शैशवावस्था की मुख्य विशेषताएँ - salient features of infancy
शैशवावस्था की मुख्य विशेषताएँ - salient features of infancy
1) शारीरिक विकास में तीव्रता
शैशवावस्था के प्रथम तीन वर्षों में शिशु का शारीरिक विकास अत्यन्त गति से होता है। उसके भार और लम्बाई में वृद्धि होती है। तीन वर्ष के बाद विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
2) मानसिक क्रियाओं की तीव्रता
तीन वर्ष की आयु तक शिशु की मानसिक शक्तियाँ कार्य करने लगती है। शिशु की मानसिक क्रियाओं जैसे ध्यान, स्मृति, कल्पना, संवेदना और प्रत्यक्षीकरण आदि के विकास में तीव्रता होती है।
3) सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता
गेसल के अनुसार बच्चे प्रथम 6 वर्षों में बाद के 12 वर्षों से दोगुना सीख लेते हैं। इस अवस्था में शिशु के सीखने की प्रक्रिया बहुत तीव्र होती है।
4 ) कल्पना की सजीवता
कुप्पुस्वामी के अनुसार चार वर्ष के बच्चे के संबंध में एक अति महत्वपूर्ण बातयह है उसकी कल्पना सजीव होती है। वह सत्यः और असत्य में अंतर नहीं कर पाता है।
5) दूसरों पर निर्भरता -
शैशवावस्था में जन्म के बाद शिशु कुछ समय तक असहाय स्थिति में रहता है। वह मुख्यतः अपने माता पिता विशेष रूप में अपनी माता पर निर्भर रहता है। वह शारीरिक आवश्यकताओं के अलावा प्रेम और सहानुभूति पाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है।
6 ) आत्म प्रेम की भावना -
शिशु में आत्म प्रेम की भावना बड़ी प्रबल होती है। शिशु अपने माता-पिता, भाई-बहन आदि का प्रेम पाना चाहता है। उसे लगता है की प्रेम उसके अलावा और किसी को न मिले, ऐसा होने की स्थिति में उसे दूसरे बच्चे से इर्ष्या होने लगती है।
7) नैतिकता का अभाव -
शिशु में नैतिकता का पूर्ण रूप से अभाव होता है। उसे अच्छेबुरे, उचित और अनुचित बालों की कोई समझ नहीं होती।
8 ) मूलप्रवृत्तियों पर आधारित व्यवहार -
शिशु अपनी मूलप्रवृत्तियों पर आधारित व्यवहार करता है। यदि उसको किसी बात पर क्रोध आ जाता है तो वह उसे अपनी वाणी द्वारा प्रकट करता है। भूख लगती है तो उसको जो भी वस्तु मिलती है उसे मुँह में रख लेता है।
9 ) सामाजिक भावना का विकास -
इस अवस्था के अंतिम वर्ष में शिशु में सामाजिक भावना का विकास होता है वह 2 से 5 वर्ष तक के बच्चों के साथ खेलना पसंद करता है। वह अपनी वस्तुओं में दूसरों को साझीदार बनाता है। शिशु में दूसरे बच्चों के प्रति रुचि या अरुचि प्रकट होती है। स्किनर के अनुसार वह एक वर्ष की आयु में ही अपने साथियों में
10) दूसरे बच्चों में रुचि या अरुचि -
रुचि लेने लगता है।
11) संवेगों का प्रदर्शन -
शिशु में जन्म के समय उत्तेजन के अलावा कोई अन्य स्पष्टसंवेग नहीं होता है। बाल वैज्ञानिकों ने शिशु में मुख्य रूप से चार संवेग माने है भय, क्रोध, प्रेम और पीड़ा।
12) काम प्रवृत्ति
बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि शिशु में काम प्रवृत्ति बहुत प्रबल होती है। पर वयस्कों के समान वह उसको व्यक्त नहीं कर पाता है। अपनी माता का स्तनपान करना और यौनांगों पर हाथ रखना बच्चे की काम प्रवृत्ति के सूचक व्यवहार हैं।
13) दुहराने की प्रवृत्ति
शिशु में दुहराने की प्रवृत्ति बहुत प्रबल होती है उसमें शब्दों और गलियों को दोहराने की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है, उसमें उन्हें आनंद मिलता है।
14 ) जिज्ञासा की प्रवृत्ति
शिशु में जिज्ञासा की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा होती है। वह हर चीज को जानना चाहता है। वह अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिये क्यों और कैसे जैसे प्रश्न पूछता है। अपने खिलौने का विभिन्न प्रकार से प्रयोग करता है।
15 ) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवृत्ति
शिशु में अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवृत्ति होती है। वह अपने मातापिता, भाई-बहन आदि के कार्य और व्यवहार का अनुकरण करता है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता है तो रोकर या चिल्लाकर अपनी असमर्थता प्रकट करता है।
16 ) अकेले व साथ खेलने की प्रवृत्ति
शिशु में पहले अकेले खेलने की और बाद में दूसरों के साथ खेलने की प्रवृत्ति होती है।
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