व्यावसायिक समायोजन के सिद्धांत - principles of business adjustment

व्यावसायिक समायोजन के सिद्धांत - principles of business adjustment


कार्य संतोष, कार्य असंतोष, कार्य अभिप्रेरणा, की व्याख्या करने के लिए अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं व्यावसायिक समायोजन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कारकों की व्याख्या मे हर्जबर्ग, मैस्लो, एल्डरफर, मैक्लीलैंड, स्टेसी ऐडम, और ब्रूम के सिद्धांत प्रमुख है।


(1) हर्जबर्ग का द्वि-कारक सिद्धांत - फ्रेडरिक हर्जबर्ग द्वारा प्रस्तावित सिद्धांत जिसे अभिप्रेरणा आरोग्य सिद्धांत भी कहते हैं उन तत्वों की व्याख्या करता है जिसकी अपेक्षा व्यक्ति अपने व्यवसाय से करता है। हर्जबर्ग कार्य संतुष्टि को प्रभावित करने वाले कारकों को दो श्रेणियों में विभाजित करते हैं, 1. स्वास्थ्य कारक एवं 2. अभिप्रेरक कारक


हर्जबर्ग ने स्वास्थ्य संबंधी कारकों की श्रेणी में व्यावसायिक संगठन कंपनी की नीति और प्रशासन, पर्यवेक्षण, पर्यवेक्षण के साथ संबंध सहकर्मियों के साथ संबंध सामाजिक संस्थिति,

सुरक्षा ता व्यक्तिगत जीवन को रखा । हर्जबर्ग के अनुसार ऐसे कारक जिनके अभाव में कार्य असंतोष विकसित होता है तथा जिनसे कार्य संतोष विकसित होता है तथा एक दूसरे से पृथक होता है। इस प्रकार यदि कार्य स्थल पर स्वास्थ्य जनक कार्य दशाओं का अभाव हो या कर्मचारी को स्टेटस, सुरक्षा आदि की प्राप्ति नहीं हो रही है तो असंतोष विकसित होगा तथा समायोजन में कमी आएगी ऐसी दशा में व्यावसायिक निर्देशन की कार्य स्थल के परिवेश की रचना के लिए जिम्मेदार लोगों को इस प्रकार के कारकों की पहचान करके उन्हें परिवेश से निष्कासित करने में सहयोग देने की होती है। हर्जबर्ग यह भी स्पष्ट करते हैं कि कार्य असंतोष और कार्य संतोष एक दूसरे के ऐसे विलोम नही हैं। कि कार्य असंतोष की दशाओं और कारको को कार्य स्थल के परिवेश में से निष्कासित कर देने मात्र से कार्य संतोष की दशा की स्थापना हो जाएगी। चूंकि दोनो प्रकार के कारक एक दूसरे से भिन्न और पृथक होते हैं इसलिए एक श्रेणी के कारकों के माध्यम से कार्य असंतोष और फलतः व्यावसायिक असमायोजन के संकट को निरस्त तो किया जा सकता है लेकिन यदि हम यह चाहते हैं कि सकारात्मक अर्थों में व्यावसायिक समायोजन की स्थापना हो तो दूसरी श्रेणी के कारकों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।


हर्जबर्ग द्वारा अपने अध्ययन में कर्मचारियों से पूछे गए प्रश्नों के आधार पर कार्य संतुष्टि प्राप्त होने में सहायक जिन कारकों की जानकारी प्राप्त हुई, उन्हे आंतरिक या निजी अभिप्रेरणा के रूप में देखा जाता है इसके अंतर्गत उपलब्धि, पहचान / प्रत्याभिज्ञा, कार्य विशेष, जिम्मेदारी, प्रगति, विवृद्धि को महत्वपूर्ण पाया गया है।


स्पष्ट है कि कार्य संतुष्टि और व्यावसायिक समायोजन की दृष्टि से बहिस्थ आवश्यकताएं दोनो ही महत्वपूर्ण है। बहिर्थ आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में असंतुष्टि और व्यावसायिक कुसमायोजन की उत्पत्ति होती है। अतः असंतोष घटाने के लिए व्यावसायिक निर्देशन कार्यक्रम द्वारा इन कारकों के कुप्रभावों के निष्कासन में सहयोग दिया जाना चाहिए लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात उन कारकों पर ध्यान देना है जिनके माध्यम से कार्य संतुष्टि विकसित करने में सहायता मिलती है।


(2) मैस्लो का आवश्यकता अनुक्रम सिद्धांत - मैस्लो द्वारा प्रतिपादित आवश्यकताओं के अनुक्रमिक विकास सिद्धांत में आवश्यकताओं की पांच श्रेणियां - दैहिक आवश्यकताएं, सुरक्षा आवश्यकताएं, प्रेम एवं स्नेह, आत्म सम्मान आवश्यकता तथा स्व आत्मीकरण वर्णित है। अभिग्रह यह कि पांच आवश्यकताएं क्रमशः उच्चता स्तर की ओर अग्रसर हैं। जब निम्न स्तर की आवश्यकता पूरी होती है तब व्यक्ति उच्च स्तर की दिशा में अग्रसर होता है। व्यावसायिक समायोजन की दृष्टि से इस सिद्धांत का निहितार्थ यह है कि व्यवसाय की दशाओं और व्यवस्थाओं द्वारा कर्मचारी की उच्च स्तरीय आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था भी होनी चाहिए। यदि एक कर्मचारी की उच्च आवश्यकताओं ( विशेषकर उच्च स्तर पर कार्यरत वे कर्मचारी जिनकी आवश्यकताओं का स्तर स्व आत्मीकरण की अवस्था तक पहुंच गया है) की पूर्ति की दिशा में सहयोग नहीं दिया जाएगा तो कार्य संतुष्टि की प्राप्ति नहीं हो पाएगी।


(3) एल्डफर का ई. आर. जी. सिद्धांत - क्लेटन एल्डरफॅर ने वैज्ञानिक शोध के आधार पर मैस्लों के सिद्धांत को परिमार्जित करते हुए महत्वपूर्ण आवश्यकताओं के तीन समूह बनाए। 

(1) आवश्यकताओं का अस्तित्व संबंधी समूह जिसमेंदैहिक तथा सुरक्षा की आवश्यकताओं को सम्मिलित किया गया है। (2) सम्बन्धन संबंधी आवश्यकताएं तथा (3) वैकासिक आवश्यकताएं। इस सिद्धांत का नामकरण का तात्पर्य इन्हीं तीन आवश्यकता समूहों से है। मैस्लों के सिद्धांत में अगले अनुक्रम की आवश्यकताओं में अधिक तीव्रता बतायी गई है लेकिन ईआरजी सिद्धांत का मानना है कि 1, यदि अगले अनुक्रम की आवश्यकता पूरी नहीं होती है तो कर्मचारी में निचले अनुक्रम की आवश्यकता तीव्र हो जाएगी। 2, निम्न अनुक्रम की आवश्यकता संतुष्ट होने पर व्यक्ति उच्च स्तरीय आवश्यकताओं की पूर्ति चाहेगा। 3, एक ही समय अनेक आवश्यकताएं कर्मचारी को अभिप्रेरित कर रही हो सकती है। तथा 4, जब उच्च स्तर की आवश्यकता के बिन्दु पर पहुंचकर व्यक्ति विफल हो जाता है तब उसका प्रतिगमन निम्न स्तर की आवश्यकता की ओर हो जाता है अर्थात आवश्यकताओं की श्रृंखला में कुण्ठा- प्रतिगमन प्रणाली कार्य करती है।


(4) मैक्लीलैंड का आवश्यकता सिद्धांत - यह सिद्धांत मैक्लीलैंड और उनके सहयोगी द्वारा विकसित किया गया है । कार्य निष्पादन, कार्य अभिप्रेरणा, और कार्य संतुष्टि के संदर्भ में यह सिद्धांत तीन आवश्यकताओं उपलब्धि आवश्यकता, शक्ति आवश्यकता, तथा संबंधन आवश्यकता पर केंद्रित करता है । इन आवश्यकताओं की दृष्टि से कर्मचारियों में वैयक्तिक भिन्नताएं पायी जाती है । अतः किसी कर्मचारी की व्यावसायिक संतुष्टि या समायोजन की मात्रा इस बात से प्रभावित होती है कि निर्धारित कार्य को संपन्न करते समय उसकी अभिप्रेरणाएं किस सीमा तक संतुष्ट हो रही है।


उपलब्धि आवश्यकता की प्रबलता जिन व्यक्तियों में पायी जाती है वे उत्तरोत्तर और अच्छा कार्य करना चाहते हैं तथा अन्य व्यक्तियों की तुलना में बेहतर निष्पादन देना चाहते हैं इसलिए ऐसे लोग उन व्यावसायिक परिस्थितियों में अधिक सफल और संतुष्ट होते है जहां व्यक्तिगत जिम्मेदारी हो, मध्यम मात्रा मे जोखिम हो तथा उनके कार्य निष्पादन के बारे में त्वरित गति से मूल्यांन सूचना की प्राप्ति हो।

प्रबंधन कार्य करने वाले कर्मचारियों के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि सबसे अच्छे प्रबंधक वे लोग होते हैं जिनमें शक्ति अभिप्रेरणा तीव्र तथा संबंधन अभिप्रेरणा मंद होती है ( मैक्लीलैंड 1976) इसका निहितार्थ यह है कि व्यावसायिक समायोजन स्थापित होने में इस बात का महत्व है कि कार्य करने की परिस्थितियां कर्मचारियों की उपलब्धि, संबंधन और शक्ति की अभिप्रेरणा की किस रूप में पूर्ति करती है।


(5) जे. स्टेसी एडम्स का समानता सिद्धांत - इस सिद्धांत के अनुसार अपने कार्य निवेशों जैसे प्रयास, अनुभव, शिक्षा, निपुणता की मात्रा और कार्य निर्गतों जैसे वेतनमान, वेतनवृद्धि, मान्यता, सम्मान आदि की तुलना अन्य व्यक्तियों के कार्य निवेशों और उनको प्राप्त हो रहे कार्य निर्गतों के साथ करता है।

जब वह यह देखता है समान कार्य निवेश वाले अन्य लोगों का प्राप्त होने वाले लाभों (कार्य निर्गतों) की भांति ही उसे भी लाभ की प्राप्ति हो रही है। तब कर्मचारी को न्याय की व्यवस्था की अनुभूति होती है। जब कर्मचारी यह अनुभव करता है कि असमानता की नीति अपनायी जा रही है तब अन्याय और समानता विषयक तनाव की उत्पत्ति होती है।

अपनी तुलना के लिए कर्मचारीगण मित्रों, पड़ोसियों, सहकर्मियों, अन्य संगठन में कार्यरत व्यक्तियों या अपने पुराने कार्यस्थल को संदर्भ में ले सकता है। तुलना के लिए संदर्भ का चयन कई कारकों पर निर्भर होता है।


कार्य संतुष्टि में न्याय की अभिभूति के महत्व कोदेखते हुए आधुनिक शोधकार्यों ग्रेओन बर्ग 1996, ने न्याय और समानता के अर्थ को व्यापक बनाने की कोशिश की है

जहां पहले वितरणात्मक न्याय पर ही बल दिया जाता था वही अब प्रक्रियात्मक न्याय अर्थात वितरणात्मक न्याय स्थापित करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया के बारे में प्रत्यक्षण को भी महत्व दिया जा रहा है।


इस प्रकार समानता और न्याय का सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि कर्मचारियों की कार्य अभिप्रेरणा, संतुष्टि और समायोजन की मात्रा तुलनात्मक पुरस्कार और निरपेक्ष पुरस्कार दोनोंसे प्रभावित होती है। (पी.एस गुडमैन, 1977, जे. ग्रीनबर्ग 1987 )


(6) ब्रूम का प्रत्याशा सिद्धांत - विक्टर ब्रूम ने 1964 द्वारा विकसित प्रत्याशा सिद्धांत का मूल अभिग्रह यह है

कि कार्य करने की प्रवृत्ति का बल उस प्रत्याशा की प्रबलता, जिसकी पूर्ति व्यक्ति द्वारा किए जा रहे कार्यों द्वारा होनी है तथा इस प्रतिफल के लिए व्यक्ति में आकर्षण की मात्रा द्वारा प्रभावित होता है। यह सिद्धांत तीन प्रकार के संबंधों को महत्वपूर्ण बताता है- 1. प्रयत्न निष्पादन संबंध 2. निष्पादन पुरस्कार संबंध 3. पुरस्कार व्यक्तिगत लक्ष्य संबंधा


इस सिद्धांत का वर्णन करते हुए स्टीफेन पी राबिन्स 2001 ने लिखा है कि" प्रत्याशा सिद्धांत यह भविष्य कथन करता है कि एक कर्मचारी तभी उच्च स्तर पर प्रयास करेगा जबकि उसे प्रयत्न निष्पादन, निष्पादन पुरस्कार तथा पुरस्कार व्यक्तिगत लक्ष्यों की संतुष्टि क मध्य प्राल संबंधों के अस्तित्व का प्रत्यक्षण हो । उनमें से प्रत्येक संबंध अन्य सुनिश्चित कारकों द्वारा प्रभावित होता है। उदाहरणार्थ, अच्छे निष्पादन की दिशा में प्रयत्न हेतु व्यक्ति में आवश्यक क्षमताएं होनी चाहिए तथा व्यक्ति के निष्पादन के मूल्यांकन की प्रणाली के बारे में यह प्रत्यक्षण हो कि प्रणाली न्यायपूर्ण है।

निष्पादन पुरस्कार संबंध तब मजबूत प्रतीत होगा जबकि व्यक्ति का यह प्रत्यक्षण हो कि पुरस्कार निष्पादन के आधार पर न कि वरिष्ठता, व्यक्तिगत पक्षधरत अन्य मानकों के आधार पर दिया जाएगा. (तथा) पुरस्कार व्यक्तिगत लक्ष्य संबंध एवं अभिप्रेरण उस सीमा तक प्रबल होगी जहां तक कि व्यक्ति यह प्रत्यक्षण करता है कि अच्छे निष्पादन के कारण व्यक्ति को प्राप्त हुआ पुरस्कार उसकी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को संतुष्ट करता है।


उपयुक्त सिद्धांतों द्वारा जो कि वस्तुतः एक दूसरे के पूरक है, यह बात बार बार स्पष्ट हो रही है कि व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में भली प्रकार अभिप्रेरित करने, संतुष्ट करने और समायोजित होने के लिए अनेक कारकों पर सेवायोजक द्वारा मनौवैज्ञानिकों के सहयोग से ध्यान देना चाहिए। व्यावसायिक निर्देशन सेवायोजकों प्रशासकों और प्रबंधकों को सहयोग देने के अतिरिक्त कार्यरत कर्मचारियों को भी यह प्रत्यक्षण करने में सहयोग दे सकता है। कि कर्मचारी भी अपनी दक्षता एवं निष्पादन में वृद्धि करके अपनी अर्न्तस्थ आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील होकर व्यावसायिक समायोजन स्थापित कर सकते हैं।