पाठ्यपुस्तक और पाठ्यक्रम के निर्माण में विभिन्न सामाजिक कारकों/घटकों की भूमिका - Role of various social factors/components in the formulation of textbook and curriculum

पाठ्यपुस्तक और पाठ्यक्रम के निर्माण में विभिन्न सामाजिक कारकों/घटकों की भूमिका - Role of various social factors/components in the formulation of textbook and curriculum


समाज के विभिन्न घटक, जिसमें जनसामान्य, अभिभावक, समाजशास्त्र आदि की विद्यालय के शैक्षिक क्रियाकलापों में रुचि रहती है। शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ उनकी यह रुचि किसी न किसी रूप में रहती हैं। वर्तमान स्थिति तो यह है कि अब प्रत्येक व्यक्ति प्रचलित शिक्षा व्यवस्था पर अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्ति करता हुआ सुनाई पड़ता है। पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों और उनके कार्यों पर आलोचनात्मक टिप्पणी की जाती है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि आज शिक्षा का कोई भी पक्ष आलोचना से अछूता नहीं रह गया है। राष्ट्र अथवा समाज की किसी भी बुराई के लिए शिक्षा को ही दोषी ठहराया जाता है। इसके समाधान का उपाय यही है कि समाज के सभी महत्व पूर्ण वर्गों को पाठ्यक्रम विकास की प्रक्रिया में सहभागी बनाया जाए। कई बार ऐसा अवश्य होता है कि समाजिक वर्गों के विचार अस्पष्ट एवं बेढंगे होते हैं, किंतु उस पर ठीक से ध्यान देने पर उनसे उपयोगी संकेत भी मिलते हैं जो पाठ्यक्रम के विकास के लिए आवश्यक दिशा प्रदान कर सकते हैं।


पाठ्यक्रम के विकास की प्रक्रिया में समाज की प्रकृति को समझने अर्थात बालकों की पारिवारिक, सामाजिक पृष्ठभूमि को जानने के लिए समाजशास्त्रियों की भी सहभागिता अनिवार्य है। शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण सामाजिक आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं के अनुरूप किया जाना आवश्यक है। कोई भी शैक्षिक कार्यक्रम तभी सफल हो सकता है, जब वह समाज की विद्यमान स्थितियों के अनुकूल हो। समाज की स्थितियों के अनुसार अनुकूलित करने में समाजशास्त्री महत्वपूर्ण सहयोग कर सकता है। समाजशास्त्रियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सर्वेक्षणों, अभिमत संग्रह एवं अन्य संबंधित शोध कार्यों के माध्यम से समाज की वास्तविक स्थिति एवं उसमें हो रहे परिवर्तनों से पाठ्यक्रम विशेषज्ञों को अवगत कराकर पाठ्यक्रम विकास प्रक्रिया में समुचित सहयोग प्रदान करें।