समायोजन की प्रक्रिया में विद्यालय और शिक्षकों की भूमिका - Role of school and teachers in the process of adjustment
समायोजन की प्रक्रिया में विद्यालय और शिक्षकों की भूमिका - Role of school and teachers in the process of adjustment
विद्यालय की भूमिका पर चर्चा में इस पक्ष पर सर्वाधिक बल दिया जाता है कि यह ज्ञान के निर्माण और ग्रहण के अवसर को सुनिश्चित करता है। इसकी अनुषंगी भूमिका में समाजीकरण के नाम पर भारी भरकम शब्दावली में 'चरित्र निर्माण', 'नागरिकता विकास' व 'सांस्कृतिक चेतना' के पोषण आदि उद्देश्यों का भी नाम गिनाया जाता है। इन सभी पक्षों के साथ विद्यालय, व्यक्ति को वैयक्तिक और सामाजिक समायोजन में समर्थ बनाता है। विद्यालय में विद्यार्थी अपने सहपाठियों और शिक्षकों के साथ एक रिश्ते का विकास करता है। ये रिश्ते उसकी सामाजिक-सांवेगिक आवश्यकताओं और समस्याओं के एक क्षेत्र के रूप में उपस्थिति रहते हैं। अभिप्राय यह है कि विद्यालय विद्यार्थी को समयोजन में सहयोग करता है और समायोजन की चुनौतियां भी उपस्थित करता है।
अकादमिक उपलब्धि का दबाव, हमउम्र साथियों के साथ तनाव, प्रदर्शन को ऊँचे स्तर का पाने के लिए प्रतियोगिता का भाव, ईर्ष्या आदि को समायोजनकारी चुनौतियों के रूप में पहचाना जा सकता है वही रूचि के विकास, अन्तरवैयक्तिक संबंधों का विकास सामूहिकता की भावना, आत्म नियमन कुछ ऐसे पक्ष हैं जहां विद्यालय समायोजन करने में सहयोग प्रदान करता है।
व्यक्ति की विद्यार्थी रूपी पहचान को हम कक्षा विशेष के विद्यार्थी होने, उपलब्धि के पैमाने पर उसकी उपस्थिति और रूचि आदि के सापेक्ष परिभाषित करते हैं। इसके साथ ही उसके 'स्व' के अनेक ऐसे पक्ष है जिसका बीजवपन और पोषण विद्यालय के द्वारा ही होता है।
जैसे ही विद्यार्थी की पहचान के साथ व्यक्ति विद्यालय में कदम रखता है उसका संपर्क हमउम्र साथियों और वयस्कों के ऐसे समुच्चय के साथ होता है। जिनके सम्मुख उसे कर्ता की भूमिका निभानी है। अब उसकी पहचान केवल उसके नाम की सूचना देने वाली संज्ञा तक सीमित हो जाती है। अपने प्रदर्शन और अन्तः क्रियाओं के आधार पर अपनी पहचान में नए आयाम जोड़ना प्रारंभ करता है। विद्यालय सोद्देश्य तरीके से विद्यार्थी को उसका 'स्व' खोजने का मार्ग प्रशस्त करता है। विद्यालय उसमें इस भाव का पोषण करता है कि वह क्या-क्या कर सकता है ? वह जो कर सकता है या जो करना चाहता है और जिन कार्यों को उसने कर लिया है उसके आधार पर वह अपनी पहचान को स्वयं परिभाषित करने लगता है और इसी रूप में वह पहचाना भी जाता है। यह क्षण और दौर प्रत्येक व्यक्ति के समायोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विद्यालय में की गयी अन्तःक्रियाएं विद्यार्थी को संदेश देती हैं कि वह क्या-क्या करने में दक्ष और समर्थ है? और वह क्या-क्या नहीं कर सकता है।
इन दोनों प्रकार के संदेशों में संतुलन व्यक्ति के समायोजन को निर्धारित करता है। प्रथम दशा में जहां विद्यार्थी अति उच्च आकांक्षा के दबाव से ग्रस्त हो जाता है वहीं दूसरी स्थिति में उसके भीतर हीनता घर कर जाती है। हमें इन दोनों प्रकार की स्थितियों से बचने का प्रयास करना होगा।
• परिवार से भिन्न सामूहिक व्यवस्था में अपने लिए स्थान बनाना समायोजन की चुनौती के रूप में उपस्थित होता है। व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह समूह के द्वारा स्वीकार किया जाए। कक्षा में समूह में स्वीकृति और अस्वीकृति के संदेशों का मुख्य संप्रेषक शिक्षक होता है।
एक शिक्षक के लिए अपने विद्यार्थियों के संदर्भ को जानना महत्वपूर्ण है। आप किसी भी शिक्षक से पूछिए कि क्या वह अपने विद्यार्थियों के संदर्भ को जानता है।
शिक्षक का स्वाभाविक उत्तर होगा- हाँ । यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि आप संदर्भ के अन्तर्गत किन पक्षों को शामिल करते हैं और उसके प्रति क्या दृष्टि रखते हैं। सीमित दायरे में संदर्भ परिवार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की सूचनात्मक जानकारी तक सीमित हो सकता हैं। इसमें आप विद्यार्थियों की रूचि, शौक और हम उम्र साथियों के समूह जैसे पक्षों को भी सम्मिलित कर सकते हैं लेकिन संदर्भ परिवर्तनशील होता है। विद्यार्थी मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी के संपर्क में हैं। वह अपने समुदाय, बाजार, वृहपरिवार के सदस्यों का अवलोकन कर रहा है वह समाज की विभिन्न घटनाओं का प्रत्यक्षण कर रहा है। इन सभी के संयुक्त प्रभाव में वह अपने व्यवहार और क्रियाओं को निर्देशित कर रहा है। शिक्षक को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए कि वह विद्यार्थी के अनुभवों को 'पढ़ने' की कोशिश करे। इसके लिए शिक्षक विद्यार्थियों को अभिव्यक्ति के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। उसकी अभिव्यक्ति को स्वीकार करना चाहिए उसके प्रति स्वाभाविक जिज्ञासा प्रकट करनी चाहिए । ऐसी शंका उठ सकती है कि इस स्थिति में अध्यापन कैसे करेंगे? यह तो शिक्षण का प्रथम चरण होगा। जब आप इन अनुभवों को सुनें तो विद्यार्थी के सम्मुख आलोचनात्मक प्रश्न रखें। केवल सुनने और 'शाबाश' कहने के अलावा आप को उन बिंदुओं को पहचानना होगा जो समस्यामूलक है और जो सार्थक हस्तक्षेप की मांग करते हैं।
एक व्यक्ति जो अपने परिवेश और स्वयं के साथ समायोजन रखता है वह अपने परिवेश में सकारात्मक ऊर्जा को बनाए रखता है। व्यक्ति को अपने सामर्थ्य और मजबूत पक्षों के प्रति सचेत रखने और कमजोरियों व विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए समर्थ बनाने में विद्यालय और शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कक्षा शिक्षण और विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों के आयोजन के संदर्भ में शिक्षकों को ध्यान रखना चाहिए कि वे विद्यार्थियों की सामाजिक-सांवेगिक आवश्यकताओं को भी संबोधित करें। इसके लिए शिक्षक अपने विद्यार्थियों के प्रति तद्रु भूति पूर्ण व्यवहार का प्रदर्शन कर सकता है। उसे विद्यार्थियों तक यह संप्रेषित करने का प्रयास करना चाहिए प्रत्येक विद्यार्थी अपने में अनोखा और विशिष्ट है। विद्यालय, परिवार और समाज उसकी इस अद्वितीयता को स्वीकार करता है। उदाहरण के लिए विद्यालय की किसी भी गतिविधि के आयोजन में सभी विद्यार्थियों की सहभागिता को सुनिश्चित किया जाए सहभागिता के दौरान उन्हें दिए गए दायित्वों के निर्वहन में सहयोग प्रदान किया जाए, प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित किया जाए। यह ध्यान रखा जाए कि कमियों को उजागर करने के बजाय मजबूत पक्षों की सार्वजनिक स्वीकृति और कमजोर पक्षों पर परामर्श व निर्देशन हो ।
विद्यार्थियों के समायोजन अथवा कुसमायोजन में शिक्षकों के संप्रेषण की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों के लिए प्रयुक्त विशेषणों की कल्पना कीजिए। 'मेधावी', 'औसत', 'बदमाश', 'तीव्र बुद्धि पर पढ़ने में रूचि न लेने वाला', 'लापरवाह', 'उत्साही' आदि कुछ ऐसे ही विशेषण हैं। ये विशेषण विद्यार्थियों पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। जब एक विद्यार्थी को आप लगातार एक वर्ग या श्रेणी के अंतर्गत रखेगें तो वह स्वाभाविक रूप से अपने को उसी वर्ग या श्रेणी के व्यवहार प्रतिरूपों का समुच्चय बनाने लगेगा। अतः कक्षा में शिक्षक को विद्यार्थियों के साथ बातचीत करने के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी भाषा विद्यार्थियों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से क्या संदेश संप्रेषित कर रही है।
विद्यालय और परिवार के बीच संवाद का विकास होना चाहिए। शिक्षकों को इस प्रकार के संवाद में मध्यस्थता की भूमिका का निर्वहन करना चाहिए । इस प्रकार के प्रयास से परिवार विद्यार्थी के उन पक्षों को जान पाएगा जो विद्यालय से संबंधित है और जिनकी तुष्टि में विद्यालय के साथ अभिभावकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। विद्यालय द्वारा भी अपने विद्यार्थियों के वृहद् जीवन को खोजने का प्रयास करना चाहिए। तभी तो विद्यालय उन सामाजिक सांवेगिक आवश्यकताओं से परिचित हो सकेगा जो विद्यार्थियों के समायोजन में चुनौती के रूप में उपस्थित रहती है।
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