जेंडर के संदर्भ में प्रच्छन्न पाठ्यक्रम, कक्षागत प्रक्रियाओं द्वारा जेंडररूढ़ियों का पुनर्बलन - Reinforcement of gender stereotypes through gender-disguised curriculum, classroom processes
जेंडर के संदर्भ में प्रच्छन्न पाठ्यक्रम, कक्षागत प्रक्रियाओं द्वारा जेंडररूढ़ियों का पुनर्बलन - Reinforcement of gender stereotypes through gender-disguised curriculum, classroom processes
विद्यालय प्रशासन विभिन्न विषयों के पाठ्क्रम को जेंडर समावेशी तो बताता है और यह दावा करने की कोशिश करता है कि इसकी पाठ्यवस्तु विद्यार्थियों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ी हुई है तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज में विद्यमान जेंडर अस्मिता चुनौतियों को सामने लाने का प्रयास करता है। किंतु, वास्तविकता बहुत हद तक इससे परे है। विभिन्न विषयों में प्रच्छन्न पाठ्यकम (हिडेन पाठ्यक्रम) यानि कक्षा का वातावरण, संस्कृति या अंतःक्रिया जेंडररुढ़ियों का पुनर्बलन करती प्रतीत होती है। शिक्षक द्वारा संचालित कक्षा प्रक्रियाएँ प्रायः जेंडर संवेदन शून्य होती हैं। जब कभी पाठ्यवस्तु से जेंडर विमर्शों को एकीकृत करने का अवसर होता है या आवश्यकता होती है, शिक्षक इन विमर्शों से पाठ्यवस्तु को दूर रखने का प्रयास करते नजर आते हैं। उनकी रुढ़िवादी मानसिकता उन्हें ऐसा करने से रोकती है ।
कक्षा प्रक्रियाओं द्वारा समाज की पुरुष सत्ता का प्रचार करना उनकी प्रच्छन्न कार्यसूची होती है। यदि जेंडर विमर्श विषय-वस्तु के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल भी होते हैं तो इन प्रकरणों का शिक्षण इस प्रकार किया जाता है कि बच्चे इनके प्रति उदासीन बने रहते हैं तथा उनमें इन विमर्शों की समीक्षा करने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल एवं अभिवृति का विकास नहीं हो पाता । इन विमर्शों के शिक्षण के लिए वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी, विचार-विमर्श, संघर्ष समाधान, भूमिका मंचन जैसे युक्तियाँ को व्यवहार में ही नहीं लाया जाता जो कक्षा को जेंडर संवेदनशील बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए यदि शिक्षक सामाजिक अध्ययन विषय में मानवाधिकारों के प्रसंग पर चर्चा करते हैं तो वे प्रायः महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा करते प्रतीत होते हैं या व्यापक रूप से इसे चर्चा का हिस्सा नहीं बनाते। उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण या व्याख्यान समाज में हो रहे स्त्रियों के अधिकारों के हनन का व्यापक रूप से चित्रण कर पाने में असमर्थ होते हैं। उनके कथन या प्रस्तुत तथ्य उनके प्रच्छन्न जेंडर रुढ़िवादी दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं।
अतः मानवाधिकार जैसे प्रसंग भी जेंडर समानता की चुनौती को कक्षा में समावेशित करने में असमर्थ हो जाते हैं। कक्षा में ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाता है जो जेंडर संवेदना शून्य होता है। शिक्षण युक्तियों के चयन तथा विषय वस्तु की प्रस्तुति में बालिकाओं की अभिरुचि तथा अभिक्षमता की अनदेखी की जाती है। उन्हें बालकों के समान अपनी समझ, जिज्ञासा, संशय तथा पृच्छा को अभिव्यक्त करने की स्वायत्तता नहीं होती। कई बार ऐसा होता है कि किसी प्रश्न का जवाब पूछे जाने पर बालकों द्वारा दिए गए जवाबों का पुनर्बलन किया जाता हैं किंतु बालिकाओं द्वारा दिए गए जवाबों की अनदेखी की जाती है। बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत व्याख्या या प्रदर्शन की समुचित प्रतिपुष्टि नहीं की जाती। कक्षा में किसी अधिगम गतिविधि का संचालन करते वक्त कार्य तथा पाठ्यवस्तु का विभाजन जेंडर के आधार पर किया जाता हैं।
समाज में विद्यमान जेंडररूढ़ियों के समान बालकों को किसी भी कक्षा गतिविधि में बालिकाओं से अधिक महत्त्व दिया जाता है । गतिविधि के नियोजन एवं रूपरेखा की तैयारी में बालकों की सहायता ली जाती है तथा बालिकाओं को अन्य सहायक कार्यों की जिम्मेदारी दी जाती है। यह बालकों में वर्चस्व का भाव पैदा करता है तथा बालिकाओं में दबकर कार्य करने की मनोवृति उत्पन्न करता है। कक्षा में बालकों के भावुक हो जाने या किसी प्रश्न का उत्तर देते वक्त भयभीत होने की स्थिति में उन्हें कई बार यह कह कर डाँटा जाता है कि क्या वे बालिकाएँ हैं जो उनके समान डर या रो रहे हैं। शिक्षकों का ऐसा व्यवहार बालिकाओं के मन में डर या हिचकिचाहट की प्रवृत्ति जो पारिवारिक या सामाजिक माहौल से ही बनी रहती है, उसका पुनर्बलन करता है ।
यदि कोई स्त्रीवादी विमर्श या बालिकाओं के सामाजिक अस्मिता से जुड़ी चुनौती कक्षा के समक्ष • खड़ी होती हैं तो वे बालिकाओं के प्रसंग को अनदेखा करने की कोशिश में लग जाते हैं, जिससे बच्चे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में स्त्रियों की बदलती भूमिका का अवबोध नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए जब 'समाज का बदलता आईना' जैसे प्रसंग कक्षा में पढ़ाए जाते हैं तो शिक्षक जानबूझ कर या अनजाने ही सही महिला वैज्ञानिकों, महिला शिक्षाविदों तथा महिला समाजिक कार्यकर्ताओं के प्रसंग को चर्चा का हिस्सा नहीं बनाते या अव्यापक रूप से इसे चर्चा में सम्मिलित किया जाता है जिससे बच्चों में जेंडर समानता के प्रति उदासीनता बनी रहती है। साथ-ही-साथ बालिकाओं द्वारा अपने रूढ़ीवादी समाजिक अस्मिता से परे जब कोई कार्य किया जाता है, तो यह कहकर उन्हें झिड़क दिया जाता है कि वे बालिकाएँ हैं तथा उन्हें ऐसा कार्य करना शोभा नहीं देता। उदाहरण के लिए- जब किसी कक्षा गतिवधि में प्रस्तुति की पहल बालिकाओं द्वारा करने का प्रयास किया जाता है तो कई बार शिक्षक उन्हें यह कहकर बैठा देते हैं कि पहले वे बालकों को समुचित रूप से देखें कि किस प्रकार प्रस्तुति की जानी चाहिए और उसके बाद अपनी प्रस्तुति दें। इस प्रकार वे समाज के रुढ़िवादी पुरुष सत्ता को पुनर्बलन करते नजर आते हैं। इस प्रकार कक्षा प्रक्रियाएँ जहाँ एक ओर समाज में स्त्रियों की बदलती भूमिका के प्रति बच्चों का ध्यान आकर्षित करने में असमर्थ हैं, वहीं दूसरी ओर वे समाज के जेंडररुढ़ियों का प्रबलन भी करती हैं।
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