संस्कृति की सत्ता और स्त्री मुक्ति - The power of culture and women's emancipation

संस्कृति की सत्ता और स्त्री मुक्ति - The power of culture and women's emancipation


किसी भी समाज की संस्कृति में उस समाज के वर्चस्वशाली समुदाय की सत्ता की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि ताकतवर की संस्कृति ही पूरे समाज की संस्कृति का रूप ले लेती है। उस समूह की भाषा, रीति-रिवाज, त्यौहार आदि का दूसरे समूह के लोग अनुकरण करते हैं। सदियाँ बीत जाने के बावजूद स्त्री की स्थिति में अल्प बदलाव आने के पीछे इस सांस्कृतिक सत्ता की बड़ी भूमिका रही है। इस संस्कृति का पोषण घर-परिवार से लेकर विद्यालयों तक में किया जाता है और इसे ही शिक्षित एवं सुसंस्कृत होने का पर्याय माना जाता है। भारतेंदु काल की पत्रिका बालाबोधनी' में स्त्रियों को अच्छी गृहिणी बनने की और पितृसत्ता को मज़बूत करने की शिक्षा दी जाती थी। किसी जाति या जेंडर के निर्धारण में यह सांस्कृतिक सत्ता बहुत महीन ढंग से लगातार काम कर रही होती है। एक युवा किसी पार्क की बेंच पर लेटकर रात गुजार सकता है, परंतु एक लड़की ऐसा नहीं कर सकती और अगर ऐसा हुआ तो उसकी सभ्यता और संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी।

संस्कृति की यह सत्ता पहनावा, खान-पान, बोलने हंसने की आवाज से लेकर शैक्षिक विषय के चयन (जैसे-लड़कियों को होम साइंस आदि पढ़ना चाहिए और उन्हें सेना, इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई से दूर रहना चाहिए) तक को प्रभावित करती है। इसी संस्कृति के कारण जहां पुरुष यौनिकता पर कोई बंधन नहीं होता वहीं, स्त्री यौनिकता को तमाम संस्कारों, प्रतीकों और चिह्नों के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है। इसके लिए भिन्न अवस्थाओं में भिन्न वस्त्र, शरीर के गहने एवं सिंदूर आदि का प्रयोग किया जाता है। रजस्वला होने पर कई समाजों में पारिवारिक कार्यक्रम होते हैं और उच्च जातियों में रजस्वला होने से पहले विवाह की बात की जाती है। मासिक धर्म के समय भिन्न प्रकार के बंधन में बांधना, उसे शर्म और गंदगी से जोड़ना, प्राकृतिक क्रिया को एक सांस्कृतिक और सामाजिक क्रिया के रूप में स्थापित करना है। इसी प्रकार मुस्लिम परिवारों में वलीमा की संकल्पना है जो एक तरह से स्त्री की यौन पवित्रता को ही बनाए रखने की कवायद है। इस प्रकार एक स्त्री का दैनिक व्यवहार एवं उसका पूरा व्यक्तित्व इस सत्ता से नियंत्रित होता है।