शिष्य - pupil

शिष्य - pupil

शिष्य के लिए आवश्यक है मन, वचन एवं आचरण की शुद्धता। इसके अतिरिक्त उसमें ज्ञान की सच्ची पिपासा तथा लगन के साथ परिश्रम करने की क्षमता का होना न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि अनिवार्य भी। अटूट लगन एवं निरन्तर अभ्यासशिष्य को शिक्षा के उच्चतम शिखर पर ले जाते हैं। शिक्षा की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि शिष्य में गुरु के प्रति अटूट विश्वास हो। विनयशीलता तथा श्रद्धाके बिना छात्र की साधना कदापि सफल नहीं हो सकती है। गुरुभक्ति जागरूक और उदनु बहोनी चाहिए, अधभक्ति नहीं। इन कतिपय आवश्यक गुणों से युक्त शिष्य ही वास्तविक रूप से शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं। विवेकानन्द की दृष्टि में स्त्री शिक्षा हमारे देश में बेदान्त ने यह स्पष्ट घोषणा की है कि सभी प्राणियों में एक ही आत्मा विराजमान है। इस नाते स्त्रियाँ तथा पुरषों में किसी प्रकार के भेद की गुंजाइश ही नहीं है। किन्तु व्यावहारिक रूप से देखा जाता है कि हमारे देश में शिक्षा, समाज तथा जीवन के अन्य क्षेत्रों में स्त्रियों तथा पुरुषों में बहुत ही भेद बढ़ता जाता है। पुरुषों ने हमेशा से ही स्त्रियों को पीछे ढकेल रखा है। यह स्थिति बड़ी ही भयावह और चिंतनीय है। वस्तुतः आज सभी उन्नत राष्ट्रों ने स्त्रियों को समुचित सम्मान देकर ही महानता प्राप्त की है।

जो देश जो राष्ट्र स्त्रियों का आदर नहीं करते, वे कभी बड़े नहीं हो सकते। यथार्थ शक्तिपूजक तो वह है जो स्त्रियों में ईश्वर की शक्ति का प्रकाश देखता है। यह सर्वविदित है कि

'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।


आज स्त्रियों की अनेक समस्याएँ हैं। उन समस्याओं के समाधान का अवसर स्वयं स्त्रियों को ही प्रदान करने की आवश्यकता है। स्त्रियों को उपयुक्त स्वस्थ्य तथा स्वतन्त्र बातावरण में शिक्षा देनी चाहिए। धार्मिक शिक्षा चरित्र गठन तथा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन स्त्री शिक्षा के मुख्य अंग होंगे। भारतीय स्त्री जाति के लिए 'सीता'आदर्श होनी चाहिए। सौता में हम पूर्ण विकसित नारीत्व का साक्षात् दर्शन करते हैं। आज हमारी नारी को सीता के गुणों से विभूषित होना है और इन गुणों का स्त्रियों में समावेश ही सच्ची नारी शिक्षा है।


त्याग का गुण आज स्त्री शिक्षा का मूलाधार होना चाहिए। जिसमें त्याग का गुण नहीं आया वह नारी आदर्श नहीं हो सकती है। इतना ही नहीं उसमें शारीरिक स्वास्थ्य और आत्मरक्षा की क्षमता का भी पूर्ण विकास होना चाहिए। इसके अतिरिक्त बौद्धिक विषयों के साथ-साथ स्त्रियों में लौकिक दक्षता एवं कुशलता का भी होना आवश्यक है। इस प्रकार स्त्री शिक्षा का बड़ा ही उदार स्वरूप स्वामीजी ने उपस्थित किया है।


जन समूह की शिक्षा आज समाज के गरीब तथा मजदूर वर्ग के लोगों की दशा अत्यन्त ही दयनीय है। उन्हें भोजन नहीं मिलता और वह अधःपतन के गर्त में दिन प्रतिदिन गिरते ही जा रहे हैं। हम उनके प्रति जागरूक नहीं हैं। यह वस्तुतः पाप है। सही शिक्षा तो गिरे हुए जन समाज को उठाना है उनमें आत्मविश्वास एवं गौरव की वृद्धि करना है। अतः जनसमूह की शिक्षा ही उनकी मुक्ति का एक उपाय है।


जनसमूह को शिक्षा की सार्थकता प्रदान करने के लिए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को बनाना होगा। तभी तो उन्नत विचारों को उन तक सुगमतापूर्वक पहुचाया जा सकता है। इस शिक्षा को पूर्णता प्रदान करने के लिए उन्हें संस्कृत की शिक्षा भी देनी चाहिए। इस प्रकार आध्यात्मिक सत्य को उनकी पहुँच के भीतर लाया जा सकता है। वे तभी अपने को पहचान सकेंगे अपनी क्षमता से परिचित हो सकेंगे।


हमारे राष्ट्र की आत्मा झोपडियों में निवास करती है। अतः शिक्षा के दीपक को घर-घर ले जाना होगा, तभी तो समस्त जन समाज उद्बुद्ध हो सकेगा। उन्हें कर्म की शिक्षा दी जाए। यही तो वास्तविक जीवन की शिक्षा है। शिक्षा मन्दिर का द्वार सर्व साधारण के लिए खोल दिया जाए। शिक्षा मुक्त हो। दृढ़ लगन और कर्म की शिक्षा ही जन समूह की सच्ची शिक्षा है।