समस्या समाधान की युक्तियाँ - problem solving tips
समस्या समाधान की युक्तियाँ - problem solving tips
समस्याओं का समाधान, समस्या की प्रकृति, समस्या हल करने हेतु प्राप्त संसाधन, सामग्री तथा स्रोत एवं समस्या हल करने वाले व्यक्ति की योग्यता, क्षमता तथा समस्या समाधान सम्बन्धी प्रशिक्षण एवं अभ्यास आदि पर निर्भर करता है। मनोवैज्ञानिकों तथा विद्वानों ने अपने अध्ययन और अनुसंधान के परिणामस्वरूप ऐसी कुछ विशेष व्यूह रचनाओं (Strategies) एवं युक्तियों (Tactics) के उपयोग की सिफारिश की है जिनकी सहायता से समस्या का हल ढूँढने में सहायता मिल सकती है अथवा उसके हल में समय तथा शक्ति के सन्दर्भ में बचत हो सकती है। ऐसी कुछ महत्वपूर्ण व्यूहरचनाओं तथा युक्तियों का वर्णन नीचे किया जा रहा है।
1. एल्गोरिथम्स (Algorithms)- एल्गोरिथम्स समस्या समाधान में प्रयुक्त एक ऐसी व्यूह रचना ( ) है जिसमें समस्या का समाधान तलाश करने के लिए तब तक सभी संभावित उत्तरों या हलों को एक एक करके परखा जाता है
जब तक कि उसका सही उत्तर या हल न निकल जाए। एल्गोरिथम्स सही अर्थों में और कुछ नहीं बल्कि ऐसे निश्चित नियम अथवा कार्य करने के ऐसे निश्चित ढंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी सहायता से चाहे देर या परिश्रम कितना भी लग जाए, समस्या का समाधान हो ही जाता है। इनकी विशेषता ही इस बात में होती है कि इनके द्वारा यांत्रिक ढंग (Measurement way) ) से समस्याओं का हल निकलता रहे, चाहे इस काम में देर कितनी भी लग जाए।
2. ह्यूरिस्टिक्स (Heuristics)- एल्गोरिथम्स की तुलना में ह्यूरिस्टिक्स इस प्रकार की व्यूहरचना है जिनमें समय तथा शक्ति दोनों ही कम खर्च होते हैं और समस्या का समाधान अपेक्षाकृत आसानी से निकल आता है।
परिभाषा के रूप में ह्यूरिस्टिक्स समस्या समाधान में प्रयुक्त ऐसी व्यूहरचनाओं का में प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें कुछ ऐसे निश्चित तथा पूर्व नियत नियमों या धारणाओं का उपयोग होता है जिनसे समाधान निकलने में समय और शक्ति दोनों की ही अधिक-से-अधिक बचत हो।
3. ह्यूरिस्टिक्स के रूप में प्रसिद्ध जिन अनेक व्यूहरचनाओं का प्रायः हम समस्या समाधान के लिए प्रयोग करते रहते हैं उनमें से कुछ उल्लेखनीय नाम निम्न हैं:
i. उप-लक्ष्य विश्लेषण (Subgoal analysis)- इस व्यूह रचना का उपयोग करते हुए हम किसी कठिन समस्या के समाधान सम्बन्धी लक्ष्य को छोटे-छोटे परन्तु सार्थक लक्ष्यों में इस •प्रकार विभाजित करने का प्रयत्न करते हैं
ताकि इन छोटे-छोटे लक्ष्यों की प्राप्ति आसानी से होती जाए और फिर इस प्रकार अंतिम लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। इस तरह लक्ष्य को कई प्राप्त करने योग्य उपलक्ष्यों में बाँटकर समस्या समाधान के प्रयत्न करना बहुत सी परिस्थितियों में अच्छे परिणाम लाने वाला सिद्ध हो सकता है।
ii. साधन-लक्ष्य विश्लेषण ( Means-end analysis)- समस्या समाधान में किसी लक्ष्य तक पहुँचना होता है और उस लक्ष्य तक पहुँचने में साधनों की आवश्यकता होती है। जिन साधनों को अपनाया जा रहा है, जिस रास्ते से मंजिल तक पहुँचने की बात सोची जा रही है उसकी उपयुक्तता, वांछनीयता तथा उचितता का अच्छी तरह विश्लेषण या मूल्यांकन समस्या समाधान कार्य में हमारी अच्छी तरह सहायता कर सकता है।
अगर समय-समय पर यह विश्लेषण ऐसे होता रहे कि लक्ष्य कितना है, लक्ष्य की प्राप्ति के हिसाब से साधन कैसे हैं, लक्ष्य कितना बड़ा है, उसके हिसाब से साधन कितने बड़े-छोटे हैं, लक्ष्य की कितनी प्राप्ति हो गई- अब आगे की प्राप्ति हेतु साधनों में क्या परिवर्तन किया जाना चाहिए आदि-आदि बातों का निर्णय लेना ही साधन लक्ष्य विश्लेषण कहलाता है।
iii. उल्टा चलना (Working backward)- समस्या समाधान की इस व्यूहरचना का उपयोग करते हुए समाधानकर्ता समस्या के लक्ष्य या अंतिम पड़ाव से अपनी कार्ययात्रा प्रारंभ करता हुआ समस्या को हल करने से सम्बंधित आरम्भिक स्थिति में पहुँचने का प्रयत्न करता है। अगर कोई समस्या ऐसी है जैसे हम कहीं अपने स्कूटर की चाबी भूल गए हैं, तो इस समस्या के समाधान हेतु हमें पीछे लौटने या उल्टे चलने की व्यूहरचना अपनानी पड़ेगी। जहाँ अब हम हैं उससे पहले कहाँ थे, क्या कर रहे थे, वहाँ किस-किस जगह बैठे थे, उससे पहले कहाँ थे, आदि-आदि स्थितियों पर विचार करते-करते हमें कहीं से थोड़ा-बहुत अंदाजा लग सकता है कि हमारी चाबी वहाँ से मिल सकती है।
इस तरह अंतिम परिणाम या लक्ष्य क्या है उसे पहचान कर समस्या समाधान के इस इच्छित अंतिम बिन्दु से शुरू करके हम इस तरह सावधानी से पीछे हटते जाते हैं ताकि हमें समस्या समाधान की प्रारम्भिक स्थिति में पहुँचने में आसानी हो।
iv. समानता या तुल्यता का उपयोग (Using an analog)- सादृश्यता का उपयोग करने से सम्बंधित व्यूहरचना एक तरह से पूर्व अनुभव, प्रशिक्षण तथा अभ्यास को आधार बनाकर अपनाई जाने वाली समस्या समाधान व्यूहरचना है। इसमें समाधानकर्ता प्रस्तुत समस्या का सादृश्य अपने विगत अनुभवों या हल की गयी पहले की समस्याओं में खोजता है या नई समस्या का जब वह सामना कर
V. रहा होता है और उसे कोई हल नहीं मिलता तो उसके सामने प्रस्तुत समस्या से मिलती जुलती किसी ऐसी समस्या को उदाहरण के रूप में रखा जाता है जिसके हल से वह परिचित हो या जिसका हल वह अपने प्रयत्नों से आसानी से निकाल सकता है।
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