जेंडर आधारित पहचान के विकास में सामाजिक संगठनों की भूमिका - The role of social organizations in the development of gender-based identities

जेंडर आधारित पहचान के विकास में सामाजिक संगठनों की भूमिका - The role of social organizations in the development of gender-based identities


यह सत्य है कि स्त्री-पुरुष दोनों ही जैविक संरचना है पर इनकी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक भूमिका का निर्धारण 'जेंडर' करता है, जिसका विकास विभिन्न सामाजिक संगठनों के सामाजिक मानदण्डों तथा सामाजिक नियंत्रण के प्रभाव में होता है। जेंडर, अस्मिता की पहचान का सबसे मूक घटक है जो हमें स्त्री व पुरुष की निर्धारित सीमा को परिभाषित करने और दुनिया को देखने के नजरिए की नाटकीय भूमिका को बताता है। यह केवल लिंगों के बीच के अंतर को नहीं बताता बल्कि सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्तर पर सत्ता से इसके संबंध को भी परिभाषित करता है। महिलाओं के संदर्भ में सिमोन द बोउवार ने कहा था कि 'महिला होती नहीं, बल्कि बनाई जाती हैं'। समाज में महिलाओं के इस निर्माण कार्य और उनके हिस्से आती 'असमानता' का विश्लेषण किया जाए तो हम इसका एक प्रमुख कारक - 'जेंडर की अवधारणा' को पाते हैं।

जेंडर आधारित पहचान के विकास में विभिन्न सामाजिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक संगठनों ने समाज में महिलाओं के अधिकारों के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यूनिसेफ, यूएनडीपी, तथा यूएनएफपीए सहित कई संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं द्वारा व्यक्तिगत मानव अधिकारों की दिशा में काम किया जा रहा है। यूएनडीपी लैंगिक समानता पर केंद्रित है जो महिलाओं के सशक्तिकरण को न केवल मानव अधिकार के रूप में, बल्कि सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों और सतत विकास को प्राप्त करने के लिए एक प्रमुख कारक मानता है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय मिशन, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग आदि राष्ट्रीय स्तर पर सशक्तिकरण की दिशा में काम कर रहे हैं। विभिन्न सामाजिक संगठन अपनी कार्यनीतियों से महिलाओं की स्थि ति और सशक्तिकरण के परंपरागत निर्धारकों द्वारा पैदा की गई चुनौतियों को सामने लाते हैं तथा स्थिति में सुधार हेतु आवश्यक प्रयास कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति (2001) के अंतर्गत निम्न लक्ष्य महिलाओं की उन्नति, विकास तथा सशक्तीकरण को मूर्त रूप देने हेतु निर्धारित किए गए -


1. महिलाओं के पूर्ण विकास हेतु सकारात्मक आर्थिक तथा सामाजिक नातियों के जरिए एक माहौल का निर्माण करना, ताकि वे अपनी क्षमताओं को समझ सकें।


2. राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा नागरिक क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा सभी मानवाधिकारों तथा मौलिक स्वितंत्रताओं का पुरुषों के समान कानूनी तथा व्यावहारिक उपयोग करना।

3. सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक जीवन में महिलाओं द्वारा भागीदारी और निर्णय क्षमता के समान अवसर ।


4. स्वास्थ्य देखभाल, सभी स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैरियर तथा व्यावसायिक मार्गदर्शन, रोजगार, समान वेतन, पेशेवर स्वास्थ्य तथा सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा तथा सरकारी ऑफिस इत्यादि में समान अवसर की उपलब्धता


5. कानूनी सिस्टम को सुदृढ़ करना जिसका उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के भेदभाव का उन्मूलन हो।


6. पुरुष तथा महिला दोनों के सक्रिय भागीदारी और साझीदारी द्वारा सामाजिक धारणाओं और सामुदायिक व्यवहारों में परिवर्तन लाना।


7. विकास प्रक्रिया में एक लैंगिक दृष्टिकोण को लागू करना।


8. महिलाओं तथा बालिकाओं के खिलाफ होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव का उन्मूलन, तथा


9. सिविल सोसाइटी के साथ खास कर महिला संगठनों के साथ साझेदारी का निर्माण तथा उसका सशक्तीकरण।


राष्ट्रीय महिला आयोग, जो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा सहायता प्राप्त एक सांवानिक निकाय है, को अन्यथ बातों के साथ-साथ, महिलाओं के संवैधानिक एवं कानूनी हितों के सुरक्षोपायों की करने, उपचारात्मोक विधिक उपाय सुझाने, शिकायत निवारण को सहज बनाने और महिलाओं को प्रभावित करने वाले सभी नीतिगत मुद्दों पर सरकार को सलाह देने का अधिकर प्राप्त है।