परामर्श में हाल की प्रवृत्तियाँ - Recent Trends in Consulting

परामर्श में हाल की प्रवृत्तियाँ - Recent Trends in Consulting

परामर्श की प्रक्रिया की प्रकृति को देखते हुए तथा परामर्शदाता की भूमिका को देखते हुए परामर्श-साहित्य में परामर्श की तीन प्रमुख विचारधाराएँ हैं जो कि निम्नलिखित हैं-


1. निर्देशीय या परामर्शदाता केन्द्रित या नियोजक परामर्श: परामर्शदाता केन्द्रित परामर्श परामर्शदाता के इर्दगिर्द घूमता है। वह मैत्री और सहायता द्वारा मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करता है । इसमें परामर्शदाता बहुत सक्रिय होता है और वह प्रायः अपने स्वयं के दृष्टिकोण और भावनाएँ स्वतंत्र रूप से प्रकट करता रहता है। वह सेवार्थी की अभिव्यक्तियों का मूल्यांकन करता है। इस विचारधारा के अनुसार परामर्श साक्षात्कार का नेतृत्व करता है। इसमें परामर्शदाता प्रायः प्रमापीकृत प्रश्नों की एक श्रृंखला पूछता है तथा प्रत्येक का संक्षिप्त उत्तर हो सकता है। परामर्शदाता सेवार्थी की अभिव्यक्ति और भावनाओं के विकास की आज्ञा नहीं देता है एक विशेषज्ञ के तौर पर वह नेतृत्व करता है, मूल्यांकन करता है और सुझाव या सलाह देता है।


इस विचारधारा के मुख्य प्रवर्तक मिन्नेसोटा विश्वविद्यालय के ई. जी. विलियमसन हैं इस प्रकार इस विचारधारा के अंतर्गत परामर्शदाता सेवार्थी की समस्या को हल करने का मुख्य उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है। इस प्रक्रिया में परामर्शदाता समस्या की खोज और उसे परिभाषित करता है, निदान करता है तथा समस्या के उपचार के बारे में सब कुछ स्वयं ही बताता है।


2. अनिर्देशीय परामर्श या सेवार्थी केन्द्रित या अनुमत परामर्श: अनिर्देशीय परामर्श या सेवार्थी केन्द्रित या अनुमत परामर्श के मुख्य प्रवक्ता कार्ल. आर. रोजर्स हैं। इस सिद्धांत का विकास बहुत वर्षों में हुआ । इसलिए इस प्रकार के परामर्श में कई क्षेत्र शामिल होते रहे जैसे- व्यक्तित्व का विकास, सामूहिक नेतृत्व, शिक्षा एवं अधिगम, सृजनात्मकता, पारस्परिक सम्बन्ध तथा पूर्ण रूप से क्रियाशील व्यक्ति की प्रकृति।

इस सिद्धांत का विकास 1930 और 1940 के बीच हुआ। इस सिद्धांत का विश्वास है कि व्यक्ति के अन्दर ही उसकी स्वयं की समस्या को सुलझाने के पर्याप्त साधन मौजूद होते हैं। परामर्शदाता का कार्य तो केवल इतना ही है कि वह ऐसा वातावरण प्रदान करे जिसमें सेवार्थी वृद्धि के लिए स्वंतत्र हो ताकि वह जैसा चाहे, वैसा ही व्यक्ति बन सके। यह विचारधारा व्यावसायिक और शैक्षिक समस्याओं के संवेगात्मक पक्षों को महत्व देती है और परामर्श-प्रक्रिया के हिस्से के रूप में निदानात्मक सूचना को अस्वीकार करती है।


सेवार्थी केन्द्रित परामर्श सेवार्थी के इर्द-गिर्द घूमता है। इसमें सेवार्थी को वार्तालाप में नेतृत्व करने के लिए और स्वयं के दृष्टिकोणों, भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। परामर्शदाता अधिकतर निष्क्रिय ही रहता है । वह सेवार्थी के विचारों,

भावों, भावनाओं और अभिव्यक्तियों के धाराप्रवाह में हस्तक्षेप नहीं डालता है। परामर्शदाता सेवार्थी की बातचीत करने में पूरी सहायता करता है। बुनियादी तौर पर परामर्शदाता मधुर सम्बन्ध स्थापित करके दोनों पक्षों में पारस्परिक विश्वास की भावना उत्पन्न करने का ही प्रयास करता है। इस विचारधारा या उपागम में मुक्त-अंत प्रश्न ही पूछे जाते हैं। ये प्रश्न पूर्ण रूप से रचित नहीं होते हैं। इन प्रश्नों के उत्तरों में व्यक्ति स्वयं के व्यक्तित्व का प्रक्षेपीकरण कर देता है। परामर्शदाता का अधिकतर सम्बन्ध सेवार्थी द्वारा बताई गई संवेगात्मक विषय वस्तु के संक्षेपीकरण से होता है। जब सेवार्थी उत्तर दे रहा होता है तब परामर्शदाता उपयुक्त तरीकों से उसे के इस बात के लिए प्रोत्साहित करता है जिससे वह विस्तार से बोल सके। जिस प्रकार के प्रश्न परामर्शदाता सेवार्थी से पूछता है उससे सेवार्थी यह महसूस करने लगता है कि परामर्शदाता वास्तव में ही व्यक्तिगत तौर पर सेवार्थी के विचारों का सम्मान करता है और साक्षात्कारकर्ता सेवार्थी में रूचि ले रहा है। परामर्शदाता मात्र तथ्यों की खोज के लिए ही प्रश्न नहीं पूछता है।

अनिर्देशीय परामर्श के लिए विशेषज्ञ प्रत्येक व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से स्वतंत्र होने का अधिकार देते हैं। इस प्रकार के परामर्श में निदानात्मक यंत्रों का या तो बहुत ही कम प्रयोग होता है या फिर होता ही नहीं है। यह परामर्श वृद्धि अनुभव है। इसमें सेवार्थी अपनी बुद्धि या समझ से कार्य कर सकता है। इसमें बौद्धिक पक्षों की अपेक्षा संवेगात्मक या भावात्मक पक्षों पर बल दिया जाता है।


3. समन्वित परामर्श या संकलक परामर्श या समाहारक परामर्श: कई बार कई परामर्शदाता न तो निर्देशीय परामर्श की विचारधारा से सहमत होते हैं और न ही अनिर्देशीय परामर्श की विचारधारा से। ऐसी परिस्थिति में परामर्शदाता एक अन्य प्रकार के परामर्श का विकास करने में सफल हुए। यह विचारधारा निर्देशीय और अनिर्देशीय परामर्श की विचारधाराओं के मध्य का परामर्श है। इसी मध्य के परामर्श की विचारधारा को ही 'समवित परामर्श' या 'समहारक परामर्श' या 'संकलक परामर्श' कहा जाता है।


इस प्रकार के परामर्श में परामर्शदाता न तो अधिक सक्रिय होता है और न ही अधिक निष्क्रिय होता है। इस प्रकार के परामर्श के मुख्य प्रवर्तक हैं- एफ़.सी. थोर्न । इस प्रकार के परामर्श में व्यक्ति की आवश्यकताओं और उसके व्यक्तित्व का अध्ययन परामर्शदाता द्वारा ही किया जाता है। इसके पश्चात परामर्शदाता उन प्रविधियों का चयन करता है जो व्यक्ति के लिए अधिक उपयोगी या सहायक रहेगी। इस परामर्श प्रक्रिया में परामर्शदाता पहले निर्देशीय परामर्श विधि शुरू कर सकता है तथा कुछ समय बाद अनिर्देशीय परामर्श विधि का अनुसरण कर सकता है या इसके विपरीत- जैसा स्थिति चाहे । इससे प्रविधियाँ परिस्थिति और सेवार्थी के अनुसार होनी चाहिए। इस प्रकार के परामर्श में जो प्रविधियाँ प्रयोग की जाती हैं- वे हैं पुनः विश्वास, सूचना प्रदान करना, केस हिस्ट्री, परीक्षण आदि


इस प्रकार समन्वित परामर्श में दोनों, परामर्शदाता और सेवार्थी सक्रिय और सहयोगात्मक होते हैं। दोनों बारी-बारी से वार्तालाप करते हैं और संयुक्त रूप से समस्या का समाधान करते हैं।