मूल्यों के विकास में समाज की भूमिका - Role of society in development of values

मूल्यों के विकास में समाज की भूमिका - Role of society in development of values

समाज रीतियों एवं कार्यप्राणालियों की अधिकार एवं पारस्परिक सहायता की, अनेक समूहों तथा विभागों की, मानव-व्यवहार के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं कीएकव्यवस्था है। इस परिवर्तनशील जटिल व्यवस्था को हम समाज कहते हैं। यह सामाजिक संबंधों का जाल है जोहमेशा परिवर्तित होता रहता है। आत्मा का विकास मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाता है। सामाजिक पर्यावरण बच्चे की प्रवृत्तियों में सुधार करके उसको सामाजिक दशाओं के अनुसार व्यवहार करने की प्रेरणा देता है। सामाजिक बिरासत में व्यक्ति अपनी प्रथाओं, परंपराओं और नियमों के अनुसार व्यवहार करना सीखता है। सामाजिक विरासत व्यक्ति के बहुत से व्यवहारों को दिशा प्रदान करती है। हमारे जीवन में ऐसा कोई व्यवहार नहीं जो हमारी सामाजिक विरासत द्वारा प्रभावित न हो। मनुष्य के द्वारा बनाई गई संस्कृति समाज को प्रभावित करती है। संस्कृति में हम उन सभी विचारों, धर्म, नैतिकता, परंपरा, प्रथा, उपकरणों और भौतिक वस्तुओं को सम्मिलित करते हैं

जिन्हें मनुष्य ने समाज के सदस्य होने के नाते प्राप्त किया है। संस्कृति के ये सभी प्रतिमान इस बात का निर्धारण करते हैं कि समाज अपने सदस्यों को किस प्रकार का प्रशिक्षण देगा, उन्हें कौन-कौन से व्यवहार सिखायेगा, शिष्टता और नम्रता के नियम कैसे होंगे, व्यक्तियों के व्यवहार पर किस प्रकार का नियंत्रण रख सकेगा, समाज किन परपराओं को अधिक महत्व देगा विचार, विश्वास तथा प्रथाएँ भी सामाजिक व्यवहार के स्वरूप को प्रभावित करती है। संस्कृति का भौतिक पक्ष बेशभूषा उपकरण और यंत्र आदि सामाजिक संरचना की प्रकृति को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि संस्कृति क भौतिकवादी होने से समाज में औपचारिक संबंधों का विकास होता है। आध्यात्मवादी संस्कृति एक सरल समाज का निर्माण करती है।


निरंकुश समाज में शिक्षा बल तथा आदेश द्वारा दी जाती है। छोटी-छोटी गलतियों के लिए शारीरिक दण्ड दिया जाता है। हिटलर की आज्ञा के अनुसार जर्मनी में देशप्रेम व राज्य के हित के लिए सभी प्रकार का बलिदान करने की शिक्षा दी जाती थी।

जनतंत्रीय समाज में व्यक्ति का दमन नहीं किया जाता व विद्यार्थियों को स्वतंत्रतापूर्वक अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है।


समाज में बच्चों के शारीरिक विकास के लिए व्यायामशाला, अखाड़ा, क्रीडास्थल आदि की व्यवस्था होती है, स्वास्थ्य के लिए टीका लगाने, संक्रामक रोगों से रक्षा व स्वच्छता के लिए प्रबंध किए जाते हैं। चिकित्सालय खोले व सचालित किए जाते है, मनोरंजन हेतु पार्क उद्यान, तरणताल, भ्रमण-स्थल आदि की व्यवस्था की जाती है। मानसिक व सामाजिक विकास के लिए पुस्तकालय, चलचित्रों/सिनेमा, बाचनालय, रेडियो कार्यक्रमों, दूरदर्शन कार्यक्रमों नाटकों के मंचन कठपुतली शो प्रदर्शनी व मेला, भाषण आदि की व्यवस्था की जाती है। मूल्य संकट या मूल्य दुविधा की स्थिति में संबंधित विषयों में वादविवाद व निबंध लेखन प्रतियोगिताएँ संचालित की जा सकती हैं। इन सभी क्रियाओं का प्रभावी आयोजन करके बच्चों में आध्यात्मिक, धार्मिक, चारित्रिक विकास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण संरक्षण, देश की सांस्कृतिक धरोहर के प्रति आदर, नम्रता, परोपकार, सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता, धैर्य, अनुशासन, श्रमनिष्ठा व उच्च चारित्रिक श्रेष्ठता आदि मानवीय गुण विकसित किए जा सकते हैं।

विभिन्न सामाजिक संगठन राष्ट्रीय व अन्य उत्सवों व समारोहों का आयोजन करके, विद्यालयों में मूल्य चर्चा हेतु वक्ताओं को आमंत्रित कर तथा विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक समस्याओं पर खुला मंच कार्यक्रम का आयोजन कर मूल्यों के विकास में उल्लेखनीय योगदान दे सकते हैं। अपने समाज में लोगमूल्यों से विमुख हो रहे हैं समाज में मूल्यों के विकास हेतु मूल्य की शिक्षा देना आवश्यक है। सर्वप्रथम हमें स्वस्थ चरित्र वाले राजनीतिज्ञों के हाथों में अपने देश की बागडोर सौंपनी होगी। फिर प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार व दुराचरण से नागरिकों को मुक्ति दिलानी होगी। जब पूरे सामाजिक बातावरण में मूल्य व्याप्त हो जाएँगे तब बच्चे अनुकरण कर आसानी से अपने मूल्यों का विकास कर सकेंगे।


उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मूल्यों के विकास में समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। विद्यालय परिवार व समाज तीनों को मूल्यों की शिक्षा में रुचि लेनी चाहिए। मूल्यों के विकास के लिए अधिगम अनुभव प्रदान करने की व्यवस्था करनी चाहिए। मूल्योंसे युक्त आचरण को स्वीकृत, पुरस्कृत अनुमोदित तथा संभव बनाने के लिए अथक प्रयत्न करने चाहिए। निर्धनता के अभिशाप से भारतवासी को मुक्त कराना है तथा मूल्यों में आस्था न रखने वालों से देश को बचाना है। समन मूल्यों के विकास में विद्यालय को प्रभावी सहयोग दे सकते हैं।