प्रदूषण - pollution
प्रदूषण - pollution
मानव के अनियंत्रित क्रिया कलापों के कारण आज पर्यावरण को खतरा उत्पन्न हो गया है। मनुष्य द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का असीमित प्रयोग किया जा रहा है जिससे पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। जैव मण्डल अनेक जैविक व अजैविक घटकों की परस्पर क्रियाओं का प्रतिफल है। समस्ता जुड़े होते हैं। इस प्रकार एक संतुलित स्थिति में सभी जीव अपना जीवन चक्र चलाते हैं । पर्यावरण मं प्रत्येक घटक की एक संतुलित स्थिति होती है। कभी-कभी घटकों की कुछ मात्रा आवश्यकता से अधिक बढ़ या घट जाती है अथवा किसी हानिकारक घटकों का वातावरण में प्रवेश हो जाता है। फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है जो जीवों के लिए किसी न किसी रूप में हानिकारक होता है। "प्रदूषण वायु, जल एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का वह अवांछनीय परिवर्तन है जो मनुष्य एवं अन्य जन्तुओं, पौधों, आदि को किसी भी रूप में हानि पहुँचाता है।"
ओडम के अनुसार- प्रदूषण हवा जल एवं मिट्टी के भौतिक, रासानिक एवं जैविकीय गुणों में एक ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है, जिससे कि मानव जीवन, औद्योगिक प्रक्रियाएँ, जीवन दशाएँ तथा सांस्कृतिक तत्वों की हानि होती है अथवा हमारे कच्चे माल की गुणवत्ता घटती है।
दासमान के अनुसार उस दशा या स्थिति को प्रदूषण कहते हैं, जब मानव द्वारा पर्यावरण में विभिन्न तत्वों एवं ऊर्जा का इतनी अधिक मात्रा में संचय हो जाता है कि वह परितन्त्र द्वारा आत्मसात करने की क्षमता से अधिक हो जाते हैं।
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