धुर नारीवादी (रेडिकल) - Radical Feminist

धुर नारीवादी (रेडिकल) - Radical Feminist


रेडिकल नारीवादी विचारधारा


कोई भी विषय सदैव उसी रूप में नहीं रहता। उसकी अंतर्वस्तु में निरंतर बहुत-सी चीजें घटती-बढ़ती रहती हैं। विषय को लेकर कई विचारधाराएं जन्म लेती रही हैं। एक ही समय में एक ही विषय पर विद्वानों के विचारों में मतभेद होते हैं। इस तरह एक ही विषय पर विचारधारएं भी भिन्न-भिन्न प्रकार की हो जाती हैं। नारीवादी विचारधारा के साथ भी ऐसा ही हुआ है। यही चिंतन और विचारधारा की प्रवृत्ति होती है। •रेडिकल नारीवादी विचारधारा स्त्री देह को लेकर जो विभिन्न प्रकार से शोषण का शिकार बनती है, उसका विरोध करती है, जैसे बलात्कार, वेश्यावृत्ति आदि। सीमा दास रेडिकल नारीवाद का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखती हैं "दरसल रेडिकल नारीवाद' में निहित 'रेडिकल' शब्द का यह अर्थ 'अतिवादी' या 'हठधर्मी' कतई नहीं है। इसकी उत्पत्ति 'जड़' के लिए लेटिन शब्द से हुई है।

रेडिकल नारीवादी सिद्धांत में पुरूष द्वारा महिलाओं के उत्पीड़न को समाज में व्याप्त सब प्रकार के सत्ता-संबंधों की गैरबराबरी की जड़ में देखा जाता है । रेडिकल नारीवादियों के हिसाब से महिलाओं की यौनिकता और प्रजनन की क्षमता दोनों महिलाओं की शक्ति और उनके उत्पीड़न की जड़ में होते हैं।" इस सिद्धांत के पक्षधर और पेरोकार लिंग के किसी भी प्रकार के दोहन और उत्पीड़न के विरूद्ध खड़े होते हैं। दूसरी ओर इस सिद्धांत में भी स्त्री को अनेक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता है। इसलिए एक लंबे समय तक स्त्री को सत्ता में भागीदारी से वंचित रखा गया। जैविक धारणाओं का, जो स्त्री- पुरूष को दो श्रेणियों में विभाजित करता है, रेडिकल नारीवादी विरोध करते हैं। यही कारण है कि अमेरिका और ब्रिटेन मे लिंगभेद के विरूद्ध आवाज बुलन्द की गई। ऐसे संगठनों की स्थापना की जाने लगी, जो पुरुषवादी सत्ता का विरोध करते थे। रेडिकल विचारधारा के अनुयायी किसी ठोस सिद्धांत को लेकर नहीं चल रहे थे, पर ये नारीवादी जमीनी आन्दोलनों से जुड़े थे। 


यदि रेडिकल नारीवादी विचारधारा का विश्लेषण किया जाए तो निम्नलिखित बिंदुसामने आते हैं -


1. नारीवादी विचारधारा के पक्षधर यौन उत्पीड़न का विरोध करते हैं।


2. नारी देह सौंदर्य मात्र ही नहीं है।


3. यह विचारधारा पुरूष से नहीं बल्कि पितृसत्तात्मक वर्चस्व के प्रति विरोध दर्ज करती है।


4. विभिन्न संस्थाओं के सरंचनात्मक ढाँचे में बदलाव किया जाना चाहिए, जैसे आर्थिक सामाजिक, राजनीतिक एवं वैधानिक । इनमें इस रूप में परिवर्तन किया जाए, जिससे स्त्री को समान रूप से अधिकार प्राप्त हो सकें।


5. लिंग भेद के आधार पर स्त्री और पुरूष के मध्य किसी प्रकार की लक्ष्मण रेखा नहीं खींची जाए। 6. जैविक सिद्धांत का इन्होंने खंडन किया।


7. मातृशक्ति के रूप में नारी के प्रदर्शन को यह सही नहीं मानती मातृशक्ति की अवधारणा को धार्मिक जामा पहनाकर उसे बहुत से सामाजिक कार्यों से पृथक कर आदर्शों का लबादा ओढ़ाया जाता है, जो नारी प्रगति में बाधक है।


8. लिंग भेद की सोच और मानसिकता स्त्री की जीवनशैली और कार्यशैली को पृथक ढंग से गढ़ते हैं, जिससे उनकी पहचान अलग ढंग से हो जाती है। इस प्रकार के भेद समाप्त हों। 


9. नारी जन्म से नारी नहीं होती, बल्कि उसे समाज बनाता है। इसलिए समाज की सोच में बदलाव लाना है।


10. उन्हें मातृत्व प्राप्त करने हेतु विवश न किया जाए।


11. नारी मात्र यौन संतुष्टिका न तो साधन है और न वस्तु


12. वे अपने व्यक्तित्व का निमार्ण स्वतः करने के पक्ष में हैं, जिसमें पुरूषों का किसी तरह का हस्तक्षेप न हो।


13. नारीवादी विचारधारा के समर्थक उस पुरुष प्रधान संस्कृति का विरोध करते हैं जिसे उन्होंने उपने स्वार्थों को ध्यान में रखकर गढ़ा है।


वास्तव मे सन् 1949 में सिमोन द बोउआर की 'सेकन्ड सेक्स' प्रकाशित होने पर नारी जगत को संघर्ष करने की एक नई रोशनी दिखाई पड़ी।

आरंभ में वे नारीवादी नहीं थीं लेकिन कालांतर में वे नारीवादी बन गई । सिमोन उन बातों पर जोर देती हैं जो नारी को नारी बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है, जैसे गैर महत्वपूर्ण कार्य स्त्रियों से कराए जाते हैं। इस तरह व्यावसायिक और सरकारी कामों में भी स्त्री पुरूष के समकक्ष नहीं हैं। इसीलिए वे इन सभी चीजों की आलोचना करती हैं और विरोध दर्ज करती हैं कि स्त्री पुरूषों के मध्य दोहरे मापदण्ड क्यों हैं? वे इस बात पर जोर देती हैं कि स्त्री की मुक्ति का मार्ग स्वयं स्त्री बनाएगी और इसके लिए उसे स्वयं संघर्ष करना होगा। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है, "स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।" वास्तव में नारीवादी विचारधारा ने उन समस्त चीजों का पर्दाफाश किया, जिनके द्वारा पुरूष स्त्री पर अनादिकाल से एकाधिकार जमाए हुए थे। उनके देह सौंदर्य पर नियंत्रण बनाए हुए है। नारीवादी विचारधारा के समर्थक जैविक निर्णयवाद के पक्षधर हैं। इस आधार पर इनके सिद्धांत की कटु आलोचना की जाती है । इस तरह एलेन म्योर और इलने शोवाल्टर ने स्त्रियों की साहित्यिक अभिव्यक्तियों एवं उपसंस्कृतियों को एक प्रगतिशील परंपरा के रूप में स्थापित किया । उपसंस्कृति के प्रगतिशील प्रस्तुतीकरण ने नारी समाज की एक ऊर्जायुक्त चेतना को प्रोत्साहित किया, जिससे वे अपने अस्तित्व एवं अस्मिता का संघर्ष कर सकें । इस तरह नारीवादी विचारधारा ने एक ठोस स्वरूप धारण किया।