आकलन के उद्देश्य; ब्लूम टेक्सोनोमी का आलोचनात्मक अध्ययन - the purpose of the assessment; Critical Study of Bloom Taxonomy
आकलन के उद्देश्य; ब्लूम टेक्सोनोमी का आलोचनात्मक अध्ययन - the purpose of the assessment; Critical Study of Bloom Taxonomy
पाठ्यवस्तु के विश्लेषण के पश्चात अधिगम उद्देश्यों का निर्धारण करना तथा उन्हें व्यावहारिक पक्ष में लिखना पाठ योजना का एक महत्वपूर्ण अंग है जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के संगठन तथा विद्यार्थी के अधिगम उपलब्धि के मूल्यांकन के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करता है। इन अधिगम उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उपयुक्त अधिगम अनुभवों का चयन किया जाता है तथा विद्यार्थियों के अधिगम निष्पत्ति के मापन के लिए निष्पत्ति परीक्षण या आकलन उपकरण का निर्माण किया जाता है। अधिगम सह आकलन उद्देश्य अधिगम परिणामों तथा विद्यार्थी के व्यवहार में परिवर्तन से जुड़ा होता है। ई. सं. 1948 में बी.एस. ब्लूम तथा उनके सहयोगियों ने अधिगम उद्देश्यों को तीन समूहों में वर्गीकृत किया।
1) संज्ञानात्मक क्षेत्र (Cognitive Domain)
2) भावात्मक क्षेत्र ( Affective Domain)
3) क्रियात्मक क्षेत्र ( Psychomotor Domain )
ब्लूम ने ई.सं. 1956 में प्रकाशित टेक्सोनोमी ऑफ एजुकेशनल ओबजेक्टिवस नामक अपनी पुस्तक में संज्ञानात्मक क्षेत्र में अधिगम उद्देश्यों के आकलन को उत्प्रेरित तथा क्रमबद्ध करने के लिए एक वर्गीकरण (Taxonomy) का प्रतिपादन किया। इसके अंतर्गत अधिगम उद्देश्यों को निम्नलिखित छः वर्गों में व्यवस्थित किया जाता है। ज्ञान, अवबोध, उपयोजन, विश्लेषण, संश्लेषण तथा मूल्यांकन। संज्ञानात्मक क्षेत्र के प्रत्येक स्तर के लिए विशिष्ट अधिगम उपलब्धि या परिणामों का चयन किया जाता है तथा इन्हें व्यावहारिक पक्ष में लिखा जाता है। जब अधिगम उद्देश्यों को व्यावहारिक या मापने योग्य पक्ष में यानी अधिगम परिणामों के रूप में लिखा जाता है तो इनका रूपांतरण आकलन के उद्देश्यों के रूप में हो जाता है। आकलन के उद्देश्य अधिगम के उद्देश्यों का विशिष्टीकरण करते हैं तथा उन्हें मापन या परीक्षण के योग्य बनाते हैं ताकी विद्यार्थियों के अधिगम उपलब्धि का आकलन किया जा सके। ये शिक्षण गतिविधियों को निर्देशित करते हैं, शिक्षण को अधिगम से जोड़ते हैं तथा अधिगम अनुभवों को अधिगम परिणामों में समावेशित करते हैं।
बी. एस. ब्लूम ने पाठ्य-वस्तु केंद्रित उपलब्धि परीक्षण के स्थान पर उद्देश्य केंद्रित उपलब्धि परीक्षण के उपयोग पर बल दिया। परीक्षण का प्रत्येक प्रश्न एक विशिष्ट अधिगम या आकलन के उद्देश्य का मूल्यांकन करना चाहिए। उन्होनें अधिगम उद्देश्यों को व्यावहारिक पक्ष में लिखने का प्रयास किया है।
कार्य सूचक क्रिया (Action Verbs) का उपयोग कर अधिगम उद्देश्यों को व्यावहारिक पक्ष में लिखा जा सकता है। इसके अंतर्गत कार्य सूचक क्रिया को पाठ्य-वस्तु के किसी तत्व से जोड़ा जाता है।
ज्ञान (knowledge)- संज्ञाओं की अवधारणा, नियम, तत्त्व, सिद्धांत, घटना आदि को अपनी स्मरण क्षमता के आधार पर याद करना, ज्ञान स्तर का अध्ययन है। यह सूचना का संकलन, संग्रहण तथा स्मरण इन प्रक्रियाओं से संबंधित है। इस स्तर के अध्ययन से अध्ययनकर्ता केवल क्या है?' इसी प्रश्न का उत्तर दे सकता है। वह 'क्यों है'; 'कैसा है? आदि प्रश्नों का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता।
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इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए अगला उद्देश्य प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
कार्य सूचक क्रियाएँ: परिभाषित करना, सूचीबद्ध करना, नामित करना, लिखना, प्रत्यास्मरण करना, पहचानना आदि।
अवबोध (Understanding)- यदि विद्यार्थी को प्राप्त किए गए ज्ञान का अवबोध हो जाए तो उसमें अर्थ निर्वचन ( interpretation) एवं स्पष्टीकरण (explanation) करने की क्षमता का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए किसी एक विशिष्ट व्यक्ति को ही पिता कहना चाहिए, किसी विशिष्ट व्यक्ति को ही चाचा, मामा, भाई बहन आदि कहना चाहिए, इन सब रिश्ते नातों को बच्चा दो साल के अंदर ही याद कर लेता है। यह उसका ज्ञानात्मक स्तर का अध्ययन होता है। परंतु बच्चा ये नहीं समझ सकता कि किसी व्यक्ति को ही चाचा, मामा, भाई, बहन, क्यों कहना चाहिए? और न ही वह चाचा, मामा...... आदि में परस्पर क्या रिश्ता होता है? और क्यों होता है? इन बातों को समझ सकता है। इसका अर्थ यह होता है कि उसका केवल ज्ञानात्मक स्तर का ही अध्ययन हुआ है; स्पष्टीकरण स्तर का नही। परंतु जब वही बालक उक्त सभी प्रश्नों का उत्तर दे सकेगा तथा उनका अर्थ निर्वचन कर पायेगा कि यह विशिष्ट व्यक्ति मेरा मामा ही क्यों है? चाचा ही क्यों है? तथा चाचा और मामा का आपस में क्या रिश्ता है?
तभी उन सब रिश्ते नातों की अवधारणाएँ उसे समझ में आयेगी और वह उन सब प्रश्नों का उत्तर दे पायेगा, उनका स्पष्टीकरण कर पायेगा। इस स्तर के अध्ययन को अवबोध या विवेचन स्तर का अध्ययन भी कहा जाता है।
किसी विषय के नियम, तत्व, सिद्धांत, परिभाषा को याद करने के साथ-साथ उनका अर्थ स्पष्ट करना, उनकी अवधारणाएँ स्पष्ट करना, नियमों का स्पष्टीकरण करना आदि क्षमताओं को विकसित करना अवबोध स्तर का अध्ययन होता है। इससे विद्यार्थी में अवधारणाओं का अर्थ निर्वचन करने की तथा उनका वर्णन करने की क्षमता विकसित होती है। कार्य सूचक क्रियाएँ: स्पष्टीकरण करना, चयन करना, इंगित करना, उद्धृत करना, प्रतिनिधित्व करना, वर्णन करना, व्याख्या करना, वर्गीकरण करना आदि।
उपयोजन (Application)- उपयोजन स्तर के अध्ययन को अनुप्रयोग स्तर का अध्ययन भी कहते है।
प्राप्त ज्ञान का अवबोध होने के बाद ही उसके अनुरूप व्यक्ति अपने जीवन में प्रत्यक्ष व्यवहार तथा कार्य करता है। उदाहरण के लिए ड्राइविंग का पाठ्यक्रम कक्षा में खूब पढाया गया तथा परीक्षा लेने के बाद विद्यार्थी को सौ प्रतिशत अंक मिले तो भी वह प्रत्यक्ष रूप में गाड़ी नहीं चला सकता क्योंकि उसका ज्ञान और अवबोध स्तर का ही अध्ययन हुआ है, उपयोजन स्तर का नहीं। मूर्त एवं अमूर्त अवधारणाओं का अवबोध होने के बाद ही अध्ययनकर्ता भली-भांती जानता है, समझता है तथा आवश्यकता पड़ने पर प्राप्त ज्ञान का सही ढंग से उपयोग करता है और किसी समस्या का समाधान करता है।
कार्य सूचक क्रियाएँ: आकलन करना, वर्णन करना, पता लगाना, प्रदर्शित करना, निर्माण करना, गणना करना आदि।
संभावित आकलन प्रश्नः भोजन निर्माण में पत्ते में मौजूद क्लोरोफिल की उपयोगिता प्रयोग द्वारा दिखाए। विश्लेषण (Analysis) - अध्ययन कर्ता प्राप्त ज्ञान, सूचना अथवा घटनाओं का विभिन्न भागों मे वर्गीकृत कर उसके घटकों या उपघटकों का विश्लेषण करता है।
वर्गीकृत घटकों या उपघटकों का परस्पर संबंध तथा उनके एक दूसरे पर होने वाले परिणामों का विवेचन करता है। उनमें समानता क्या है? भिन्नता क्या है? यह जानता है और उसे अच्छी तरह से समझता है तथा उसके अनुसार ही निर्णय लेता है।
कार्य सूचक क्रियाएँ: विश्लेषण करना, निष्कर्ष निकालना, तुलना करना, आलोचना करना, पुष्टि करना, विभाजन करना, अलग करना आदि।
संश्लेषण (Synthesis)- विभिन्न तत्वों, भागों या घटकों में समानता या भिन्नता समझते हुए उन्हें संकलित करना तथा उनको सम्पूर्णता का रूप देना संश्लेषण प्रक्रिया होती है। दिए गए मुद्दों से कहानी लिखना, निबंध लिखना, कविता लिखना अथवा किसी योजना का प्रारूप तैयार करना संश्लेषण प्रक्रिया के अंतर्गत आता है। मूर्त या अमूर्त अवधारणाओं को सुसंगत अनुक्रम में संकलित करना, उसकी विवेचना करना तथा उसे सम्पूर्ण रूप मे प्रस्तुत करना संश्लेषण प्रक्रिया में अपेक्षित है।
कार्य सूचक क्रियाएँ: संक्षेपण करना, विमर्श करना, तर्क करना, संगठन करना, सारांश निकालना, सामान्यीकरण करना, पूर्व कथन करना, व्यवस्थित करना आदि।
मूल्यांकन (Evaluation)- यह संज्ञानात्मक क्षेत्र के अध्ययन की उच्चतम सीमा है। मनुष्य की मूल प्रवृत्ति मूल्यांकन से जुड़ी हुई होती है। मनुष्य की निर्णय क्षमता मूल्यांकन क्षमता पर ही निर्भर होती है। इसमें आतंरिक एवं बाह्य कसौटियों के आधार पर कुछ विशेष मुद्दों पर निर्णय लिए जाते हैं तथा उनकी अर्हता या मूल्य का पता लगाया जाता है। कार्य सूचक क्रियाएँ: निर्णय लेना, मूल्यांकन करना, निर्धारित करना, आलोचना करना, समर्थन करना, बचाव करना, चयन करना आदि।
2) भावात्मक क्षेत्र ( Affective Domain):
भावात्मक क्षेत्र के उद्देश्य व्यक्ति की रुचियों, आकर्षण तथा रागात्मक सम्बन्धों से जुड़े होते हैं। इसके अंतर्गत अधिगम उद्देश्यों को निम्नलिखित पांच वर्गों में बांटा जाता है।
अवधान (Attending and Receiving)- इसके अंतर्गत ध्यान देना, तत्परता एवं नियंत्रित तथा चयनात्मक अवधान की क्रियाएँ प्रकट होती हैं।
अनुक्रिया (Responding)- विद्यार्थी अध्ययन प्रक्रिया में सहभागिता करता है। उसमें जिज्ञासा का निर्माण होता है। वह पूछे गए प्रश्न का उत्तर देने में तत्परता दिखाता है। मूल्यनिर्णय (Valuing)- इसमें विद्यार्थी किसी मूल्य के लिए स्वीकृति, लगाव तथा अपनत्व का भाव प्रकट करता है।
किस विषय में आगे बढ़ना है और किसे छोड़ देना है, इसका निर्णय इसी मूल्य के आधार पर लिया जाता है। इस प्रक्रिया को मूल्य ग्रहण करना भी कह सकते हैं।
संगठन (Organisation)- मूल्य ग्रहण प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद मूल्यों का संकलन एवं संगठन करने की प्रक्रिया शुरू होती है। इस प्रक्रिया में कई मूल्यों के योग से व्यक्ति मूल्य प्रणाली को धारण कर उसे अपने व्यवहार में गठित कर लेता है।
इस मूल्य प्रणाली पर व्यक्ति की अभिवृति निर्भर करती है। इससे व्यक्ति का एक विशिष्ट दृष्टिकोण बनता है।
चरित्र निरूपण (Characterization) - विभिन्न मूल्यों का व्यक्ति के मन मे आतंरिक संगठन होते समय व्यक्ति किसी एक निर्णय पर अपना ध्यान केंद्रित करता है। इस स्तर पर व्यक्ति पूर्ण रूप से मूल्यों को ग्रहण कर चुका होता है। इन स्वीकृत मूल्यों के अनुरूप ही उसका व्यवहार नियंत्रित होता है। वही उसके जीवन का आदर्श बनता है। भिन्न भिन्न परिस्थितियों मे उसका व्यवहार इन मूल्य समूहों से (value complex) नियंत्रित होने लगता है। यह उसके व्यक्तित्व की पहचान बनती है।
3. क्रियात्मक क्षेत्र ( Psychomotor Domain)
क्रियात्मक क्षेत्र के उद्देश्य मांसपेशियों के प्रयोग एवं विकास से संबंधित हैं। इसके अंतर्गत अधिगम उद्देश्यों को निम्नलिखित पांच वर्गों में बांटा जाता है।
प्रत्यक्षीकरण (Perception)- इसमें व्यक्ति पूरी स्थिति को समझकर गतिवाही क्रिया उत्पन्न करता है। तत्परता (Set)- इसमें व्यक्ति प्रारंभिक समायोजन (Preparatory Adjustment ) करता है । निर्देशित अनुक्रिया ( Guided Response)- इसमें व्यक्ति किसी के निर्देशन में बाह्य रूप से क्रिया उत्पन्न करता है। रचना तंत्र (Mechanism)- इसमें व्यक्ति विश्वासपूर्वक स्वयं क्रिया उत्पन्न कर लेता है। जटिल बाह्य अनुक्रिया (Complex Overt Response)- इसमें व्यक्ति अपेक्षित गति के साथ क्रिया उत्पन्न कर लेता है।
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