रवीन्द्रनाथ टैगोर - Rabindranath tagore

रवीन्द्रनाथ टैगोर - Rabindranath tagore


जीवन परिचय


महान विचारक, प्रतिभाशाली कवि, अप्रतिम साहित्यकार तथा गुग प्रवर्तक शिक्षा शास्त्री गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 6 मई 1861 ई. को कलकत्ता महानगरी में हुआ था। पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर महान विद्वान, गंभीर चितक, निर्भीक समाज सुधारक तथा कठोर साधक थे। गुरुदेव का बचपन सादगी में बीता।


सन् 1901 ई. में उन्होंने शातिनिकेतन की स्थापना करके शिक्षा जगत में एक नवीन क्रान्ति का सूत्रपात किया। आम के पेड़ों की सघन छाया में स्थित शान्ति निकेतन आज भी प्राचीन गुरुकुलों की याद दिलाता है। यहीं उन्होंने शिक्षा संबंधी अनेक प्रयोग किए तथा अपनी कल्पना को साकार रूप देने का सफल एवं ठोस प्रयत्न किया।

आगे चलकर सन 1918 ई. में उन्होंने विश्व भारती की स्थापना की। विश्वभारती विश्वविद्यालय है और इसमें उच्च शिक्षा की विशेष व्यवस्था है। इस विश्वविद्यालय में संसार के बिभिन्न राष्ट्रों, भाषाओं एवं संस्कृतियों से सम्बद्ध लोग पारिवारिक सदस्य की तरह रह कर शिक्षा प्राप्त करते हैं। 


टैगोर का शिक्षा दर्शन तथा उसकी मुख्य विशेषताएँ (Tagore's Philosophy of Education and its Characteristics) 


प्रायः टैगोर के प्रकृतिवादी दर्शन को बहुत महत्व दिया जाता है। यद्यपि उनके प्रकृतिवादी दर्शन में लगभग सभी दर्शनों के कुछ तत्व समाए हुए ही शिक्षा का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें टैगोर के प्रकृतिबाद की छाप न पड़ी हो यहाँ पर उनके विचारों को संक्षेप में दर्शाया गया है।


• शिक्षा का अर्थ (Meaning of Education)- टैगोर प्रकृतिवादी थे। किन्तु उनका प्रकृतिवाद रूसो के प्रकृतिबाद से भिन्न था। रूसो ने समाज को सभी बुराईयों की जड मानकर समाज और सामाजिक जीवन का घोर विरोध किया था। किन्तु टैगोर के हृदय में समाज के प्रति प्रेम व दया का भाव था। वे समाज का उन्नयन करना चाहते थे और प्राचीन भारत की आत्मा को आधुनिक भारत की आत्मा में देखना चाहते थे। वे समाज को प्राकृतिक नियमों पर आधारित तो करना चाहते थे किन्तु आधुनिक वैज्ञानिकता एवं अतीत की धार्मिक्ता एवं नैतिकता से विहीन समाज को अच्छा नहीं समझते थे।


• टैगोर के शिक्षा दर्शन में रहस्यवाद भी पर्याप्त मात्रा में मिलता है। किन्तु उनका यह रहस्यवाद स्वस्थ एवं सबल विस्तृत था जबकि फोबेल का रहस्यवाद केवल शैशव तक सीमित था। टैगोर ने रहस्यवाद को जीवन की यथार्थ भूमि पर स्थापित कर उसका बिस्तार किया शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसे प्राप्त करके बालक मनुष्य के रूप में विकसित हो, न कि केवल एक अच्छा लिपिक, कृषक आदि।


• टैगोर शिक्षा के क्षेत्र में आध्यात्मवादी थे। प्रायः प्रकृतिवाद आध्यात्मवाद का विरोध करता है। किन्तु टैगोर का प्रकृतिवाद एकांगी नहीं था, इसीलिए उनके प्रकृतिवाद की अनिवार्य परिणति आदर्शबाद में हुई और वे बच्चों में उदात्त भावनाओं को जागृत करके उन्हें आध्यात्मिक भूमि पर लाना चाहते थे। 


• आध्यात्मिकता की बात करके टैगोर ने भारत के अतीत का सम्मान किया है। टैगोर उच्च कोटि के मानवतावादी थे। मानव व्यक्तित्व की गरिमा में उनका विश्वास था। वे मानव जाति का उद्धार करना चाहते थे। उन्हें बड़ा दुःख था कि मानवीय मूल्यों का तिरस्कार हो रहा है और वर्तमान युग में मनुष्य का जीवन सस्ता होता जा रहा है। उनका विश्वास था कि यह दुनिया मूलस में मानवीय दुनिया है। वे मानते थे कि ईश्वर को भी वहीं पर खोजना चाहिए जहाँ पर किसान हल जोत रहा हो।


• टैगोर अंतर्राष्ट्रीय अवबोध के बहुत बड़े समर्थक थे और वे बच्चों में अंतर्राष्ट्रीय भावना को जागृत करना चाहते थे। वे अपने राष्ट्र से बहुत प्रेम करते थे और भारतीय राष्ट्र की परिस्थितियों को सुधारना चाहते थे। उनकी देश-भक्ति और उनका राष्ट्र-प्रेम अंतर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक नहीं था। वे समस्त विश्व को एक समझते थे और हमें इस योग्य बनाना चाहते थे कि हम विश्व नागरिकता के प्रति सम्मान का भाव रख सके।


1. शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Education)


• टैगोर ने अपने लेखों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से शिक्षा के उद्देश्यों की चर्चा की है। उन्होंने शिक्षा में हेरफेर नामक बंगला लेख में छात्रों के दुर्बल स्वस्थ्य पर चिन्ता प्रकट की है। वे स्वस्थ शरीर को बहुत महत्व देते थे। इस दृष्टि से उन्होंने शारीरिक विकास को शिक्षा के एक उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया है।


• उनके अनुसार शिक्षा का दूसरा उद्देश्य बौद्धिक विकास होना चाहिए। पुस्तकीय शिक्षा का वे विरोध करते दिखाई पड़ते हैं तथा स्वतंत्र चिन्तन का समर्थन करते हैं। स्मृति पर अधिक भार न डालकर चिन्तन एवं कल्पना की शक्तियों का विकास आवश्यक है।


• शिक्षा समस्या में वे सच्चे अनुशासन का विश्लेषण करते हुए व्यक्ति के नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास पर बल देते हैं। वे युवकों को तपस्या एवं दृढ़ भक्ति की भावना का विकास करने का परामर्श देते हैं। इस प्रकार की भावना तभी सम्भव है जबकि व्यक्ति आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास करे और अपनी आत्मा को सभी प्रकार की दासता से मुक्त करो इस प्रकार टैगोर आध्यात्मिक विकास के लिए गुलामी को समाप्त करना बहुत आवश्यक समझते थे।


• टैगोर एक उच्च कोटि के अंतर्राष्ट्रीयतावादी थे। उन्होंने पूरब और पश्चिम का अभूतपूर्व समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया। उनके द्वारा स्थापित विश्व-भारती सच्चे अर्थ में विश्व भारती है। इस दृष्टि से वे शिक्षा द्वारा बच्चों में अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास करने में रुचि लेते हुए दिखाई पड़ते हैं।


2. प्रकृति की गोद में शिक्षा (Education in the lap of Nature) बच्चों की शिक्षा नगरों से दूर प्राकृतिक वातावरण में हो।


• बालक का पूर्ण मानव के रूप में विकास शिक्षा ऐसी होना चाहिए जिसे प्राप्त करके बच्चा एक सम्पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित हो, न कि केवल एक अच्छा लिपिक कृषक आदि।


• बालक की कलात्मक शक्तियों का विकास बच्चों को संगीत, चित्रकला आदि की शिक्षा दी जानी चाहिए।


• राष्ट्रीय शिक्षा का जीवन से सम्बन्ध प्रत्येक बच्चे को शिक्षा के द्वारा भारतीय समाज की पृष्ठभूमि तथा भारतीय संस्कृति का ज्ञान कराया जाना चाहिए।


3. प्रेरणादायक शिक्षण विधियाँ


• प्रत्यक्ष स्रोतों से ज्ञान पुस्तकों के स्थान पर जहाँ तक सम्भव हो प्रत्यक्ष स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करने के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।


• स्वतंत्र प्रयास द्वारा शिक्षा बालक को इस प्रकार के अवसर प्रदान किए जाएँ कि वह स्वतंत्र प्रयास द्वारा शिक्षा प्राप्त कर सके।


• रटने की आदत का अन्त बालक को रटने के लिए बाध्य न किया जाए।


• बालक की रचनात्मक प्रवृत्तियों का विकास बालक को इस प्रकार के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए कि वह अपनी रचनात्मक प्रबत्तियों का विकास कर सके।


• सामाजिक सेवा के अवसर बालक को सामाजिक सेवा के अवसर मिलने चाहिए ताकि उसमें स्वशासन तथा उत्तरदायित्व के भावों का विकास हो सके।


4. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा टैगोर शिक्षा को प्रभावकारी, स्थायी और वास्तविक बानाने के लिए मातृभाषा को उसका माध्यम बनाना अत्यावश्यक मानते थे। मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान कर के ही हम बच्चों में स्वतंत्र विवेचन, स्पष्ट भावग्रहण एवं प्रकाशन तथा स् जनात्मक चिन्तन का विकास कर सकते हैं। मातृभाषा द्वारा शिक्षा प्रदान कर हम छात्रों में स्वसंस्कृति के प्रति प्रेम तथा राष्ट्रीय चेतना का उदय कर सकते है।


5. आंतरिक एवं स्व अनुशासन गुरुदेव दंडनिष्ठ अनुशासन के पक्षपाती नहीं थे, बल्कि वे उसके कट्टर विरोधी थे। वे स्व अनुशासन के लिए सहानुभूतिपूर्ण एवं प्रेरक नियन्त्रण को आवश्यक मानते थे।

इसलिए उन्होंने शिक्षक तथा छात्र दोनों को साथ रहने की व्यवस्था दी। चरित्रवान, ममतावान, एवं योग्य शिक्षक के सम्पर्क में रहने से बच्चों में स्वतः ही अनुशासन एवं सदाचरण के गुण विकसित होते हैं। ऐसे अनुशासन में विस्फोट अथवा विरोध के तत्व उदित नहीं होते और स्वतंत्र एवं सहानुभूति पूर्ण अनुशासित तथा योग्य मानव का स्वाभाविक विकास होता है।


6. पाठ्यक्रम (Curriculum) टैगोर ने शिक्षा के मुख्य उद्देश्य को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम में विभिन्न प्रकार के विषयों और क्रियाओं को व्यापक रूप प्रदान किया है। पाठ्यक्रम के मुख्य विषय और क्रियाएँ इस प्रकार हैं विषय: इतिहास, विज्ञान, प्रकृति अध्ययन, भूगोल साहित्य आदि क्रियाएँ: नाटक, भ्रमण, बागवानी, क्षेत्रीय अध्ययन, प्रयोगशाला कार्य, ड्राइंग, मौलिक रचना, अजायबघर के लिए विभिन्न वस्तुओं का संग्रह आदि।


7. अतिरिक्त पाठ्यक्रम व क्रियाएँ: खेलकूद, समाजसेवा, छात्र-स्वशासन आदि । शिल्प हस्तकला, बुनाई रगाई, कागज बनाना, कलाई आदि ।


8. स्त्री शिक्षा: टैगोर संकुचित विचार के शिक्षाशास्त्री नहीं थे। वे बालक तथा बालिकाओं की सहशिक्षा को उनके स्वभाविक विकास के लिए आवश्यक मानते थे। इसीलिए विश्व-भारती में उन्होंने सहशिक्षा की व्यवस्था की। उन्होंने भारतीय शिक्षा को एकांगी पाया और भारतीय समाज के सम्यक विकास के लिए स्त्री शिक्षा को परमार्थक बताया। शान्ति निकेतन में बालिकाओं के लिए विद्यालय की भी व्यवस्था की प्रौढ़ शिक्षा के लिए उन्होंने नियमित पाठशालाओं को चलाने की व्यवस्था की। इस प्रकार गुरुदेव की शिक्षा दृष्टि अत्यन्त ही पैनी तथा विस्तृत थी।