व्यवसाय में प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री की भूमिका - Role of Managerial Economist in Business
व्यवसाय में प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री की भूमिका - Role of Managerial Economist in Business
भविष्य अनिश्चित होता है तथा व्यवसाय भी अनिश्चितता पर आधारित होता है। एक कुशल एवं योग्य प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री का यह दायित्व है कि वह इन अनिश्चितताओं का पूर्वानुमान लगाकर प्रबन्ध को सही निर्णय लेने एवं भावी नियोजन में सहायता करे। एक प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री को अपने दायित्व का निर्वाह करने के लिए प्रबन्धकीय निर्णयों को प्रभावित करने वाले तत्वों को निश्चित करना होता है। इल तत्वों को प्रमुखतया दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- आन्तरिक तत्व तथा बाह्य तत्व ।
1. आन्तरिक तत्व (Internal Factors) - आन्तरिक तत्व वे तत्व होते है जिनका सम्बन्ध फर्म के कार्य-क्षेत्र से होता है और जिन पर प्रबन्ध का नियंत्रण, स्कन्ध नीति का निर्धारण, व्यापार विस्तार या संकुचन के सम्बन्ध में निर्णय आदि।
इन सभी महत्वपूर्ण मामलों में प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है और प्रबन्धकीय निर्णयों में पर्याप्त सहायक सिद्ध हो सकता है।
प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री को सामान्यतया निम्नलिखित विषयों पर प्रबन्ध को अपनी राय देनी चाहिए-
(a) आगामी वर्ष के लिए उपयुक्त विक्रय और लाभ बजट क्या हो?
(b) आगामी अवधि के लिए उपयुक्त और कय बजट क्या हो?
(c) आगामी अवधि में मजदूरी और मूल्य नीति में क्या परिवर्तन किये जायें?
(d) आगामी अवधिक में रोकड़की स्थिति कैसी है? इस सम्बन्ध में उसे फालतू धन के विनियोजन तथा कमी के लिए पर्याप्त साधन जुटाने हेतु सुझाव देने चाहिए।
(e) व्यवसाय की साख नीति में क्या परिवर्तन वांछनीय हैं?
2 बाह्य तत्व - म्गजमतदस बजवतेद्ध इन तत्वों का सम्बन्ध फर्म के कार्य क्षेत्र की सीमा से बाहर होता है और यह तत्व प्रबन्ध के नियन्त्रण से बाहर होते है। प्रत्येक व्यवसाय इन बाह्य तत्वों में राष्ट्रिय आय राष्ट्रिय उत्पादन, व्यापार की मात्रा, मुद्रा, प्रसार और मुद्रा संकुचन, श्रम अधिनियम आदि प्रमुख हैं। अतः इन तत्वों का समुचित विश्लेषण और भविष्यवाणी व्यवसाय के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री को इन तत्वों का निरन्तर अध्ययन और विश्लेषण करते रहना चाहिए और अपने व्यवसाय को प्रभावित करने वाले तत्वों से सर्वोच्च स्तरीय प्रबन्ध (Top Level Management) को अवगत कराना चाहिए।
इस सम्बन्ध में उसे प्रमुख रूप से निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए।
(a) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थिति की जानकारी प्राप्त करना । स्थानीय क्षेत्रीय या विश्वव्यापी महत्वपूर्ण आर्थिक प्रवृत्तियाँ क्या हैं और निकट भविष्य में व्यवसाय चक्र की क्या गति होगी ?
(b) नये एवं पुराने बाजारों में माँग की सम्भावनाओं का पता लगाना ।
(c) बाजार और ग्राहकों के अवसारों में तेजी से परिवर्तन की सम्भावनाओं है? इसके ज्ञान से प्रबन्ध नये बाजार या नये ग्राहकों में अपनी वस्तुओं की माँग बढ़ाने के प्रयत्न कर सकता है ।
(d) भविष्य में साख की उपलब्धता और लागत में परिवर्तन की सम्भावनाओं का पता लगाना ।
(e) भविष्य में कच्चे माल की उपलब्धता और मूल्यों में परिवर्तन की सम्भावना का पता लगाना
(f) फर्म के उत्पादित माल का मूल्य भविष्य में बढ़ेगा अथवा घटेगा, की सम्भावना का पता लगाना।
(g) भविष्य में प्रतियोगिता के बढ़ने या घटने की सम्भावना का पता लगाना
(h) सरकार की आर्थिक नीतियों और नियन्त्रणों जैसे, कर नीति मूल्य नीति, श्रम नीति, एकाधिकार पर नियन्त्रण आदि में परिवर्तन की सम्भावनाओं का पता लगाना इस प्रकार प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री को इन आन्तरिक एवं बाह्य तत्वों का गहनता से अध्ययन करना चाहिए तथा इनके सम्बन्ध में सर्वोच्च प्रबन्ध को अपनी राय बतानी चाहिए।
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