सामाजिक विज्ञान के दार्शनिक व सैद्धान्तिक आधार - Philosophical and theoretical foundations of social science

सामाजिक विज्ञान के दार्शनिक व सैद्धान्तिक आधार - Philosophical and theoretical foundations of social science


मानव की प्रकृति एक सामाजिक प्रकृति है। एक महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न है कि मानव होने का क्या अर्थ है? जिसको लेकर दार्शनिक प्राचीन काल से ही समाज की सैद्धान्तिक विशेषताओं के बारे में चिंतन करते रहे हैं। 19वीं शताब्दी में मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान को दर्शन (फिलोसोफी) से अलग किया गया। आनुप्रयोगिक विषयों के उद्भव के साथ ही सामाजिक विज्ञान से सम्बंधित दार्शनिक प्रश्न यहाँ पर उभरते हैं। जिनको सामाजिक विज्ञान के भीतर रहकर ही तलाशा जा सकता है। सामाजिक विज्ञान का दार्शनिक परिप्रेक्ष्य मानव समाज के आनुभाविक अध्ययन के द्वारा दर्शन (फिलोसोफी) के कुछ चिरस्थाई प्रश्नों की जाँच करता है। सामाजिक विज्ञान के दार्शनिक परिप्रेक्ष्य के अन्तर्गत उन चिरस्थाई प्रश्नों को तीन बड़े विषय के भीतर रखा जा रहा है: . मानदंड (Normativity), प्रकृतिवाद (Naturalism). न्यूनीकरण (Reductionism)। मानदंड का प्रश्न सामाजिक वैज्ञानिक खोज में मूल्य से सम्बंधित है।

सामाजिक विज्ञान नजदीकी रूप से सामाजिक नीति से सम्बंधित प्रसंग से जुड़ा है इसलिए सामाजिक विज्ञान एक वस्तुनिष्ठ विषय हो सकता है। सामाजिक विज्ञान मानव समाज के भीतर मानक, नियम और मूल्य की उत्पत्ति और उसके कार्यों को ही सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत करता है। प्रकृतिवाद के प्रश्न को प्रकृति और सामाजिक विज्ञान से सम्बंधित किया जा सकता है। सामाजिक विज्ञान में प्रयोग की जाने वाली विधियाँ प्राकृतिक विज्ञान में प्रयोग की जाने वाली विधियों से भिन्न तो हैं लेकिन वह किसी भी मामले में कमजोर नहीं हैं। न्यूनीकरण का प्रश्न यह पूछता है कि कैसे सामाजिक संरचना से व्यक्ति जुड़ा होता है।


सामाजिक विज्ञान के दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न है कि मानव का ब्रह्माण्ड में स्थान क्या है? मूल्यों का स्रोत क्या है? मानव प्रकृति किस प्रकार गैर मानव प्रकृति से सम्बंधित है? हम क्या जानते हैं? इन दार्शनिक विषयों पर प्रतिक्रिया करना भी सामाजिक विज्ञान के सैद्धान्तिक खोज में योगदान देना है।


 सामाजिक विज्ञान में भी अध्ययन का आधार दार्शनिक है। विज्ञान एवं वैज्ञानिक पद्धति के बढ़ते महत्त्व के बीच उसकी तटस्थता पर प्रश्न खड़ा होता है कि क्या सामाजिक व्यवहार को तटस्थता के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है। सामाजिक विज्ञान में हो रहे वैज्ञानिक पद्धति के उपयोग पर पुनर्विचार करना होगा, क्योंकि मानवीय व्यवहार मानवीय मूल्यों से जुड़ा हुआ है। मानवीय व्यवहार का अध्ययन मूल्यरहित मानकर तटस्थता में नहीं किया जा सकता है। सामाजिक क्रिया, भाषा व मूल्यों के अर्थ को परिभाषित करके ही सामाजिक अध्ययनों का वास्तविक निष्कर्ष पाया जा सकता है।


सामाजिक विज्ञान ने तथ्यों के साथ वस्तुनिष्ठ और व्यवस्थित ढंग से निपटने के अपने खुद के तरीके विकसित कर लिए हैं। ये तरीके प्राकृतिक विज्ञानों में इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों से भिन्न हैं। पर इसका यह मतलब नहीं है, कि प्रासंगिक तथ्यों के प्रेक्षण, व्याख्या और विश्लेषण के बजाय अपनी खुद की व्यावहारिक बुद्धि या खुद की व्यक्तिगत पसन्द को इस्तेमाल करने के मामले में समाजविज्ञानी, प्राकृतिक विज्ञानी की तुलना में किसी भी तरह से ज्यादा स्वतंत्र है, चाहे बात शिक्षण की हो या शोध की।


सामाजिक विज्ञान विद्यालयी विषय के रूप में विकास व प्रवृत्तियां आज सामाजिक विज्ञान विषय देश भर के स्कूलों में किसी न किसी रूप में पढ़ाए जा रहे हैं। पहले आम तौर पर ऐसी स्थिति नहीं थी। आजादी के पहले. समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान और यहाँ तक कि अर्थशास्त्र की शिक्षा भी मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों तक सीमित थी। आजादी के बाद सामाजिक विज्ञान के विषयों की शिक्षा में निरन्तर विस्तार हुआ तथा जल्दी ही इन्हें स्कूलों में पढ़ाए जाने की माँग बढ़ने लगी।


सामाजिक विज्ञान का वर्णन कभी-कभी नीति विज्ञान के रूप में किया जाता है, हालाँकि नीति-निर्धारण में समाजशास्त्र और राजनैतिक विज्ञान जैसे विषयों का योगदान परोक्ष व सीमित ही रहता है। वैसे भी स्कूली विद्यार्थियों को नीति-निर्माता या फिर नीति-निर्माण में परामर्शदाता बनाने का लक्ष्य रखना अपने आप में बहुत ही अव्यावहारिक बात होगी। पर अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज किस तरह काम करते हैं. इसके बारे में सामान्य जानकारी होने से विद्यार्थियों को उनकी आगे की जिन्दगी में यह समझने में मदद मिलेगी कि सार्वजनिक जीवन में नीतियों की क्या भूमिका होती है।

यह उन्हें इस बारे में एक शिक्षित दृष्टिकोण बनाने का आधार प्रदान कर सकता है कि कुछ खास नीतियाँ ही क्यों अपनाई जाती हैं और अन्य क्यों नहीं। साथ ही अपनाई जाने वाली नीतियों में से कुछ ही क्यों सफल होती हैं और बाकी क्यों नहीं।


सामाजिक विज्ञान का ज्यादा महत्वपूर्ण योगदान नीति-निर्धारण के लिए प्रशिक्षित करने में नहीं है बल्कि शिक्षित व समझदार नागरिक तैयार करने में है। लोकतंत्र के अच्छे संचालन के लिए शिक्षित नागरिक वर्ग का होना अपरिहार्य है। कोई व्यक्ति अच्छे नागरिक होने के गुण अनायास हवा में से नहीं पकड़ता. उन्हें हासिल करने और बढ़ावा देने के लिए एक खास प्रकार की शिक्षा की जरूरत होती है। एक अच्छा नागरिक होने के लिए सिर्फ भौतिक व जैविक क्रियाकलापों का जानकार होना ही काफी नहीं होता, अच्छे नागरिक को उस सामाजिक संसार के बारे में भी समझ होना जरूरी है जिसका वह हिस्सा है।


स्कूल में सामाजिक विज्ञान के अन्तर्गत जो विषय होते हैं वे अतीत से हमारा सम्बन्ध जोड़ते हैं, ताकि हम यह समझें और उसकी कद्र करें कि हम जहाँ अभी हैं वहाँ तक कैसे आए हैं। ये विषय, हम पर शासन करने वाली संस्थाओं के अध्ययन के माध्यम से हमें वर्तमान से भी जोड़ते हैं, तथा हम जिस वृहद् पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं उसकी समझ हमारे भीतर विकसित करके अतीत और वर्तमान को परिचित सन्दर्भों में हमारे सामने लाते हैं। सामाजिक विज्ञान एक बेहतर दुनिया बनाने का सपना देखने में हमारी मदद करता है। मानवीय विकास से जुड़े हुए व्यावहारिक प्रश्न जैसे कि नगरों को कैसे बेहतर बनाएं? लोगों के जीवनस्तर में सुधार कैसे किया जाए? अपराध दर को कैसे कम किया जाए? भेदभाव को कैसे दूर किया जाए? बेहतर शासन किस तरह प्रदान किया जा सकता है? उत्पादकता और कैसे सुधर सकती है? आदि इन्हीं सब बातों से सामाजिक विज्ञान बनता है।


सामाजिक विज्ञान दुनिया भर के स्कूलों में किसी न किसी रूप में पढ़ाया जाता है। कभी इसे पर्यावरण अध्ययन कहा जाता है, जैसा कि भारत के मौजूदा प्राथमिक स्कूलों में, कभी-कभी यह इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र के रूप में माध्यमिक स्कूल तक और फिर इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्रके रूप में हाईस्कूल में पढ़ाया जाता है। आजकल कई देशों में यह नागरिक शिक्षा या फिर सामाजिक और राजनैतिक जीवन नाम से जाना जाता है, जैसा कि भारत में भी है। कुछ देशों में, और कुछ परिस्थितियों में सामाजिक अध्ययन नाम का विषय भी पढ़ाया जाता रहा है और कुछ वैचारिक दृष्टियाँ ऐसी हैं जो इतिहास व भूगोल को सामाजिक विज्ञानों से अलग रखते हुए उन्हें पृथक विषय मानती हैं. जबकि अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र को वे सामाजिक विज्ञानों का हिस्सा मानती हैं।