जेंडर के मनोसामाजिक परिप्रेक्ष्य - Psychosocial Perspectives of Gender

जेंडर के मनोसामाजिक परिप्रेक्ष्य - Psychosocial Perspectives of Gender


'वाद' शब्द जिस विषय के साथ जुड़ता है, वह अपने साथ एक विचार, चिंतन, क्रांति, संघर्ष और आंदोलन के बीज लेकर चलता है। जैसे-जैसे यह 'वाद' का बीज पनपता है, बढ़ता है, वैसे-वैसे वाद के संबंध मे विभिन्न प्रकार के विचार व अनेक दृष्टिकोण सामने आने लगते हैं । फिर सहमति असहमति का दौर चलता है। विभिन्न व्यक्तियों के विचारों मे टकराहट होती है। इस विचार द्वंद्व से 'वाद' का एक रचनात्मक और सकारात्मक पक्ष सामने आता है, जिसमें समाज के अधिकांश लोगों का हित समाहित होता है। निश्चय ही नारीवाद, स्त्री के हित में किया जा रहा, एक ऐसा आंदोलन है, जो विभिन्न कारणों को लेकर, विश्व भर में फैल चुका है। नारी का शोषण, उत्पीड़न और अत्याचार सभी देशों में कमोबेश रूप में उपस्थित है। नारीवाद को स्पष्ट करते हुए वृंदा करात लिखती हैं: "नारीवाद और महिला मुक्ति आंदोलन दो अलग-अलग वस्तुएं हैं।

नारीवाद एक विचारधारा है, जिसके आधार पर महिलाओं की मुक्ति के प्रयास किए जाते हैं। इसके अनेक रूप हैं, अलग-अलग प्रवृत्तियां है, जिन्हें समय-समय पर अलग-अलग रूपों में परिभाषित किया जाता है। मसलन एक नारीवाद वह है, जिसका मानना है हर पुरुष और हर स्त्री के मध्य एक विरोध है, जो सामाजिक अंतर्विरोध में सर्वप्रमुख अंतर्विरोध है। कुछ लोगों की समझ में यही बुनियादी नारीवाद हैं। दूसरा नारीवाद है - समाजवादी नारीवाद, जो समाजवादी व्यवस्था में तो विश्वास रखता है, लेकिन जिसका मानना है कि समाजवाद की विचारधारा में वर्ग को अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि स्त्री होने के कारण उस पर होने वाले शोषण को अधिक उजागर करने की जरूरत है। तीसरा नारीवाद 'इंसेशियलिस्ट' (तात्विक) है, जिसकी मान्यता है कि जननी होने के कारण स्त्री की प्रकृति पुरूष से भिन्न है, जैसे पुरुष का हिंसक तथा स्त्री का शांतिप्रिय होना और पुरूष की तुलना में स्त्री का प्रकृति से अधिक गहरा और मानवीय सरोकार रखना है।"


नारीवादी अवधारणा कई प्रश्नों से गुथी हुई है। विभिन्न विचारकों ने अलग-अलग कोण से नारीवादी विचारधारा को तराशने का प्रयास किया है, पर इस तराशने की प्रक्रिया में बहुत-सी चीजें समानांतर चलती हैं। किसी एक चीज या तथ्य को लेकर नारीवादी विचारधारा को एक फ्रेम में नहीं जड़ा जा सकता है । नारीवादी विचारधारा में भी स्त्री ही केंद्र में है और उसके चारों ओर जो घेरा बन गया है उसके आधार पर उसे पुरूष की तुलना में कहीं छोटा ठहराया गया है। यह शिद्दत के साथ उछाला जाता है कि प्रकृति ने ही जेंडर के आधार पर स्त्री और पुरूष को अलग-अलग बनाया है। दोनों की शारीरिक विशेषताएं एक दूसरे से भिन्न हैं। पुरूष बाह्य संसार में शक्तिशाली है। अपनी शक्ति से विजय पताका फहराता आया है। नारी तो गृह शोभा है। घर के कार्य में निपुण है, श्रेष्ठ है। इस दृष्टि से दोनों असमान हैं, क्योंकि दोनों की क्षमताएं, शक्ति और बौद्धिक योग्यता में भी अंतर है। इस जेंडर विभेद को लेकर अनेक विचार प्रकट किए जाते रहे हैं। अनामिका नारीवाद की तीन मूल प्रवृत्तियां की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहती हैं ". फेमेनिज्म की तीन मूल प्रवृत्तियां है: 1. जेंडर एक सामाजिक कन्स्ट्रक्ट है

2. पितृसत्तात्मक व्यवस्था मे आचार संहिताएं चूंकि पुरूषों की बनाई हुई होती हैं, इसलिए स्त्रियों की तुलना में पुरूषों के प्रति इनका रवैया पक्षपातपूर्ण होता है स्त्रियों को विकास के समान अवसर भी 'कृपापूर्वक ही दिए जाते हैं 3. भविष्य का जो जेंडर शोषण मुक्त समाज होगा, उसे गढ़ने में स्त्रियों के कार्यक्षेत्र, प्रेम, प्रजननादि का अनुभव मूलक वृत्तांत और उनकी भाषा तथा शिल्प के 'स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास बहुत निर्णायक सिद्ध होंगे। इस प्रकार फेमिनिज्म के दो दायित्व हो जाते हैं पहला, जेंडर स्टीरियोटाइप पर प्रहार तथा दूसरा, स्त्री मन और शरीर की सही समझ का विकास"।


'वाद' शब्द अपने साथ विषय से संबंधित सहमत और असहमत की विचारधारा को लेकर चलता है। देश-विदेश में विद्वानों के अपने खेमे हैं। वे प्रत्येक विषय को एक विशेष सिद्धांत व विचारधारा के तहत देखते, परखते, विश्लेषित करते हैं। पर प्रत्येक सिद्धांत अपने विचारों की भूमि पर नए बीज भी बोता है, जो आगे चलकर एक सम्प्रदाय अथवा स्कूल का रूप ले लेते है । इस दृष्टि से हम कुछ निम्नलिखित सिद्धांतों को देखने का प्रयास करेंगे