जेंडर आधारित पहचान के विकास में समुदाय की भूमिका - The role of community in the development of gender-based identities
जेंडर आधारित पहचान के विकास में समुदाय की भूमिका - The role of community in the development of gender-based identities
बच्चे के परिवार के बाहर समाजीकरण की प्रक्रिया पर उसके अभिजात समूह के सदस्यों का प्रभाव पड़ता है। बच्चा जब जन्म लेता है तो वह एक सामाजिक स्थिति में जन्म लेता है। वह एक जाति में जन्म लेता है। वह एक धर्म में जन्म लेता है। वह एक खास क्षेत्र और एक खास भाषा-भाषी समुदाय में जन्म लेता है, जिसकी अपनी विशिष्ट स्मृतियाँ, संस्कृति और इतिहास होता है। पैदा होने के बाद बच्चा इन सारे तत्वों को एक-एक कर, धीरे-धीरे सीखने, समझने और अपनाने लगता है, जो उस समाज में उसकी अपनी जगह को और इस जगह को लेकर उसके व्यवहार, उसकी धारणा और नजरिए को निर्मित निर्धारित करती हैं साथ ही दूसरों के प्रति उसके नजरिए को भी निर्मित या परिवर्तित करती हैं। इस प्रकार वह उस समाज की एक इकाई के रूप में विकसित होने लगता है, इसे समाजीकरण की प्रक्रिया कहा जाता है।
ब्रिटिश समाजशास्त्री व नारीवादी लेखिका ऐना ओक्ले के अनुसार 'जेंडर' सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है, जो स्त्रीत्व और पुरुषत्व के गुणों को गढ़ने के सामाजिक नियम व कानूनों का निर्धारण करता है।
उनका मानना था कि जेंडर समाज-निर्मित है, जिसमें व्यक्ति की पहचान गौण होती है और समाज की भूमिका मुख्य होती है। इसमें केवल स्त्री ही शामिल नहीं है, बल्कि वह भी शामिल है जो मान्य लिंगों से अलग है, जिनमें पुरुष और स्त्री के समलैंगिक संबंध व उसमें आई जटिलताएँ भी शामिल हैं।
समूह ह में बच्चे प्राय: खेलते हुए भी लिंग भूमिका को समझते हैं। यह समाज ही है जिसने हमें सिखाया कि लड़कियाँ नाजुक होती हैं, इसलिए उन्हें गुड़ियों से खेलना चाहिए और लड़के शक्तिशाली होते हैं, इसलिए उन्हें क्रिकेट और कबड्डी जैसे खेल खेलने चाहिएँ। इस तरह हम 'शक्ति' के इस तथाकथित पैमाने को अपनाने लगते हैं। जेंडर व्यवहार मूलतः समाज निर्मित है।
वार्तालाप में शामिल हों