बजटन के सिद्धान्त - principles of budgeting

बजटन के सिद्धान्त - principles of budgeting


राबर्ट एन्थोनी के अनुसार बजटन के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित है


(1) प्रबन्ध द्वारा प्रवर्तित होना बजट एक प्रबन्ध-यंत्र है। अतः यह प्रबंध द्वारा प्रवर्तित होना चाहिये। संस्था के सभी कर्मचारियों को यह आभास रहे कि सर्वोच्च प्रबन्ध बजटन को महत्वपूर्ण समझता है तथा बजट की तैयारी में रुचि लेता है।


(2) उत्तरदायित्व केन्द्रों तथा नियन्त्रणीय लागतों का निष्चयन : बजट का प्रत्येक भाग किसी न किसी उत्तरदायित्व केन्द्र से सम्बन्धित होना चाहिये। विभिन्न उत्तरदायित्व केन्द्रों पर दायित्वों का निष्चयन स्पष्ट होना चाहिये तथा प्रत्येक उत्तरदायित्व केन्द्र पर नियन्त्रणीय लागतों को स्पष्ट कर देना चाहिए। बजटन की दृष्टि से अधिकार एवं उत्तरदायित्व के क्षेत्रों का निष्चित होना बहुत आवश्यक है। प्रत्येक अधिकारी को यह पता होना चाहिये कि उसके क्या अधिकार है तथा वह किन कार्यों के लिए उत्तरदायी ठहराया जायेगा।

अधिकार क्षेत्रों को स्पष्ट कर देने से एक अधिकारी द्वारा दूसरे अधिकारी के कार्यों में दखल देने की सम्भावनायें कम हो जाती है। इसी तरह उत्तरदायित्वों के निष्चित कर देने से प्रबन्ध का व्यावसायिक क्रियाओं पर नियन्त्रण प्रभावपूर्ण हो जाता है तथा प्रत्येक कार्य के लिए किसी न किसी व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।


(3) उत्तरदायी पर्यवेक्षकों द्वारा सहभागिता : बजट के तैयार करने, उत्तरदायित्व के निश्चयन तथा वास्तविक परिणामों पर विचार-विमर्श करते समय उत्तरदायी पर्यवेक्षकों को भी आमन्त्रित किया जाये तथा उन्हें बजट प्रक्रिया से भली-भांति अवगत कराया जाये।

ऐसा न करने पर वे बजट - आंकड़ों का विरोध करने लगते हैं तथा उन्हें पूरा करने में रुचि नहीं लेते।


(4) बजट प्रणाली की शिक्षा : उत्तरदायी पर्यवेक्षकों को बजट प्रणाली का यथेष्ट ज्ञान होना आवश्यक है। बजट शिक्षा में अधिकारियों को बजट प्रणाली के उपयोग व इसकी सीमाओं से अवगत करा देना चाहिए। इसके लिए बजट पुस्तिकाओं और अन्य लिखित सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिये सभाओं या गोष्ठियों का आयोजन भी पर्याप्त प्रभावशाली होता है। इन सभाओं में कर्मचारियों को बजट प्रक्रिया के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी दी जा सकती है। उत्तरदायी पर्यवेक्षकों द्वारा सहभागिता बजट प्रणाली की शिक्षा प्रदान करने का सर्वाधिक प्रभावशाली तरीका है।


(5) बजट अवधि : बजट अवधि व्यवसाय की प्रकृति के अनुसार होनी चाहिये। सामान्यतः बजट एक वर्ष के लिए तैयार किये जाते हैं परन्तु कुछ व्यवसायों में छमाही तथा तिमाही बजट तैयार करना आवश्यक हो सकता है। इसी तरह कुछ व्यवसायों के परिणाम दीर्घकाल में स्पष्ट होते हैं।

अतः इनके लिए दीर्घकालीन बजट (1 वर्ष से अधिक अवधि के बजट) बनाये जाते हैं। नियन्त्रण के उद्देश्य से बजट अविध को लघु अवधियों में विभाजित कर दिया जाता है। इन अवधियों को नियन्त्रण-अवधि कहते हैं। व्यवसाय की प्रकृति तथा प्रत्येक उत्तरदायित्व केन्द्र की विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए नियन्त्रण- अवधि कलेण्डर माह या 4 सप्ताहों का माह या अन्य कोई और हो सकती हैं।


(6) बजट व लेखांकन शब्दावली में एकरूपता: बजट तथा वित्तीय लेखा विधि (जिससे वास्तविक निष्पादन के अंक मालूम किये जाते हैं) में प्रयोग किये जाने वाले शब्द समानार्थक होने चाहियें। उदाहरण के लिए बजट में प्रयुक्त प्रत्यक्ष श्रम व्ययों में यदि छुट्टियों का वेतन, सामाजिक सुरक्षा पर व्यय, सेवा-निवृत्ति भत्ता तथा अन्य सहलाभ सम्मिलित किये गये हों तो वित्तीय लेखांकन के अन्तर्गत अभिलिखित प्रत्येक्ष श्रम-व्ययों में इन्हीं तत्वों का समावेश किया जाये।

इससे वास्तविक निष्पादन की बजट के अकों से सही तुलना सम्भव होती है। इसके लिए लेखों का विधिवत् वर्गीकरण आवश्यक है। इसके साथ-साथ वास्तविक निष्पादन और बजट के अंकों के लिए समान मापदण्ड ही अपनाया जाये।


(7) समुचित प्राप्य लक्ष्य बजट के लक्ष्य ऐसे होने चाहियें जिन्हें उचित प्रयासों से प्राप्त किया जा सके। यदि लक्ष्य अधिक ऊंचे या अप्राप्य है तो इससे कर्मचारी हतोत्साहित होते हैं। इसी तरह यदि अधिक नीचे या सरलता से प्राप्य लक्ष्य रखे जाते हैं तो कर्मचारियों के प्रयासों में शिथिलता आ सकती है। उनकी उत्पादन क्षमता घट जाती है।


(8) महत्वपूर्ण अपवाद: बजटरी नियन्त्रण में 'अपवाद के सिद्धान्त' का पालन किया जाता है।

वास्तविक तथा बजटीय निष्पादनों की तुलना करने पर प्राप्त विचलनों में से केवल महत्वपूर्ण विचलनों पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाता है।


(9) बजट लागत बजट प्रणाली पर किया गया व्यय इससे प्राप्त उपयोगिता से अधिक नहीं होना चाहिये। अतः बजट प्रणाली में व्यवसाय के आकार के अनुसार ही विस्तार करना चाहिये ।


(10) सहायक और मूल कार्यों में स्पष्ट भेद: बजट तैयार करने में सहायक और मूल अधिकारियों के कार्यों में स्पष्ट भेद किया जाना चाहिये ।


( 11 ) बजट अनुमानों पर पुनर्विचार : बजट के अनुमानों पर क्रमागत उच्चतर प्रबन्ध द्वारा पर्याप्त पुनर्विचार किया जाना चाहिये । पुनर्विचार में लापरवाही करने से कर्मचारियों में बजटन का प्रभाव घट जाता है।


(12) अनुमोदन : बजटन पर अन्तिम अनुमोदन विशिष्ट रूप से होना चाहिये तथा अनुमोदित बजट की सूचना यथाशीघ्र सभी अधिकारियों को दे देनी चाहिये। मौन के आधार पर अनुमोदन प्राप्त करने से भविष्य में गलत फहमी होने का भय रहता है।


उपर्युक्त के अतिरिक्त बजटन में लोच रहनी चाहिए जिससे कि भविष्य की बदलती हुई परिस्थितियों में बजट के कार्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन किये जा सकें।