जेंडर आधारित पहचान के विकास में विद्यालय की भूमिका - The role of the school in the development of gender-based identity

जेंडर आधारित पहचान के विकास में विद्यालय की भूमिका - The role of the school in the development of gender-based identity


बच्चा परिवार के बाद जिस लघु समाज से परिचित होता है, वह उसका विद्यालय समाज होता है। बच्चा अपने परिवार से कुछ-न-कुछ सकारात्मक या नकारात्मक मूल्य लेकर विद्यालय में आता है। यहाँ पर विद्यालयी शिक्षा तंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। परिवार के बाद बच्चे का समाजीकरण करने में विद्यालय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह वो जगह होती है, जहाँ बच्चे अपने परिवार के बाद सबसे ज्यादा वक्त बिताते हैं, अपने दोस्त बनाते हैं, चीज़ों के बारे में देखना सीखते हैं और दुनिया में अपनी जगह को पहचानना और समझना सीखते हैं। व्यक्ति अपने जीवन में बहुत बाद तक, स्कूल के शिक्षकों और साथ में पढ़ने वालों के व्यवहार और नजरिए से काफी प्रभावित रहता है। इसलिए, मूल्यों और चेतना के स्तर पर एक राष्ट्र कैसा बनेगा, इसमें उस राष्ट्र की शिक्षा प्रणाली की भी बड़ी भूमिका होती है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम सभी विद्यालयों को एक ऐसे रूप में परिलक्षित कर रहे हैं जहाँ पर बच्चे की विभिन्नताओं (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक आदि) के होते हुए भी उन्हें सभी के साथ मिलकर ज्ञान सृजन करने के समान अवसर मिल सकें। उनकी वैयक्तिक आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें कक्षा-कक्ष में उचित वातावरण मिल सके ताकि वे आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, सकारात्मक सोच, प्रभावी संप्रेषण आदि गुणों को स्वयं में विकसित करते हुए संपूर्ण व्यक्तित्व विकास की ओर अग्रसर हो सकें।


विद्यालय समाजीकरण का प्रमुख स्थान है। विद्यालय का प्रभाव भी जेंडर आधारित पहचान के विकास में देखा जाता है। आज कोई भी शिक्षक छात्रों द्वारा अपने साथ विद्यालयों में लाई जा रही असंख्य माँगों और अपेक्षाओं की समझ या उनके प्रति संवेदनशील हुए बिना व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो सकता है।

उन्हें, वर्ग, जाति, धर्म, लिंग और निःशक्तता पर ध्यान दिए बिना सभी छात्रों को संलग्न करने और सीखने के सार्थक अवसर प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए। शिक्षक लड़के तथा लड़कियों के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं जिससे उनमें अलग-अलग लिंग भूमिका का विकास होता है। पाठ्यक्रम पर भी रूढ़ियाँ अपना प्रभाव डालती हैं। उदाहरण के लिए गणित के सवाल में कहा जाता है में कि "एक काम को दो पुरुष 2 घंटो में तथा चार स्त्रियाँ 8 घंटों में करती हैं, तो बताइए उस काम को चार पुरुष एवं आठ स्त्रियाँ कितने घंटों में करेंगी?" स्पष्ट है कि प्रश्न में भी यह माना जा रहा है कि स्त्री कमजोर है तथा पुरुष की कार्य क्षमता ज्यादा है। इस प्रकार पाठ्य पुस्तकों का प्रभाव भी जेंडर आधारित पहचान के विकास में होता है। भले ही विद्यालय में निश्चित लिखित पाठ्यक्रम हो, जिसमें छात्र/छात्राओं को समान बताया और दिखाया गया हो, लेकिन विद्यालय के कुछ अप्रत्यक्ष पाठ्यक्रम होते हैं। विद्यालय में किया जाने वाला व्यवहार, वहाँ होने वाली गतिविधियाँ, वहाँ का परिवेश, यह सभी अप्रत्यक्ष पाठ्यक्रम का हिस्सा होते हैं। इसे बच्चे लगातार देखते हैं और सीखते हैं।


प्रायः शिक्षक इस रूढि से प्रभावित होते हैं कि लड़कियाँ साहित्य, गृहविज्ञान, अंग्रेजी में अधिक दक्ष होती हैं जबकि लड़कों की निपुणता गणित एवं विज्ञान विषयों में अधिक होती है। लड़कियों के बारे में प्रचलित इस गलत धारणा कि 'लड़कियों को गणित नहीं आता है' के कारण क्या लड़कियों को गणित सीखने का अवसर मिलेगा ? आप स्वयं से पूछ सकते हैं कि यदि लड़कियों को उन्नत गणित सीखने का अवसर कभी भी न दिया जाए तो वे अपनी योग्यताओं को कैसे दर्शा सकती हैं? पाठ्यक्रम के प्रस्तुतीकरण में पुस्तकों की स्थिति देखें तो वहाँ भी लैंगिक रुढियोंका प्रभाव दिखायी देता है । किताबों में दिए गए चित्रों पर गौर करें तो समाज में श्रम संबंधी लैंगिक बँटवारे को यह किताबें पुष्ट करती हैं, मेहनत के ज्यादातर काम स्त्रियों और लड़कियों को करते हुए दिखाया गया है, जबकि लड़के या पुरुष अधिकतर जगहों पर खेलते या ऐसे काम कर रहे हैं, जिन्हें आम तौर पर स्त्रियों को नहीं करने दिया जाता।