समाज में व्याप्त ऐसी परिस्थितियां तथा दोषपूर्ण वातावरण जिनके परिणामस्वरूप बालकों में अनुचित एवं असामाजिक आदतों को पनपने का अवसर मिले या उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में ऐसी बाधाएं खड़ी हो जाएं कि उनके पैर कुसमायोजन की ओर बढ़ने लगे।
● विद्यालय में मिलने वाला दोषपूर्ण वातावरण एवं विषम परिस्थितियां जिनमें अध्यापकों को बालकों के साथ अनुचित व्यवहार, साथी विद्यार्थियों के साथ पटरी न बैठना, दोषपूर्ण पाठ्यक्रम तथा पढ़ने-पढ़ाने की अरूचिपूर्ण रवैया आदि बातें शामिल हो सकती हैं। "
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