प्रबन्ध-लेखापाल की भूमिका - Role of Management Accountant

प्रबन्ध-लेखापाल की भूमिका - Role of Management Accountant


 प्रबन्ध-लेखापाल की किसी भी संस्था में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसे प्रबन्ध के आंख और कान कहा जाता है। वस्तुतः इसका व्यावसायिक संस्था में वही स्थान होता है जो स्थान मानव शरीर में नाडी - तन्त्र (Nervous System) का होता है यह एक कुशल व्यवसाय विश्लेषक होता है जोकि अपने प्रशिक्षण और अनुभव के कारण व्यवसाय के वित्तीय लेखों के रखने तथा प्रबन्ध के मार्गदर्शन के लिये इनकी व्याख्या करने के लिये संस्था का सर्वाधिक योग्य व्यक्ति होता है।


पी. एल. टण्डन के शब्दों में, प्रबन्ध लेखापाल की स्थिति पहिये में आरा की तरह है जो सूचना प्राप्त करने वाले केन्द्र तथा पहिये के किनारे को जोड़ता है। वह सूचना को संशोधित करता है तथा संशोधित (processes) सूचना को जहा से वह आई थी, वापस लौटा देता है।


टण्डन का उपर्युक्त कथन संस्था में उसके महत्व को प्रकट करता है। सामान्यतः प्रबन्ध लेखापाल संस्था के लेखांकन विभाग का अध्यक्ष अथवा प्रमुख लेखा अधिकारी होता है। इस प्रकार उसका स्थान उच्च-स्तरीय प्रबन्ध में होता है। वित्तीय मामलों के सम्बन्ध में संस्था का सर्वोच्च अधिकारी एवं विशेषज्ञ होने के कारण वह सीधा संचालन मण्डल अथवा प्रबन्ध संचालन के प्रति उत्तरदायी होता है। वह लेखाकन प्रणाली के सम्बन्ध में अन्य विभागों के लिये अपने सुझाव प्रबन्ध संचालक को भेज देता है तथा प्रबन्ध संचालक इन सुझावों के आधार पर आवश्यक निर्देश सम्बन्धित लेखा अधिकारियों के पास भेज देता है। इस प्रकार वह केवल स्टाफ विशेषज्ञ है जिसका अन्य विभागों पर कोई नियन्त्रण नहीं होता बल्कि वह अन्य विभागाध्यक्षों के समन्वय एवं सहयोग से कार्य करता है।