धर्म - Religion
धर्म - Religion
सभी पितृसत्तात्मक समाजों में धार्मिक कृत्यों और संस्कारों को करने का विशेषाधिकार पुरुषों को होता है। भारत के आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक आत्माबाद. प्रकृति पूजा के साथ-साथ बौद्ध धर्म, इस्लाम धर्म, हिंदू धर्म या ईसाई धर्म का पालन करते हैं। इस्लाम, हिंदू, बौद्ध या फिर ईसाई धर्म मुख्यतः गैर जनजातीय पितृसत्तात्मक समाज के धर्म हैं। इन सभी धर्मों में स्त्रियों का पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे का स्थान होता है। पारंपरिक रूप से महिलाएँ कभी भी पुजारी की तरह नियुक्त नहीं की जातीं। धार्मिक कर्मकांडों में स्त्री-पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं, परंतु मुख्य जिम्मेदारियाँ पुरुष ही निभाते हैं। इसी प्रकार से आदिवासी समुदायों की पांरपरिक धार्मिक क्रियाओं और कर्मकांडों में भी स्त्री की सीमित भागीदारी होती है। उदाहरण के लिए नीलगिरी के पशुपालक टोडा समुदाय में मासिक धर्म, प्रसूत आदि के कारण स्त्रियों को अपवित्र समझा जाता है। भैसों से संबंधित सभी कार्यों में इनकी स्थिति निम्न होती है। यहाँ तक कि इन्हें भैंसशालाओं के नजदीक जाने, भैंस के दूध से बनने वाले व्यंजन बनाने तक की अनुमति नहीं होती है। इनके मुख्य पुरोहित पोलोल को अविवाहित रहना पड़ता है।
लद्दाख के बोद और सिक्किम के भोटिया समुदाय बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। दोनों ही समुदाय की भिक्षुणियाँ के भिक्षुणीविहार बौद्ध मठों से भौगोलिक दूरी बनाये रखते हैं। समुदाय के लोगों के लिए भिक्षुणियाँ कर्मकांड और दाह-संस्कार नहीं करा सकतीं। वे अनुष्ठानों के समय केवल दर्शक की भाँति उपस्थित रहती हैं।
भोटिया तो स्त्री और पुरुष के दाह-संस्कार के लिए तैयार की जाने वाली चिता (funeral pyre) में भी अंतर भ करते हैं। स्त्री और पुरुष की चिता में लकड़ियों के क्रमशः आठ और सात चक्र सजाए जाते हैं। इस अंतर को स्पष्ट करते हुए भोटिया कहते हैं कि समाज में स्त्रियाँ पुरुषों की तुलना में एक पायदान नीचे होती हैं, उनकी चिता में एक चक्र लकड़ियाँ अधिक रख कर इसकी क्षतिपूर्ति की जाती है (भसीन, 1991)।
चूँकि आदिवासी समुदायों में धर्म समाज के नियंत्रण और नियामक दोनों ही कार्य करता है इसलिए इस क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व समाज के अन्य पक्षों में भी उसकी सत्ता को मजबूत बनाता है। यह जेंडर असमानता को वैधता प्रदान करता है तथा स्त्रियों को सार्वजनिक सत्ता से भी वंचित रखता है।
जबकि, मातृसत्तात्मक समाज में धार्मिक कार्यों को स्त्रियाँ ही करती हैं। मेघालय के खासी समुदाय में कुल-देवता की जगह कुल-देवियों की पूजा होती है। धार्मिक अनुष्ठानों और कृत्यों में प्रमुख स्थान पुरोहितिनों का होता है। पुरोहितों का काम पुरोहितिनों की सहायता करना होता है।
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