जेंडर आधारित पहचान के विकास में परिवार की भूमिका - The role of the family in the development of gender-based identity

जेंडर आधारित पहचान के विकास में परिवार की भूमिका - The role of the family in the development of gender-based identity


बच्चे के समाजीकरण की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है। इसे अस्वीकारने का कोई ठोस आधार भी नहीं है। इस समाजीकरण के अनेक प्रारूप हो सकते हैं परंतु इतना तय है कि बच्चे के समाजीकरण में परिवार की अहम भूमिका होती है। जेंडर आधारित पहचान के विकास में परिवार का प्रथम प्रभाव होता है। प्राथमिक समाजीकरण के स्तर पर बच्चे को लिंग पहचान की चेतना अपने माता पिता से प्राप्त होती है। माता-पिता को परिवार में वह विभिन्न सामाजिक व सांस्कृतिक भूमिकाओं में देखते हैं। बच्चे परिवार में अपने भाई बहन व अन्य सदस्यों को देख कर वैसा ही व्यवहार करना प्रारंभ कर देते हैं।


जेंडर आधारित भूमिकाओं के समाजीकरण में माता पिता प्रभावी भूमिका निभाते हैं। पुरुषों द्वारा निर्मित संस्कृति यह निर्धारित करती है कि शासन करना पुरुषों का स्वभाव है जबकि शासित होना महिलाओं की प्रकृति है। इस आधार पर महिलाओं को गृहकार्य एवं बच्चों की देखभाल तक सीमित रखा जाता है जबकि पुरुष इससे अलग रहते हैं। बच्चों को जन्म देना, लालन-पालन करना और उसको सामाजिक व्यक्तित्व बनाने तक का कार्य महिला को सौंपा जाता है जिसके तहत महिलाएँ बच्चों के पालन पोषण की प्रक्रिया में प्रकृति के साथ निकटता से जुड़ जाती हैं जबकि पुरुष में इस प्राकृतिक गुण का अभाव होता है। यह स्थिति पुरुष को परिवार से अलग कर देती है और पुरुष ऐसे कार्यों की तरफ उन्मुख हो जाता है जो सांस्कृतिक तर्क के आधार पर पुरुषों के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आता है जैसे धर्म, राजनीति, प्रशासन आदि । ऐसे में पुरुष संस्कृति से संबंधित हो जाता है और पुरुषों को इन सबका स्वामी घोषित कर दिया जाता है। आज समाज में बच्चों का पालन पोषण करते हुए माता पिता अपने बच्चों में बालक तथा बलिकाओं से पृथक व्यवहार कर रहे हैं।

परिवार में लड़के और लड़की के समाजीकरण की प्रक्रिया के तहत अलग-अलग तरीके से पालन-पोषण शामिल होता है ।। इसके अंतर्गत माताएँ अपनी बेटी का पालन-पोषण एक अच्छी बेटी, बहन या भविष्य में एक अच्छी पत्नी के गुण होने की दृष्टि से पालती हैं लेकिन इनमें उनकी अपनी बेटी की पहचान और अस्तित्व कहाँ है? हालाँकि माताएँ अपने बच्चों का पालन पोषण प्यार और सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर करती हैं परंतु वास्तव में वह भी पितृसत्ता को मूक समर्थन दे रही होती हैं। माता-पिता लड़की को कमजोर समझ कर उस पर लड़के से अपेक्षाकृत अधिक ध्यान रखते हैं। वह लड़की को शांत एवं सहनशील होने की शिक्षा देते हैं, वहीं लड़के को स्वतंत्र एवं आक्रामक भूमिका में रहना सिखाया जाता है। इस प्रकार प्राथमिक समाजीकरण के प्रभाव में बच्चे के लिंग के अनुसार लिंग भूमिका का विकास होना स्वाभाविक है।