मनो-सामाजिक विकास - psychosocial development

मनो-सामाजिक विकास - psychosocial development


इरिक्सन का यह मानना था कि व्यक्तित्व का विकास श्रृंखलाबद्ध चरणों में घटित होता है। इसीलिए इसे मानव-व्यक्तित्व के विकास का सिद्धांत भी कहा जाता है। यह सिद्धांत सम्पूर्ण जीवन विस्तार में सामाजिक अनुभवों के प्रभावों पर ध्यान देता है जिनसे व्यक्तित्व का विकास संभव हो पाता है।


इरिक्सन का यह सिद्धांत व्यक्तित्व विकास के संदर्भ में शैशवावस्था से लेकर प्रौढ़ अवस्था तक बाह्य-कारको, अभिभावकों और समाज के प्रभाव को स्पष्ट करता है। यह प्रभाव ही व्यक्ति के सामाजिक व्यक्तित्व का निर्माण करता है। उनका यह सिद्धांत विकास के आठ चरणों का उल्लेख करता है। प्रत्येक चरण में एक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मूल्य का संघर्ष महत्वपूर्ण है। साथ ही भावात्मक दायित्व के विकास में जो लक्ष्य विफल रहे हैं, उनका भी उल्लेख किया गया है।

इरिक्सन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण जीवन काल में इन आठ चरणों की परस्पर श्रृंखला से गुजरता है। एरिक्सन के मनो-सामाजिक विकास के सिद्धांत के आठ चरण इस प्रकार हैं- 


चरण 1 बुनियादी विश्वास बनाम अविश्वास


इरिक्सन के मनो-सामाजिक विकास के सिद्धांत का पहला चरण जन्म से एक वर्ष की आयु तक विस्तृत है। यह जीवन का आरंभिक स्तर है। शिशु सम्पूर्ण रूप से अपनी देखभाल करने वाले व्यक्ति पर निर्भर होता है। देखभाल करने वाले व्यक्ति के प्रति विश्वास का भाव यही निर्भरता प्रदर्शित करती है। शिशु अपनी समस्त आवश्यकताओं के लिए इस पर निर्भर होता है। यदि माता-पिता और देखभालकर्ता (पालक) यह विश्वास बनाने में असफल होते हैं, तो बच्चे में अविश्वास की भावना प्रबल हो जाती है। इस स्तर पर जिन शिशुओं में विश्वास का विकास होता हैं, वे कुशल और सुरक्षित महसूस करते हैं और जिन में विश्वास का विकास नहीं हो पाता है, वे दुनिया को असंगत और अप्रत्याशित मानते है और अविश्वास का शिकार हो जाते हैं।


चरण 2 स्वायत्तता बनाम लज्जा या संदेह


इरिक्सन के मनो-सामाजिक विकास के सिद्धांत का दूसरा चरण प्रारम्भिक शैशवावस्था के दौरान शुरू होता है। इस चरण में बच्चे कुछ सीमा तक आजादी पाना शुरु करते हैं। वे बुनियादी या आधारभूत कार्य स्वयं करने लगते हैं। वे अपने आसान निर्णय भी स्वयं लेने लगते हैं जैसे कि उन्हें क्या चाहिए आदि। बच्चों को चयन के अवसर प्रदान करके और नियंत्रण द्वारा अभिभावक और देखभालकर्ता उनमें स्वायत्तता की भावना का विकास करते हैं।


फ्रायड की तरह इरिक्सन का भी यह मानना है कि शौचालय प्रशिक्षण (Toilet training) इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह बच्चों में स्वतंत्रता की भावना को बढ़ा देता है। हालांकि इरिक्सन का तक फ्रायड से काफी भिन्न था। बच्चे अपनी इच्छाओं को क्या खाएँगे, किस खिलौने से खेलेंगे और कौन-से कपड़े पहनेंगे आदि को नियंत्रित करना शुरू करते हैं। जो बच्चे इस स्तर पर सफल होते हैं, वे आत्मविश्वास अर्जित करते हैं। जो सफल नहीं होते वे आत्म-संदेह और अपर्याप्तता की भावना से जूझते हैं। इरिक्सन का मानना है कि स्वायत्तता और संदेह के बीच संतुलन प्राप्त करना इच्छाशक्ति की तरफ बढ़ाता है यह भरोसा दिलाती है कि बच्चे स्वेच्छा से कारण और सीमाओं में रहते हुये कार्य कर सकते हैं।


चरण 3 पहल बनाम ग्लानि


विद्यालय पूर्व स्कूली वर्षों के दौरान बच्चे अपने अधिकारों का प्रयोग करना शुरु करते हैं। वे अपनी स्वतंत्रता का दायरा बनाते हैं कि दूसरों के साथ वे किस तरह खेलें और बातचीत करें। इस स्तर पर जो बच्चे सफल होते हैं, वे स्वयं को सक्षम और समर्थ महसूस करते हैं और नेतृत्व कौशलों को विकसित करते हैं। इसके विपरीत जो बच्चे सफल नहीं हो पाते, वे अपराधबोध, आत्मसंदेह और पहल की कमी की भावना से घिर जाते हैं। इस स्तर पर बच्चे अपने आस-पास के किशोरों व वयस्कों की नकल उतारने का प्रयास करते हैं और उसी अनुरूप वे अपने खेल की परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। सबसे अधिक बच्चे दुनिया के बारे में ऐसा क्यों हैं" के संदर्भ में जानने का प्रयास करते हैं। इस स्तर पर बच्चे के विकास में परिवार का मुख्य स्थान होता है।


चरण 4- उद्योग बनाम हीनता


इस चरण में प्रारम्भिक स्कूली वर्षों में अध्ययनरत 5/6 साल की उम्र से लेकर 11 / 12 साल तक की उम्र के बच्चों को शामिल किया गया है।

सामाजिक संबंध विकास की कुंजी हैं। जब बच्चे अपनी गरिमा का निर्माण अपने कार्यों के आधार पर करने लगते हैं तब उनमें वे क्या करते हैं और क्या कर सकते हैं की भावना का विकास होता है।


माता-पिता और शिक्षकों से मिली प्रशंसा से बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपनी कार्यक्षमता कुशलता को दिखाने के दूसरे अवसर ढूंढते हैं। परन्तु यदि माता-पिता और शिक्षक यह विश्वास दिलाने में असफल होते हैं तो बच्चे यह सोचते हैं कि उनमें कार्य करने की कोई क्षमता नहीं है। इस स्तर पर विद्यालय और पास-पड़ोस के साथ बच्चे का संबंध महत्वपूर्ण होता है।


चरण 5 पहचान बनाम भूमिका संशय


किशोरावस्था के दौरान बच्चे अपनी स्वतंत्रता की खोज एवं 'पहचान' स्थापित करना शुरु करते हैं।

इस स्तर पर बच्चों को आरम्भ से ही प्रोत्साहन और पुनर्बलन देना उनकी स्वतन्त्रता और नियंत्रण की क्षमता को बढ़ाता है। जबकि जो बच्चे प्रोत्साहन और पुनर्बलन से बंचित रह जाते हैं, वे संवेगात्मक रूप से भ्रम और असुरक्षा की भावना में भटकते हैं। एक किशोर अपनी पहचान की खोज की सतत यात्रा में लगा रहता है और इसके लिए सामाजिक पारस्परिक क्रियाओं का सहारा लेता है। साथ ही किशोरावस्था में सही एवं गलत से सम्बंधित निर्णय लेने की क्षमता का विकास भी होता है। जो व्यक्ति इस स्तर तक नहीं पहुँच पाते, वे भूमिका को लेकर संशय का अनुभव करते हैं।


चरण 6 अंतरंगता बनाम अलगाव


इस चरण का आरंभ उत्तर किशोरावस्था में होती है, जब लोग व्यक्तिगत संबंधों की खोज में लगे होते हैं। इरिक्सन का मानना था कि अनिवार्य रूप से लोग दूसरों के साथ निकटता तथा वचनबद्ध रिश्तों का विकास करते हैं।

जो इस स्तर पर सफल हो जाते हैं, वे वचनबद्ध और सुरक्षित रिश्तों का निर्माण कर पाते हैं। जो किशोर रिश्तों को स्थापित करने में असफल रहते हैं, वे अकेलेपन और एकान्त के भाव से संघर्ष करते रहते है। इस स्तर पर लोगों को साथी, सहारे और प्यार की जरूरत होती है। कुछ अपना परिवार शुरू कर चुके होते हैं तथा कुछ उसकी तैयारी में लगे होते हैं। ऐसे में व्यक्ति को गहरी अंतरंगता और संतोषजनक सम्बंधों की जरुरत होती है। यदि वे असफल होते हैं, तो उनमें समाज और परिवार के प्रति अलगाव पैदा होता है। चरण 


7- उत्पादिता बनाम आत्म-आत्म-समावेशन और अवरोधन


प्रौढ़ावस्था के दौरान हम अपने जीवन के निर्माण में निरंतर लगे रहते हैं। अपने भविष्य और परिवार पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। इस स्तर पर कैरियर और काम सर्वाधिक महत्वपूर्ण सरोकार होता है। जो इस दौरान सफल होते हैं, वे सोचते हैं कि उन्होंने घर और समुदाय में रहते हुए सक्रिय रूप से दुनिया में सहयोग दिया।

जो इस कौशल को पाने में असफल होते हैं, वे स्वयं को अवरोधक मानते हैं और सोचते हैं कि वे दुनिया का हिस्सा ही नहीं हैं। इस स्तर पर निष्क्रियता और अर्थहीनता दोनों ही सामान्य डर का रूप ले लेते हैं। जिससे जीवन में व्यापक बदलाव आते हैं।


चरण 8- चारित्रिक अखंडता बनाम निराशा


एरिक्सन का मानना था कि जीवन की तैयारी प्रायः प्रौढ़ावस्था के लिए होती है और अंतिम स्तर उसके प्रतिबिंब को जीवन में शामिल करता है। वृद्धावस्था में कुछ लोग जब तटस्थता की भावना के साथ पीछे मुडकर देखते हैं तो उन्हें अपने अर्थपूर्ण जीवन और मूल्यवान योगदान का अहसास होता है। ऐसा करते हुए कुछ लोगों में निराशा की भावना आ जाती है। कुछ को लगता है कि उनका जीवन बर्बाद हो गया है और इसके लिए उन्हें पछतावे का अनुभव होता है। साथ ही, वे व्यक्तिगत कडवाहट और निराशा की भावनाओं से घिरे रहते हैं। 


शिक्षकों के लिए इरिक्सन के मनो-सामाजिक विकास के सिद्धांत पर आधारित मार्गदर्शन


९. अध्यापक को शिक्षार्थियों के समक्ष ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए जिससे उनमें अध्यापक प्रति विश्वास पैदा हो


क्योंकि वे ही उनके प्रयासों की योजना और गतिविधियों को आगे ले जाने के लिए मुख्य भूमिका निभाते हैं।


२ शारीरिक, संज्ञानात्मक और सामाजिक कौशल विकास के लिए अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। शिक्षार्थियों में आत्म अवधारणा और संतोष बनाए रखने के लिए कक्षा स्तर पर अवसर प्रदान करने होंगे ताकि मनोसामाजिक विकास समग्र रुप में हो सके।


3 बच्चों को करियर के विभिन्न विकल्पों और सामाजिक एवं राजनीतिक मान्यताओं व प्रणालियों के विभिन्न प्रकारों का पता लगाने के लिए अवसर प्रदान करने होंगे।


४ शिक्षकों को लगातार कक्षा की दिनचर्या और अभ्यासों को विकसित करने और निर्धारित करना चाहिए । इससे शिक्षार्थियों को यह महसूस होगा कि कक्षा एक सुरक्षित स्थान है जहाँ वे अध्ययन कार्य कर सकते हैं और दोस्त भी बना सकते हैं।


५ शिक्षक को हमेशा शिक्षार्थियों के हित के लिए उनके प्रति वास्तविक चिंता दिखानी चाहिए और यह महसूस कराना चाहिए कि कक्षा एक सुरक्षित और स्नेहपूर्ण जगह है। कक्षा को शिक्षार्थियों के साथ मिलकर सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाना चाहिए।


६. शिक्षार्थी वर्ग को सबके सामने बोलने और बोर्ड पर लिखने के लिए अवसर देने चाहिए। साथ ही शिक्षक को शिक्षार्थियों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। शिक्षार्थियों के साथ निरंतर संबाद करना चाहिए उनके मनोसामाजिक विकास के लिए आवश्यक है।


७ स्वयं या खुद से कार्य करने वाले और जिम्मेदारी उठाने वाले बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए,

ताकि सामाजिक स्तर पर वे अपने उत्तरदायित्वों का ठीक से निर्वाह करने में सक्षम हो सके। साथ ही, अध्ययन के दौरान उनमें उत्पन्न होने वाली हीनता और कमियों को भी दूर करना चाहिए। यह तभी संभव होगा जब उन्हें आत्ममूल्यांकन के अवसर प्राप्त होंगे।


८. शिक्षार्थियों को खिलौने और अन्य बस्तुओं में अदला-बदली करने के अवसर दिये जाएं, ताकि उन्हें आवश्यक पेशीय समन्वय विकसित करने का मौका मिले इसके लिए उचित विकासात्मक पाठ्यक्रम का इस्तेमाल और उसे दिनचर्या में शामिल करना उपयोगी होगा।


९. माता-पिता और शिक्षकों को चाहिए कि वे किशोरों को विभिन्न नौकरियों का पता लगाने के अवसर प्रदान करें।