पितृसत्ता की भूमिका - role of patriarchy
पितृसत्ता की भूमिका - role of patriarchy
1. संपत्ति का अधिकार- परिवार में लड़कियों एवं लड़को में संपत्ति का अधिकार बराबर नहीं होता
2. लड़की होना - लड़कियों को शुरू से ही पराया धन समझा जाता है। निम्न दृष्टि से देखा जाता है। शादी के लिए कोई चुनाव नहीं होता।
3. शिक्षा में जेंडर - लड़कों को तकनीकी कौशल के लिए शिक्षा दी जाती है। लड़कियों को सिलाई बुनाई का प्रशिक्षण दिया जाता है।
4. लड़की की पवित्रता - परिवार में लड़कियों को शुद्धता के रूप में देखा जाता है इसलिए उसको परिवार के आदर्शों, नियमों की शिक्षा दी जाती है। उसको घर के कार्यों के लिए तैयार किया जाता है । लड़की को उपलब्धि प्राप्त करने की नज़र से नहीं देखा जाता है एवं उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी जिम्मेदारियों का पालन ईमानदारी से करें।
इस प्रकार पितृसत्ता की भूमिका निम्न जगह पर देखी जा सकती है-
1. परिवार में।
2. विद्यालय में।
3. हिंसा में।
4. आर्थिक संरचना में।
5. समाज में।
6. शिक्षा में।
7. प्रशासन में ।
8. यौन शोषण में
इस प्रकार हम देखते हैं कि आज भी पितृसत्ता की भूमिका हमारे समाज में विद्यमान है।
नारीवाद की जड़े पितृ सत्तात्मक व्यवस्था में है। इस व्यवस्था में पुरुष का एकाधिकार स्त्री, बच्चों व परिवार के अन्य सदस्यों पर होता है। नारी पर उसका वर्चस्व कठोर रूप में रहता है। वह उसकी अनुमति के बगैर कुछ नहीं कर सकती है । स्त्री पुरूष के अधीन रहकर परिवार का कार्य करती है। वर्चस्व की इस धारणा का साधारणीकरण नहीं करना चाहिए। बहुत से ऐसे परिवार मिलते हैं जहाँ नारी पर पुरूष का दबाव न के समान होता है। फिर भी समाज में यह एक आम धारणा बन गई है कि पुरूष, स्त्री से अनेक मामलों में श्रेष्ठ है। उमा चक्रवर्ती पितृसत्तात्मक व्यवस्था के संबंध में लिखती हैं, "पितृसत्ता को, जिसके जरिए अब संस्थाओं के एक खास समूह को पहचाना जाता है, सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसमें पुरूष का स्त्रियों पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण व उत्पीड़न करते है। पितृसत्ता को एक व्यवस्था के रूप में देखना बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पुरूष और स्त्री के बीच शक्ति एवं हैसियत में असमानता के लिए जैविक निर्धारणवाद (बायोलाजिकल डिटरमिनिज्म) के मत को खारिज करने में सहायता मिलती है।
साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि स्त्री और पुरूष का वर्चस्व कोई व्यक्तिगत घटना नहीं बल्कि यह एक व्यापक सरंचना का अंग है।" इसमें कोई दो मत नहीं है कि पितृसत्ता के बीज आर्थिक-सामाजिक संरचना में ही मौजूद हैं। पृथक से ऐसी कोई चीज नहीं है, जो नारी पर थोपी गई है, बल्कि यह उस सरंचना और व्यवस्था का अभिन्न अंग बन गई, जिस पर पुरूष की सत्ता आर्थिक संसाधनों पर काबिज हो गई और स्त्री उसके अधीन बन गई। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि अर्थ रूप में जो भी शक्तिशाली होता है वह समाज और विभिन्न संस्थाओं पर अधिकार कर लेता है। यह कल भी सत्य था और आज भी सत्य है, क्योंकि अनेक आर्थिक-सामाजिक बदलावों के बावजूद भारत मे पूँजीवादी व्यवस्था स्थापित हो चुकी है। उमा चक्रवर्ती सवर्ण पितृसत्ता के संबंध मे लिखती हैं, "ब्राह्मणवादी पितृसत्ता नियमों और संस्थाओं का एक ऐसा समूह है जिसमें जाति और जेंडर एक-दूसरे से संबंधित हैं
और परस्पर एक-दूसरे को आकार प्रदान करते हैं और जहाँ जातियों के बीच की सीमाएँ बनाए रखने के लिए महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हैं। इस ढाँचे के पितृसत्तात्मक नियम सुनिश्चित करते हैं कि जाति व्यवस्था को बंद सजातीय यौन विवाह संबंधों के जातिक्रम का उल्लंघन किए बिना बनाए रखा जा सकता है। महिलाओं के लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक कानून उनके जातीय समूहों के अनुरूप एकदूसरे से भिन्न होते हैं, जिसमें महिलाओं की यौनिकता पर सबसे कठोर नियंत्रण ऊंची जातियों में पाया जाता है। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के कायदे- कानून अक्सर शास्त्रों से लिए जाते है। ये विशेषकर उच्च जातियों को वैचारिक आधार प्रदान करते हैं, लेकिन कई बार उन्हें निचली जातियों द्वारा भी आत्मसात कर लिया जाता है।" वास्तव में यदि समाज के उच्च शिक्षित सवर्ण महिलाओं के पारिवारिक ढाँचे तथा महिलाओं के क्रियाकलापों का विश्लेषण किया जाए तो इन परिवारों की स्त्रियां अनेक प्रकार की बंदिशों से बंधी होती हैं। वे धनी होते हुए भी आर्थिक रूप से पति पर निर्भर रहती है। धर्म के कठोर नियमों का लबादा इतना भारी होता है कि उतार फेंकने का साहस जल्दी नहीं होता।
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