मूल्यों के विकास और पोषण के संदर्भ में शिक्षक की भूमिका - Role of teacher in the context of development and nurturing of values

मूल्यों के विकास और पोषण के संदर्भ में शिक्षक की भूमिका - Role of teacher in the context of development and nurturing of values


मूल्यों की शिक्षा नहीं दी जा सकती बरन यह प्राप्त की जाती है। अतः मूल्यों को अनुसरण द्वारा सीखने के लिए अनुकूलवातावरण बनाने की आवश्यकता है। शिक्षा देने के लिए सभी को यथोचित भूमिका का निर्वाह करना, परस्पर विचार-विमर्श विधियों का उपयोग करना उपयुक्त होता है। सदचरित्र अध्यापक मूल्यों की शिक्षा दे सकता है।


मूल्यपरक शिक्षा में धर्मनिरपेक्षता सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, सामाजिक अस्तित्व, विश्व बंधुत्व, शांति, प्रेम, सत्य, आध्यात्मिक आदि


तत्वों को शामिल करना चाहिए। मूल्यपरक शिक्षा का कोई अलग से पाठ्यक्रम बनाने की आवश्यकता नहीं है। यह सभी मूल्य विभिन्न विषयों में निहित रहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि अध्यापक इन मूल्यों को अपने शिक्षण विषयों में पहचानें और विद्यार्थियों में इनके विकास हेतु प्रयास करें।


शिक्षकों को स्वयं के लिए मूल्यों का निर्धारण करना होगा उन्हें इन मूल्यों के विकास के लिये स्वयं सक्रिय रहना होगा। उन्हें मूल्यों के लिए अपनी संस्कृति से परिचित होना होगा, मूल्यों के लिए अपनी प्रतिबद्धता विकसित करनी होगी तथा मूल्यों के शिक्षण हेतु शिक्षण योजना विकसित करनी होगी।


शिक्षक कुछ घटनाओं, व्यक्तियों व व्यवहारों को विद्यार्थियों की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। विद्यार्थियों से सम्बंधित शिक्षक के सभी क्रियाकलापों में उसके मूल्यों की झलक मिलती है। वास्तव में छात्रों में मूल्यों का विकास अध्यापक के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। वे छात्रों में मूल्योंको आत्मसात करने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं।


वर्तमान में विद्यालयों के अधिकांश शिक्षक सुनियोजित मूल्य शिक्षा देने का प्रयत्न ही नहीं करते।

आज मूल्यों को कल्पनाकी बात समझा जाता है, थोथे आदर्शों की संज्ञा दी जाती है। छोटी-बड़ी बातों को अपनी व्यक्तिगत बात या मामला कहकर अनेक बार उन्हें विचार-विमर्श के दायरे से बाहर कर दिया जाता है। कई शिक्षक समाज में मूल्यों के हास की आड़ में मूल्य शिक्षा की प्रभव को सदेह की नजरों से देखते हैं तो कुछ शिक्षक विषय वस्तु को रटने/ याद करने पर अधिक बल देते हैं। वह उनके मूल्य निहितार्थो की परवाह नहीं करते हैं। इन सभी बातों के बावजूद सत्य यह है कि शिक्षक मूल्यों का प्रतिपादन करें, उस पर बल दें तथा मूल्य विषयक बालों व समस्याओं पर चर्चा करें। अनेक शिक्षक मूल्य शिक्षण को एक नाजुक मामला मानते हैं। वे अपनी व्यावसायिक तैयारी को मूल्यों की शिक्षा देने के लिए अधिक उपयोगी नहीं मानते हैं। अपर्याप्त तैयारी के कारण वे विद्यार्थियों को मूल्यों की शिक्षा नहीं दे पाते हैं। कुछ शिक्षक ऐसे भी होते हैं जिनकी उन मूल्यों में आस्था नहीं होती जिन्हें वे पढ़ाते हैं। जब विद्यार्थी शिक्षक की बातों व व्यवहार में, कथनी-करनी का अंतर देख लेता है तब मूल्यों की शिक्षा निष्प्रभावी हो जाती है।


बच्चों में अनुकरण की प्रवृत्ति होती है। वे बंदर के समान अपने अध्यापक की प्रत्येक क्रिया का अनुसरण करते हैं। अध्यापक का बोलना, उनका उच्चारण, उनकी भाषण- शैली, उनकी वेश-भूषा उनकी चाल-ढाल सभी का वह अनुसरण करते हैं। अतः यदि अध्यापक सावधान नहीं है तो बच्चे उनकी त्रुटियों का अनुकरण करके उन्हें शीघ्र ग्रहण कर लेते हैं। अध्यापक में किसी प्रकार का व्यसन नहीं होना चाहिए। यदि दुर्भाग्यवश कोई व्यसन हो तो उसे छात्रों से छिपाना चाहिए। मूल्य शिक्षा देते समय शिक्षकों को निम्न प्रश्नों पर भी विचार करना चाहिए :


• क्या दृश्य या अदृश्य पाठ्यचर्या में अन्तर है?


• क्या लिखित नियमों के पालन पर बल दिया जाता है?


• क्या विद्यार्थी क्रियाकलापों के महत्व पर चर्चा की जाती है?


• क्या शिक्षक को कक्षा में विद्यार्थियों के मूल्य पर चर्चा करनी चाहिए?


• क्या मूल्यों पर विचार विमर्श हेतु शिक्षक को विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना चाहिए? 


• क्या कोई विषय ऐसा भी है जिसके माध्यम मूल्यों की शिक्षा नहीं दी जा सकती है?


अतः शिक्षक अपने छात्रों को मूल्य शिक्षा दे सकता है। यह कठिन नहीं है। उसे केवल अपना दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। कोठारी कमीशन ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का आधार मानने पर बल दिया है। राष्ट्रीय विकास हमारे नागरिकों की नैतिकता पर निर्भर करता है। अतः आवश्यकता है कि हम विद्यालयों को नैतिक एवं चरित्रवान अध्यापक उपलब्ध कराने का हर संभव प्रयास करें।