विश्लेषण और निर्वचन की प्रक्रिया - Process of Analysis and Interpretation

विश्लेषण और निर्वचन की प्रक्रिया - Process of Analysis and Interpretation


वित्तीय विवरणों का निर्वाचन सचमुच एक कला है। इसके अन्तर्गत तथ्यों का विश्लेषण, अनुविन्यसन, तुलना, प्रवृत्ति अध्ययन व उनके आधार पर निष्कर्ष निकालना आदि क्रियायें शामिल हैं। इसकी प्रक्रिया को मोटे रूप में निम्न चार भागों मे बाँटा जा सकता है


(1) विश्लेषण (Analysis) - इसका आशय वित्तीय विवरणों में दिये गये तथ्यों को किसी वैज्ञानिक रीति से सुविधाजनक भागों में वर्गीकृत और विन्यासित करना है जिससे अर्थपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकें। इस क्रिया के निम्न दो महत्वपूर्ण भाग होते हैं -


(अ) समकों को उपयोगी रूप में रखना मानव मस्तिष्क छोटे व संक्षिप्त अंकों को शीघ्र समझ लेता है।

इसके अतिरिक्त सक्षिप्त अंकों के आधार पर गणितीय क्रियायें भी सरल हो जाती है। अतः विश्लेषण के लिये अधिक उपयोगी बनाने के लिये वित्तीय विवरणों के मौलिक अंकों को उपसदन (Approximation) की रीति से पूर्णांक बना लिया जाता है।


(ब) तथ्यों का पुनर्वर्गीकरण करके अनुविन्यसित करना विश्लेषण के लिये वित्तीय विवरणों के मदों को उचित व स्पष्ट वर्गों में विभाजित किया जाता है और उन्हें अनुविन्यासित ( Rearrange) करके पुनः इच्छित विवरण रूप में रखा जाता है। यह क्रिया तब अधिक महत्त्वपूर्ण होती है जबकि वित्तीय विवरणों को खाता रूप में बनाया गया हो। विभिन्न मदों को पुनर्वर्गीकरण व अनुविन्यसन का प्रारूप विश्लेषण के उद्देश्य पर निर्भर करता है। अतः इसका कोई प्रमापित रूप नहीं बतलाया जा सकता।


(2) तुलना ( Comparison) - वित्तीय विवरणों की मदों के अनुविन्यसन के पश्चात उसकी सापेक्षिक मात्रा का माप किया जाता है। इसके लिये विभिन्न निर्वाचन विधियों का प्रयोग करके विभिन्न मदों के बीच तुलनात्मक सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। शुद्ध निर्वचन के लिये तुलना आवश्यक होती है। वित्तीय विवरणों की निरपेक्ष मदों के आधार पर निर्वचन त्रुटिपूर्ण व भ्रमात्मक निष्कर्ष दे सकता है। 


( 3 ) प्रवृत्ति का अध्ययन (Study of Trend) - वित्तीय विवरणों की मदों का तुलनात्मक अध्ययन करके एक विश्लेषक महत्त्वपूर्ण सूचनाओं की भावी प्रवृत्तियों को मापता है। निर्वचन के लिये प्रवृत्ति अध्ययन एक अति महत्वपूर्ण भाग होता है।


(4) निष्कर्ष निकालना (To Draw Conclusion ) - यह निर्वचन का अन्तिम चरण होता है। इसका उद्देश्य तथ्यों की व्याख्या करके संस्था की स्थिति के सम्बन्ध में निष्कर्ष निकालना व राय प्रकट करना होता है। लेखापाल के ये निष्कर्ष ही प्रबन्ध के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं। ये निष्कर्ष आर्थिक तथ्यों पर आधारित होते हैं।