मूल्यों के लिए शिक्षा की प्रासंगिकता - Relevance of Education to Values

मूल्यों के लिए शिक्षा की प्रासंगिकता - Relevance of Education to Values


मूल्यों का हमारे जीवन में अत्यधिक महत्व है। मूल्य की शिक्षा आज देश के सभी नागरिकों विशेषकर शिक्षकों के लिए विशेष चुनौतीपूर्ण बन गयी है। आधुनिकतावादी मानव ने एक और भौतिक क्षेत्र में बहुत प्रगति की है वहीं दूसरी और वह सम्पूर्ण मानवता को मिटाने पर तुला है। यह एक नकारात्मक प्रवृत्ति है। एक और जहाँ मनुष्य चाँद पर पहुँच गया है, वहीं दूसरी ओर जगजगह मानवता के विनाश के प्रयास किए जा रहे है।


सार्वजनिक जीवन में व्याप्त अष्टाचार की घटनाओं ने विश्व विकास की रिपोर्ट द्वारा प्रकाशित सूची में हमारे देश को विश्व में भ्रष्ट राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा कर दिया है। मूल्य संकट की इस घड़ी में सम्पूर्ण समाज का यह दायित्व हो जाता है किवह समाज की मदद हेतु आगे आए। शिक्षा ही वह साधन है जो बालक में अंतर्निहित शक्तियों को उभारकर पूर्ण विकसित करती है। यह वह ज्ञान है।

जो बालक की बुराइयों को दूर कर आंतरिक गुणों को जगमगा देता है जिसके प्रकाश में बालक स्वयं अपने व्यक्तित्व का मिण करता है। शिक्षा का यह भूमिकाबालक और समाज दोनों के लिए उपयोगी है।


शिक्षार्थी वह बीज है जो अपने अंदर समस्त मूल्यों के विकास की संभावना को समेटे हुए हैं और शिक्षा वह परिवेश है जो इस बीज को खाद-पानी देकर उसे विकसित होने का अवसर प्रदान करती है। इन दोनों के योगदान से ही मूल्यों की उत्पतिऔर विकास हो सकता है। शिक्षा समाज की वह सीढ़ी है जिस पर पाँव रखकर व्यक्ति अपने संस्कारों को संवारता है और शिक्षा को दिशा प्रदान करता है। महान व्यक्ति के जीवन के उद्देश्यों का प्रायः समाज के सभी व्यक्तियों द्वारा अनुकरण किया जाता है। शिक्षा, समाज तथा व्यक्ति, तीनों मिलकर यह निर्धारित करते हैं कि अमुक काल में व्यक्ति तथा समाज का कल्याण किन बातों पर ध्यान देने से संभव है।

स्वतंत्रता के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी व्यक्ति की नैतिक, आत्मिक एवं भावात्मक शक्तियों को विकसित करने हेतु उपयुक्त शिक्षा प्रक्रिया का क्रियान्वपन पूरी तरह संभव नहीं हो सका है। मूल्यसंकट के इस दौर में विघटनकारी तत्व आज पहले से कहीं अधिक सक्रिय है। युवा पीढ़ी विध्वसात्मक प्रवृत्तियों में जुटी दिखाई देती है। ऐसी शिक्षा के कारण ही वर्तमान समाज के मूल्य क्षम्भगुर हो गए हैं। यह शिक्षा प्रणाली मनुष्य में राग द्वेष, शोक उत्पन्न कर रही है। यही मूल्यों का हास होने का प्रमुख कारण है। शिक्षार्थी में चित विषय भावना नहीं अपितु पदार्थ बन गया है। यह शिक्षा न तो मनुष्य में आत्मनियंत्रण का विकास कर रही है न ही स्वाध्याय का विद्यार्थी अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहा है। यथार्थ तथा आदर्श में शिक्षा भेद करती है। अंततोगत्वा जब बालक यथार्थ को आदर्शों से भिन्न देखता है तो वह असहाय हो जाता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति और मूल्यों में कोई समन्वय नहीं है। भाषण, नोट्स तथा बने बनाये उत्तरों को दोहराने का कौशल ही शिक्षार्थी की परीक्षा का मापदण्ड है। शिक्षार्थी अपने अस्तित्व को न तो पहचान पाता है, न ही पुस्तकीय ज्ञान से उसकी कोई सहायता होती है। ये गिरते हुए मूल्य हमारी शिक्षा के लिए एक चुनौती है। हे शिक्षा में सुधार के द्वारा ही सुधारा जा सकता है।


वर्तमान शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसके माध्यम से बालक सत्य के आधार पर अहिंसा द्वारा प्रेमपूर्वक जीवन यापन करना सीखें। हमें ऐसा मनुष्य बनाना है जो स्वयं स्वेच्छा से शाश्वत मूल्यों के पालन का प्रयास करे जिससे व्यक्ति, समाज सभी का कल्याण संभव हो। इसके लिए शिक्षा द्वारा व्यक्ति की आत्मा कोजागृत करना आवश्यक है जिसके लिए आध्यात्म की आवश्यकता है। अतः शिक्षा में आध्यात्म को भी स्थान देना चाहिए। तभी मूल्यों का धारासायी वृक्ष पुनः खड़ा हो सकता है। अन्यथा आज की शिक्षा के स्तर को देखते हुए भारतीय संस्कृति के मूल्यों का संरक्षण बहुत ही दुष्कसतीत होता है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि जिससे प्रत्येक व्यक्ति यह समझे कि वह स्वयं क्या है? उसके कर्तव्य क्या है? उसे जीवन में किसे प्राथमिकता देनी है? निष्ठाओं का टकराव क्यों होता है? तभी वह अच्छे मूल्यों का विकास कर सकता है। इनका संबंध पाठ्यक्रम पाठ्यवस्तु एवं परीक्षा से भी जुड़ा हुआ है।


मूल्यपरक शिक्षा में शिक्षार्थी को अधिक से अधिक अनुभव से जोड़ना चाहिए तथा विद्यालय में विभिन्न महापुरुषों की जयन्ती तथा धार्मिक उत्सवी का भी आयोजन करना चाहिए।

विद्यालय में समय-समय पर भाषण, संगोष्ठी, निर्देशन, ट्यूटोरियल आदि को अपनाया जा सकता है। छात्रों में आपसी सहयोग एवं सद्भावनाके माध्यम से धर्मों के प्रति आदर की भावना के विकास के लिए अधिकाधिक अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। शिक्षक वैयक्तिक मूल्यपरक शिक्षण तभी दे सकता है जब उसमें स्वयं अच्छे मूल्य बिकसित होंगे। शिक्षक में यदि स्वयं ही अच्छे मूल्य होगे तो छात्र शिक्षक को उदाहरण के रूप में प्रेरणा बना सकता है। जिस प्रकार कहावत है कि उपदेश से उदाहरण श्रेष्ठ है इसी के आधार पर कह सकते हैं कि शिक्षक का स्वयं का आचरण भी ऐसा होना चाहिए कि उसका व्यक्तित्व छात्रों के लिए अनुकरणीय बन जाए क्योंकि प्राय: हर छात्र का आदर्श उसका शिक्षक ही होता है। वह वही कार्य करने की चेष्टा करता है जो शिक्षक करता है। शिक्षक जिन मूल्यों को छात्रों को देना चाहता है वह स्वयं उसके अन्दर भी होने चाहिए।


मूल्यों के विकास हेतु ही शिक्षा में सुधार हेतु नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति सामने आई है।

नई शिक्षा नीति ने प्रयास कियाह कि शिक्षा की प्रक्रिया की रूपरेखा पुनः तय की जाए तथा लोगोंको यह महसूस कराया जाए कि किस तरह से वे शोषण, असुरक्षा आदिको रोक सकते हैं। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे छात्र में सत्य, सहयोग, कर्तव्य परायणता आदि का विकास हो। बच्चे सबसे पहली शिक्षा माता पिता से लेते हैं। अतः माता-पिता का व्यवहार मूल्य पर आधारित होना चाहिए। वर्तमान पाठ्यक्रम में नैतिक मूल्य संबंधी अंशी को बढ़ाना चाहिए। पाठ्य पुस्तकों में भी नैतिक मूल्य संबंधी अंश होने चाहिए।


वर्तमान समाज में मूल्यों काहास हमारी शिक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है जिसे स्वीकार करके हीशिक्षा को मूल्यों का विकास करना होगा तथा शिक्षा में सुधार द्वारा ही इन मूल्यों के हास को रोका जा सकता है। राष्ट्र और समाज के विकास के लिए शिक्षा ही प्रमुख साधन है जिसके द्वारा मानव का कल्याण हो सकता है। कुशिक्षा स्वयं के लिए ही नहीं अपितु समाज व राष्ट्र के लिए भी हानिकारक होती है। अतः शिक्षा में मूल्यों पर बल देना चाहिए।