समीक्षा आव्यूह - review matrix
समीक्षा आव्यूह - review matrix
यह शिक्षण की प्रजातान्त्रिक आव्यूह मानी जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों में समालोचना के कौशल का विकास करना है। इसमें छात्रों को अधिक क्रियाशील रहना पड़ता है। शिक्षक निर्देशन का कार्य करता है। शिक्षक विषय-वस्तु की प्राथमिक भूमिका से अवगत कराने के पश्चात् पुस्तको, सहायक पुस्तकों तथा सन्दर्भ ग्रन्थों के अध्ययन व अवलोकन के लिए निर्देशित करता है। साधारणतः प्रत्येक छात्र के समीक्षा का प्रकरण अलग-अलग होता है। कभी-कभी एक ही प्रकरण सभी छात्रों का समीक्षा के लिए दे दिया जाता है। छात्रों को पुस्तकालय का प्रयोग अधिक करना होता है । पुस्तकों तथा सन्दर्भ ग्रन्थों का अवलोकन विशिष्ट प्रकरण के लिए किया जाता है। छात्र आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक की भी सहायता लेते है।
इस शिक्षण आव्यूह में छात्रों में स्वतः अभिप्रेरणा की अधिक आवश्कता होती है। सन्दर्भ ग्रन्थों में में प्रकरण को ढूढने तथा उसकी समीक्षा करने के लिए लगन तथा धैर्य की आवश्यकता होती है।
प्रत्येक छात्र का प्रकरण अलग-अलग होने से उन्हें स्वतन्त्र रूप मे अध्ययन तथा अवलोकन का अवसर मिलता है। छात्र में सहयोग की भावना विकसित होती है। समीक्षा निम्नलिखित चार प्रकार से की जाती है मैत्री
• मौखिक समीक्षा- व्याख्यान, प्रवचन, अखबार तथा पुस्तकों की अक्सर आलोचना तथा समलोचना की जाती है।
• लिखित समीक्षा - पाठ्य-वस्तु विचारों तथा पुस्तकों की समीक्षा की जाती है।
• समस्या समीक्षा- शोध कार्यों के समस्या की समीक्षा की जाती है।
• साधारण समीक्षा- पाठ, कथा, कहानी तथा उपन्यास की समीक्षा की जाती है।
इस आव्यूह की अधोलिखित विशेषतायें हैं
• उच्च कक्षाओं के शिक्षण के लिये यह आव्यूह अधिक उपयोगी तथा प्रभावशाली है।
• छात्रों की विश्लेषण तथा संश्लेषण की क्षमताओं का विकास होता है।
• पुस्तकालय व सन्दर्भ-गन्थों के अवलोकन तथा प्रयोग की प्रवृत्ति का विकास होता है।
• छात्रों में अध्ययन क्रियाओं में सहयोग की भावना का विकास होता है।
• अनुसन्धान कर्ताओं के लिये यह आव्यूह विशेष उपयोगी होती है। प्रत्येक शोधकर्ता को अपने प्रकरण पर उपलब्ध साहित्य की समीक्षा करनी पड़ती है।
• छात्रों में स्वतन्त्र - अध्ययन की प्रवृत्ति का विकास होता है।
• निबन्ध प्रतियोगिता, वाद-विवाद, आन्तरिक मूल्यांकन आदि के लिए भी उपयोगी होती है।
इस आव्यूह की सीमाएँ निम्न है-
• प्राथमिक तथा माध्यमिक कक्षाओं के शिक्षण के लिए अधिक उपयोगी नहीं होती है।
• अधिकांश छात्र- शिक्षक के निर्देशन पर ही आश्रित रहते है और प्रत्येक समस्या के लिए शिक्षक से परामर्श करते है।
• इसमें समय का अपव्यय अधिक होता है।
• एक ही प्रकरण की समीक्षा से छात्रों में स्पर्धा होती है तथा नकल का क्षेत्र भी बढ़ता है।
• सभी प्रकार के छात्रों के लिए यह उपयोगी तथा प्रभावशाली नही होता है।
पर्यावरण शिक्षा के उद्देश्यों की दृष्टि से सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक शिक्षण विधियों को समान महत्व देना चाहिए । सैद्धांतिक विधियाँ पर्यावरण सचेतना व विकास में सहायक होती हैं। कौशल तथा व्यावहारिक क्षमताओं के लिये प्रयोगात्मक, व्यावहारिक विधियों का उपयोग आवश्यक होता है। सह सम्बन्ध शिक्षण विधि अधिक उपयोगी है, क्योंकि पाठ्य-वस्तु की प्रकृति अंतरानुशसनीय होती है। पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं के समाधान हेतु शोध कार्यों का आयोजन भी किया जाता है। पर्यावरण शिक्षा में शोध कार्यों हेतु अन्तः अनुशासन आयाम को महत्व दिया जाता है।
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