वैदिककालीन शिक्षा के संस्कार - rites of vedic education

वैदिककालीन शिक्षा के संस्कार - rites of vedic education


वैदिक काल में औपचारिक शिक्षा उपनयन संस्कार के बाद शुरु हती थी। उसस भी पहल विद्यारंभ संस्कार महत्त्वपूर्ण था। इस संस्कार से बच्च की शिक्षा प्रारंभ हाती थी। यह संस्कार ५ वर्ष की आयु में होता था। शिक्षा मतलब सरकार, मनुष्य का सुसंस्कारी बनाने वाला संस्कार औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही मनुष्य के विकास को अपेक्षा की जाती थी।


वैदिककालीन इतिहास:- वैदिककालीन भारतीय इतिहास ५००० ई.पू. से २००० है वैदिककालीन शिक्षा पद्धति में चारों वेदा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की शिक्षा दी जाती थी। इसमें देवताओं की आराधना, यज्ञ कर्म व सृष्टि का निर्माण इत्यादि विषय शामिल थे। उल्लेखनीय बात यह है कि वैदिक काल में लिपि लेखन का प्रारम्भ नहीं हुआ था। एक पीढ़ी के लोग दूसरी पीढ़ी के लागों का बंदा का मौखिक ज्ञान देते थे। कठस्थ विद्या के माध्यम से यह वैदिक शिक्षा पीढ़ी दर-पीढी संरक्षित रहती थी।


वैदिक काल में वर्णव्यवस्था अस्तित्व में थी। उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद चार वर्ण थे जिसे कहा जाता था। वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था भी अस्तित्व में थी। ब्रहमचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, सन्यासाश्रम व वानप्रस्थाश्रम इन चार आश्रमों में पूर्वजीवन बेटा था प्रत्येक व्यक्ति का अपन आश्रम के नियमानुसार आचरण करना पड़ता था।


आश्रमधर्म का पालन करने के साथ ही प्रत्येक व्यक्ति के ऋण से उऋण होने की संकल्पना जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की चार ऋण उतारने होते थे:


(1) देवऋण 

2) मातृ-पितृ ऋण 

3) गुरुण 

4) समाजण


इन ऋणों से उऋण होने के लिए इसके निम्नलिखित मार्ग बनाये गये हैं: 


1) व्रत, देवऋण नियम


2) गुरुवाण:- विद्या का आदान-प्रदान, आदर, नम्रता


3) मातृ-पितृ ऋण संततिवर्धन प्रत्पादन श्राद्धपक्ष


(4) समाजऋण मानव कल्याण दानधर्म सेवा


आश्रमव्यवस्था में रहकर ऋण उतारने के लिए निम्नलिखित कार्य करने आवश्यक बताए गए है।


1) ब्रम्हचर्याश्रमः इस अवस्था में गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करना अपरिहार्य था। गुरु की सेवा करना, अध्ययन और मनन करना, चिंतन करना, फल कंद मूल एकत्रित करना धर्म व कर्तव्य समझा जाता था।


2) गृहस्थाश्रम: इस आश्रम में देवऋण, गुरुण मातृपितृ ऋण व समाज ऋण से उऋण होने का कहा गया है।


3) वानप्रस्थाश्रम इस आश्रम में एकांतवास में जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा की गई है।


(4) संन्यासाश्रम अवस्था संसार से शारीरिक निवृत्ति लेन का कहा गया है। इसमें शारीरिक निवृत्ति लेकर मनन, चिंतन, साधना करना, भावी पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक प्राथ तैयार करना आदि मुख्य कार्य बताए गए हैं।


पुरुषार्थ कुल चार है-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष।


1) धर्म:- वैदिक काल में कर्तव्य के लिए धर्म शब्द का उपयोग किया गया है। ऐसी कल्पना थी।


2) काम:- धर्म के पश्चात काम एक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ माना गया जो भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक आवश्यकताएं पूर्ण करने की इच्छा रखकर समाधान करने का प्रयत्न करता है।


3) मोक्ष - मोक्ष का तात्पर्य तीव्र वासना से मुक्त होना है। वैदिक काल में जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य मोश है।