लाभ-हानि खाता - PROFIT & LOSS ACCOUNT
लाभ-हानि खाता - PROFIT & LOSS ACCOUNT
आर्थिक चिट्ठे से केवल यह ज्ञात होता है कि एक निश्चित तिथि को सस्था की वित्तीय स्थिति क्या है। परन्तु प्रत्येक व्यावहारिक लेन-देन का तुरन्त और प्रत्यक्ष प्रभाव आर्थिक चिट्ठे की मदो पर पड़ता है और परिवर्तन हो जाता है। परन्तु इस परिवर्तन की तत्काल मापित करना सम्भव नहीं होता है, क्योंकि आर्थिक चिट्ठा एक विशेष तिथि को तैयार किया जाता है। हां, दो विभिन्न तिथियों पर तैयार किये गये आर्थिक चिट्ठों का तुलनात्मक अध्ययन करके वर्ष भर के शुद्ध परिवर्तनों को ज्ञात किया जा सकता है। परन्तु यह शुद्ध परिवर्तन कई कारणों का सामूहिक परिणाम होता है। विश्लेषण क्रिया से प्रत्येक कारक के प्रभाव के विषय में ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होता है। यह कार्य लाभ-हानि खाते द्वारा पूरा किया जाता है। लाभ-हानि खाता एक निश्चित लेखा-अवधि के बीच व्यवसाय संचालन के परिणाम की रिपोर्ट होता है।
हैरी जी गुथमन्न ( Harry G. Guthmann) के अनुसार, लाभ और हानि का वितरण, ऐसे आय व खर्च का वर्गीकृत व संक्षिप्त अभिलेख है जो एक निश्चित अवधि के लिए स्थायी हित में परिवर्तन के कारण होते हैं। "
(1) प्रारूप ( Form ) - आर्थिक चिट्ठे की तरह लाभ-हानि को भी खाता' के रूप में या विवरण के रूप में तैयार किया जा सकता है। यह स्मरणीय है कि भारतीय कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत लाभ-हानि खाते का ऐसा कोई प्रारूप नहीं निर्धारित किया गया है जैसा कि आर्थिक चिट्ठे के सम्बन्ध में हैं। परिणामस्वरूप व्यवहार में उद्योग के प्रकार व व्यवसाय - हित की भिन्नता के आधार पर लाभ-हानि खाता भिन्न-भिन्न रूप में तैयार किया जाता है। लाभ-हानि खाते का कोई भी प्रारूप क्यों न हो, उसमें स्पष्ट रूप से सस्था की आय एवं व्यय की मदों को उचित शीर्षकों में दिखाया जाता है। फिर लाभ-हानि खाता इस रूप में तैयार किया जाता है
कि उसके द्वारा कम्पनी के कार्यों का परिणाम स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया गया हो। यह भी महत्वपूर्ण है कि अपवाद-प्रवृत्ति व बार-बार न होने वाले खर्चों की मदों को अलग से दिखाया जा सके लाभ-हानि खाते का चाहे कोई भी प्रारूप क्यों न हो, उसके द्वारा निम्न पर प्रकाश अवश्य पड़ना चाहिए :
(i) व्यवसाय के संचालन में आय के स्रोत जैसे विक्रय, विनियोग पर आय, अन्य ब्याज, विनियोग के विक्रय पर लाभ लाभांश प्राप्ति, आदि (ii) ऐसा लाभ जो अपवाद स्वरूप, असाधारण या बार-बार न किये जाने वाले लेन-देन से कमाया हुआ हो। (iii) व्यवसाय संचालन के सभी व्यय । (iv) बेची गयी वस्तु की लागत । (v) आय कर (vi) किये गये विभिन्न प्रावधान। (vii) शुद्ध लाभ या हानि।
(2) शीर्षक (Title) – आर्थिक चिट्ठे की तरह लाभ-हानि खाते को भी कई नामों से पुकारा जाता है। व्यवहार में इस विवरण के शीर्षक देने में कोई एकरूपता नहीं है। साधारणतया निम्न शीर्षकों में से किसी एक का प्रयोग किया जाता है
(1) आय व उपर्जित बचत का विवरण (2) आय का विवरण (3) आय, लाभ और हानि का विवरण (4) आय व खर्च का विवरण, (5) सचालन विवरण । किसी संस्था का आर्थिक चिट्ठा और लाभ-हानि खाता दोनों उस संस्था की वित्तीय स्थिति व लाभार्जन शक्ति एवं प्रगति के विषय में महत्वपूर्ण सूचनाएं प्रदान करते हैं। इन दो विवरणों का अध्ययन करने से उन कारकों का भी पता लग जाता है जो अमुक वित्तीय स्थिति व प्रगति के लिए उत्तरदायी होते हैं। परन्तु इन विवरणों में केवल वित्तीय कारको (Financial factors) का ही लेखा हो पाता है, जबकि एक संस्था के व्यावसायिक जीवन पर अन्य सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक कारकों का भी प्रभाव पड़ता है, जिनका विवरण आर्थिक चिट्ठा व लाभ-हानि खाते में नहीं दिया जा सकता है। इस प्रकार के कारकों के सम्बन्ध में सूचना देने के लिए प्रबन्ध संचालक रिपोर्ट व अध्यक्षीय भाषण का प्रयोग करता है। अतः किसी भी संस्था की प्रगति व स्थिति के विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए आर्थिक चिट्ठा व लाभ-हानि खाता के साथ-साथ सचालक रिपोर्ट व अध्यक्षीय भाषण का भी अध्ययन करना अनिवार्य हो जाता है।
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